{"_id":"e24e407d8564c95789d0198fc51a5b87","slug":"king-janak-got-god","type":"story","status":"publish","title_hn":"उस मुनि ने करवाए राजा जनक को भगवान के दर्शन","category":{"title":"Metaphysical","title_hn":"परामनोविज्ञान","slug":"metaphysical-parasychology"}}
उस मुनि ने करवाए राजा जनक को भगवान के दर्शन
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 28 Nov 2013 11:09 AM IST
विज्ञापन
राजा जनक समय-समय पर धर्मशास्त्र के मर्मज्ञों और विद्वानों को सादर आमंत्रित कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया करते थे। एक बार उन्होंने विद्वानों की सभा में पूछा, क्या कोई ऐसा ऋषि व मनीषी है, जो ईश्वर के साक्षात दर्शन करा सके? उनका यह प्रश्न सुनकर सभी हतप्रभ हो उठे।
विज्ञापन
तभी मुनि अष्टावक्र जनक जी के सत्संग के लिए आ पहुंचे। उनसे भी जनक ने यह प्रश्न किया। वह बोले, यह भी कोई कठिन काम है? मैं ईश्वर के दर्शन करा सकता हूं।
पढ़ें, यहां भगवान पर भारी शैतान, खेल रहा गंदा खेल
राजा जनक ने कहा, यदि यह कठिन कार्य नहीं है, तो मुझे प्रभु के दर्शन कराएं। अष्टावक्र ने कहा, महाराज, सिंहासन पर बैठे-बैठे ईश्वर के दर्शन नहीं किए जा सकते। राजपद का अहंकार त्यागकर आप भूमि पर बैठें। राजा जमीन पर आकर बैठ गए।
विज्ञापन
मुनि अष्टावक्र ने कहा, दर्शन करने से पूर्व मुझे दक्षिणा देने का संकल्प करें। राजा ने कहा, बोलिए, आप कितना धन चाहते हैं? अष्टावक्र ने कहा, आपके पास तमाम धन व संपत्ति जनता की है। आपकी कहां है?
विज्ञापन
पढ़ें, एक नगरी जहां महाकाल का राज चलता है
अंत में राजा ने कहा, यह शरीर तो मेरा है। मैं शरीर देने का संकल्प करता हूं। अष्टावक्र ने कहा, यह शरीर भी आपका कहां है। यह पंचतत्वों से निर्मित है। पंचतत्वों में इसे विलीन हो जाना है।
अब तो जनक के विवेक चक्षु खुल गए। उन्होंने कहा, मुनिवर, आपने ज्ञान रूपी भगवान के दर्शन मुझे करा दिए हैं। इसके लिए मैं सदा आपका आभारी रहूंगा।