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रेलवे के अधिकारी को एक मुसलमान संत ने ऐसे सिखाई ईमानदारी
- गयासुद्दीन अनजाव
Updated Thu, 28 Jan 2016 12:01 PM IST
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शाह अशरफ अली बहुत बड़े मुस्लिम संत थे। एक बार वह रेलगाड़ी से सहारनपुर से लखनऊ जा रहे थे।
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सहारनपुर स्टेशन पर पहंचकर उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि वह सामान को तुलवाकर ज्यादा वजनी होने पर उसका किराया अदा कर दें।
वहीं पास में गाड़ी का गार्ड भी खड़ा था। वह बोला, सामान तुलवाने की कोई जरूरत नहीं है। मैं तो आपके साथ ही चल रहा हूं।
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वह गार्ड भी शाह अशरफ अली का अनुयायी था।
शाह ने उससे पूछा, आप कहां तक जाएंगे?
गार्ड बोला, मुझे तो बरेली तक ही जाना है, लेकिन आप सामान की चिंता न करें।
शाह ने कहा, लेकिन मुझे तो बहुत आगे तक जाना है।
मैं दूसरे गार्ड से कह दूंगा। वह लखनऊ तक आपके साथ चला जाएगा। कोई दिक्कत न होगी।
शाह ने फिर गार्ड से पूछा, और उसके आगे?
गार्ड बोला, आपको तो लखनऊ तक ही जाना है न। वह भी आपके साथ लखनऊ तक ही जाएगा। इसलिए आप निश्चिंत होकर सफर कीजिए।
लेकिन शाह ने गंभीर होकर कहा, नहीं बरखुरदार, मेरा सफर बहुत लंबा है।
गार्ड ने पूछा, तो क्या आप लखनऊ से भी आगे जाएंगे?
शाह बोले, अभी तो सिर्फ लखनऊ तक ही जा रहा हूं, लेकिन जिंदगी का सफर तो बहुत लंबा है। वह तो खुदा के पास जाने पर ही खत्म होगा। खुदा के सामने ज्यादा सामान का किराया नहीं देने के गुनाह से आखिर मुझे कौन बचाएगा?
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यह सुनकर गार्ड शर्मिंदा हो गया और उनकी ईमानदारी से प्रभावित हुआ। शाह अशरफ अली शिष्यों से ज्यादा वजनी सामान का किराया अदा करवाने के बाद ही रेलगाड़ी में बैठे।
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