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एक बार का जप ही काफी है, हजार बार जपने की जरुरत नहीं
विनोबा भावे
Updated Thu, 25 Sep 2014 11:04 AM IST
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रामकीर्ति अपने गुरु कौशल गिरि के आश्रम में वर्षों तक रहे। गुरु से उन्होंने शास्त्र पढ़े और साधना की। एक दिन उन्होंने देखा कि गुरु नदी पार करते वक्त पानी पर चले आ रहे हैं। यह देखकर रामकीर्ति को बहुत हैरानी हुई। सोचा कि इस तरह की सिद्धि तो मेरे पास भी होनी चाहिए। आश्रम में मैं सबसे पुराना शिष्य हूं, ज्ञान-ध्यान में गुरु मुझे ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं, और इस आश्रम का उत्तराधिकारी भी मुझे ही होना है।
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यह सोचते हुए रामकीर्ति शाम के वक्त अपने गुरु के पास गए और बोले, आप तो बड़े चमत्कारी हैं। आपने यह शक्ति अब तक मुझसे क्यों छिपाए रखी? मुझे भी बताइए कि पानी पर आखिर किस प्रकार चला जाता है। गुरु ने कहा, उसमें कोई रहस्य नहीं है। बस भरोसा करने की बात है। श्रद्धा हो, तो सब कुछ संभव है। पानी पर चलने के लिए उसका नाम लेना ही काफी है, जिसके प्रति तुम भक्ति रखते हो।
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रामकीर्ति अपने गुरु का नाम रटने लगे। नाम जपने के बाद उन्होंने पानी पर चलने की बात सोची, पर जैसे ही पानी में उतरे, डुबकी खा गए। बड़ी मुश्किल से बाहर आए। उन्हें अपने गुरु पर गुस्सा आया कि उन्होंने कोई गलत उपाय बता दिया। यह सोचकर फिर वह गुरु के पास पहुंचे और बोले, आपने तो मुझे धोखा दिया। मैंने कितनी ही बार आप का नाम जपा, फिर भी डुबकी खा गया।
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गुरु ने कहा, कितनी बार नाम का जाप किया? शिष्य ने कहा, हजार से भी ऊपर। किनारे पर खड़े-खड़े भी किया। पानी पर उतरते समय भी करता रहा और डूबते-डूबते भी किया। गुरु ने कहा, बस तुम्हारे डूबने का यही कारण है। एक बार का जाप ही पर्याप्त था। सच्ची श्रद्धा गिनती नहीं, अपने ईष्ट के प्रति समर्पण मांगती है।