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बुद्घ से मिलने से पहले उस महिला ने क्यों अपने आभूषण उतार दिए

Mon, 07 Jul 2014 09:36 AM IST
श्री चक्र
श्री चक्र Updated Mon, 07 Jul 2014 09:36 AM IST
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Immersion is only fair of jewels and textiles

बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे। एक दिन विशेष उत्सव था। विशाल जनसमूह वहां उपस्थित था। विशाखा भी उस उत्सव में सम्मिलित थी। भगवान के सामने आने से पहले विहार के दरवाजे पर ही उसने अपने आभूषण और शृंगार उतारकर दासी को सौंप दिए। उन्हें तथागत के सामने पहनकर जाने में संकोच था। उत्सव समाप्त होने पर वह सुप्रिया नाम की दासी के साथ विहार में ही घूमती रही। दासी आभरण भूल गई।

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‘विशाखा के आभूषण यहीं छूट गए हैं।’ स्थविर आनंद ने तथागत का आदेश मांगा। उत्सव में आए लोगों की भूली वस्तुओं को आनंद ही संभाला करते थे। तथागत ने आभरण को एक ओर रखने का आदेश दिया। तभी विशाखा की दासी सुप्रिया वहां आई और बोली,‘आर्य, मेरी स्वामिनी के पहनने योग्य यह अलंकार नहीं रह गया है। आपके हाथ से छू गई वस्तु को वह विहार की संपत्ति मानती हैं।’
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विशाखा ने सोचा था कि प्रसाधन रखने-रखाने में महाश्रमण को विशेष चिंता होगी। इसलिए वह आभरण को विहार की ही संपत्ति घोषित करने के लिए वापस आई थी। इस बीच विशाखा विहार के बाहर सुप्रिया की प्रतीक्षा करती रही थी। दान की घोषणा कर वह अपनी दासी के साथ वापस चली गई।
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दूसरे दिन विहार के दरवाजे के ठीक सामने एक भव्य रथ आ पहुंचा। विशाखा उतर पड़ी। उसने तथागत का अभिवादन किया और बोली ‘भन्ते, मैंने घर पर सुनारों को बुलवाया था; उन लोगों ने प्रसाधन का मूल्य नौ करोड़ (गलाने के बाद) निश्चित किया और एक लाख बनवाने का मूल्य लगाया। नौ करोड़ एक लाख आपकी सेवा में उपस्थित है।’ तथागत की अनुमति मिल जाने पर विशाखा ने भूमि खरीदी और आभूषण-प्रसाधन के पूरे मूल्य से एक भव्य प्रासाद का निर्माण कराया।

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