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आखिर शिकारी की बेटी से शादी करके वह क्यों पछताने लगा।
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 02 Jan 2014 12:00 PM IST
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भगवान बुद्ध धर्म प्रचार करते हुए काशी की ओर जा रहे थे। रास्ते में जो भी उनके सत्संग के लिए आता, उसे वह बुराइयां त्यागकर अच्छा बनने का उपदेश देते। उसी दौरान उन्हें उपक नाम का एक गृहत्यागी मिला।
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वह गृहस्थी को सांसारिक प्रपंच मानता था और किसी मार्गदर्शक की खोज में था। भगवान बुद्ध के तेजस्वी और निश्छल मुख को देखते ही वह मंत्रमुग्ध होकर खड़ा हो गया। उसे लगा कि पहली बार किसी का चेहरा देखकर उसे अनूठी शांति मिली है। उसने अत्यंत विनम्रता से पूछा, मुझे आभास हो रहा है कि आपने पूर्णता प्राप्त कर ली है?
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बुद्ध ने कहा, हां, मैंने निर्वाणिक अवस्था प्राप्त कर ली है। उपक ने पूछा, आपका मार्गदर्शक गुरु कौन है? बुद्ध ने कहा, मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया। मुक्ति का सही मार्ग मैंने स्वयं खोजा है। यह सुनकर उसने पूछा, क्या आपने बिना गुरु के तृष्णा का क्षय कर लिया है? बुद्ध ने कहा, हां, मैं तमाम प्रकार के पापों के कारणों से मुक्त होकर सम्यक बुद्ध हो गया हूं।
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उपक को लगा कि बुद्ध अहंकारवश ऐसा दावा कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में उसका मन भटकने लगा। उसने एक शिकारी की युवा पुत्री से विवाह कर लिया। फिर उसे लगने लगा कि उसने अपने परिवार के साथ विश्वासघात किया है। वह फिर बुद्ध के पास पहुंचा। अब उसने बुद्ध पर विश्वास कर लिया और श्रद्धा करने लगा। इस तरह वह भी मुक्ति पथ का पथिक बन गया।