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आध्यात्मिक साधनाओं के जरिए कुंडलिनी जगाने की करें कोशिश, लेकिन...
Fri, 31 Jan 2020 03:31 PM IST
रुस्तम राणा
स्वामी ओमानंद गिरि
स्वामी ओमानंद गिरि
Published by: रुस्तम राणा
Updated Fri, 31 Jan 2020 03:31 PM IST
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आध्यात्मिक साधनाओं के जरिए कुंडलिनी जगाने की कोशिश
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साधना किसी भी मार्ग से की जाए, कुंडलिनी जागृत होती ही है। यह जब अनाहत चक्र से गुजरती है, तो कहते हैं कि साधक का भाव जागृत हुआ है। ज्ञानमार्ग के अनुसार, साधक को दिव्यज्ञान अनुभव होने लगता है। शक्तिपात के जरिए जागृत की जाती है, तो भाव संवेदना जागने लगती है।
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ईश्वर के कारण संसार लगातार बना हुआ है। आस्तिक जनों की मान्यता है कि 0.01 फीसदी लोगों से ज्यादा शायद ही इस विश्वास को धता बताते हों। मानने वालों की संख्या की तुलना में नहीं मानने वालों की संख्या नगण्य ही है। उतनी ही मजबूती से लोग यह भी मानते हैं कि कुंडलिनी साधना और अध्ययन करने वालों के अनुसार ईश्वर की शक्ति या महा-कुंडलिनी, जो समूचे ब्रह्मांड को चलाती है, उसे चैतन्य कहते हैं। व्यक्तिगत क्षेत्र के मामलों में उसे चेतना कहते हैं। यह ईश्वरीय शक्ति का वह अंश है, जो मनुष्य को उसके काम के लिए चाहिए। यह चेतना दो तरह से काम करती है। एक स्तर पर यह क्रियाशील चेतना अथवा प्राण शक्ति कहलाती है। यह स्थूल देह, मनोदेह, कारण देह और कारण शरीर को शक्ति देती है। यह चेतना शक्ति सूक्ष्म नाड़ियों के जरिए शरीर में फैली होती है और कोशिकाओं, नसों, रक्त वाहिनी, लसिका (लिंफ) को सक्रिय रखती है। योगीजन कहते हैं कि कुंडलिनी या सुप्त चेतना आध्यात्मिक प्रगति करती है। शारीरिक क्रियाओं के लिए उसका कम उपयोग होता या नहीं होता है।
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आध्यात्मिक साधनाओं के जरिए कुंडलिनी जगाने की कोशिश होती है, मगर इसमें जरा-सी चूक से घातक परिणाम हो सकते हैं। साधक इन अभ्यासों से विक्षिप्त और बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। शक्तिपात योग या कृपा के जरिए यह शक्ति दी जा सकती है। मंत्र या किसी समर्थ शब्द, दृष्टिपात, विचारों या स्पर्श से शक्तिपात किया जा सकता है। शक्तिपात से कुंडलिनी जागृत होने लगती है। जागृत होने पर कुंडलिनी जिस गति से ऊपर जाती या उठती है, वह शिष्य की साधना और प्रयासों पर निर्भर है। गुरु और मार्गदर्शक या सिद्धों अथवा अशरीरी शक्तियों की अतींद्रिय कृपा या सहयोग गौण है। साधना मार्ग कोई भी हो, जब आत्मिक प्रगति होती है, तो कुंडलिनी जागृत होती ही है। योगीजन मूल रूप से छह तरह के साधन बताते हैं, जिनसे कुंडलिनी सहज ही जागृत होती है। पहला, अप्रकट गुरु या ईश्वरीय शक्ति की कृपा से स्वयं ही कुंडलिनी जाग जाती है। जाग उठने पर यह ऊपर की दिशा में यात्रा करने लगती है और साधक में परिवर्तन करती है। लगातार साधना करना वैसा ही है, जैसे कि कठिन परिश्रम से भाग्य-भविष्य को खुद बनाना। सीधे शक्तिपात से कुंडलिनी जागना किसी अरबपति के घर जन्म लेने जैसा है, जहां पिता-पुत्र को तुरंत धन उपलब्ध करा देता है। दोनों में परिश्रम से कमाया (आध्यात्मिक) अधिक टिकने वाला और प्रगति के लिए भरोसेमंद विकल्प है।
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कहते हैं कि शरीर में बहत्तर हजार सूक्ष्म नाड़ियां हैं। इनमें तीन मुख्य सूक्ष्म-नाड़ियां हैं। सुषुम्ना, पिंगला और चंद्र नाड़ी। सुषुम्ना मध्य नाड़ी है और रीढ़ की हड्डी के मूल (मूलाधार चक्र) से शुरू होकर सिर के ऊपर तक जाती है। पिंगला या सूर्य नाड़ी सुषुम्ना नाड़ी के दाएं से जाती है। वहीं इडा या चंद्र नाड़ी सुषुम्ना की बाईं ओर से जाती है। प्राण शक्ति देह में सूर्य, चंद्र और अन्य छोटी नाड़ियों से प्राणों का संचार करती है। योगीजन कहते हैं कि कुंडलिनी साधारण व्यक्ति में भी जागी या सोई अवस्था में रहती है। साधना से यह रीढ़ के मूल से ऊपर की ओर सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए मस्तिष्क तक जाती है। गति में रहती है, तो कुंडलिनी रास्ते के सभी चक्रों को जगाती हुई जाती है।
जब कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होते हुए प्रत्येक चक्र से गुजरती है, तो सूक्ष्म द्वार या मार्ग से होते हुए मार्ग में आने वाले चक्रों को खोलती हुई आगे की यात्रा करती है। कभी सुषुम्ना नाड़ी द्वारा उस चक्र पर आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमाण बढ़ जाता है। तब कहीं और जाने का मार्ग न मिलने पर वह आसपास की सूक्ष्म वाहिनियों में प्रवाहित होने लगती है और प्राण शक्ति में बदल जाती है। तो साधना किसी भी मार्ग से की जाए, कुंडलिनी जागृत होती ही है। यह जब अनाहत चक्र से गुजरती है, तो भक्ति की भाषा में कहते हैं कि साधक का भाव जागृत हुआ है। ज्ञानमार्ग के अनुसार, साधक को दिव्यज्ञान अनुभव होने लगता है। कोई विशेष भाव संवेदना भी प्रबल हो उठती है। शक्तिपात के जरिए कुंडलिनी जागृत की जाती है, तो भाव संवेदना ज्यादा जागने लगती है। साधक को ऐसे समय किसी अनुभवी मार्गदर्शक का साथ बेहद जरूरी होता है। जो साधक अपनी आध्यात्मिक प्रगति के प्रति गंभीर हैं, उन्हें सतर्क रहना चाहिए कि इस प्रकार के अनुभव बहुत ही वास्तविक और आकर्षक लगते हैं, परंतु यह प्रारंभिक परिणाम हैं और अचानक प्रदान की हुई आध्यात्मिक शक्ति के कारण अनुभव होते हैं।