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Guru Purnima 2020: 5 जुलाई को गुरु पूजा का पर्व, जानिए क्यों मनाते हैं गुरु पूर्णिमा ?

पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य Published by: विनोद शुक्ला Updated Sat, 04 Jul 2020 08:53 AM IST

सार

  • 5 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व है।
  • आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि पर भगवान विष्णु के अंशावतार वेदव्यास जी का जन्म हुआ।
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गुरु पूर्णिमा 2020: शैक्षिक ज्ञान एवं साधना का विस्तार करने के उद्देश्य से सृष्टि के आरम्भ से ही गुरु-शिष्य परंपरा का जन्म हुआ।
गुरु पूर्णिमा 2020: शैक्षिक ज्ञान एवं साधना का विस्तार करने के उद्देश्य से सृष्टि के आरम्भ से ही गुरु-शिष्य परंपरा का जन्म हुआ। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

गुरु बिन भवनिधि तरइ न कोई । जो बिरंचि शंकर सम होई ।।
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Guru Purnima in 2020: 5 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व है। इस अवसर पर गुरु की पूजा और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। आदिकाल से ही सनातनधर्म में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है। शिवपुराण के अनुसार अठ्ठाईसवें द्वापर में इसी दिन भगवान विष्णु के अंशावतार वेदव्यास जी का जन्म हुआ। चारों वेदों का बृहद वर्णन करने और वेदों का सार ब्रह्मसूत्र की रचना करने के फलस्वरूप ही ये महर्षि व्यास नाम से विख्यात हुए। इन्होंने महाभारत सहित 18 पुराणों एवं अन्य ग्रन्थों की भी रचना की जिनमें श्रीमदभागवतमहापुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी है। इस दिन जगतगुरु वेदव्यास सहित अन्य गुरुओं की भी पूजा की जाती है। 

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शैक्षिक ज्ञान एवं साधना का विस्तार करने के उद्देश्य से सृष्टि के आरम्भ से ही गुरु-शिष्य परंपरा का जन्म हुआ। सर्वप्रथम श्रीपरमेश्वर ने नारायण का विष्णु रूप में नामकरण किया और उन्हें 'ॐ'कार रूपी महामंत्र का जप करने की आज्ञा दी। बाद में ब्रह्मा को अज्ञानता से मुक्त करने के लिए परमेश्वर ने अपने हृदय से योगियों के सूक्ष्मतत्व श्रीरूद्र को प्रकट किया जिन्होंने ब्रह्मा के अंतर्मन को विशुद्ध करने के लिए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करने का ज्ञान देकर ब्रह्मा का मोहरूपी अन्धकार दूर किया। अतः अपने शिष्य को 'तमसो मा ज्योतिगर्मय' अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुता है। 

इस पवित्र पर्व पर शिष्य अपने गुरुओं की पूजा-आराधना कर उपहार स्वरूप कुछ न कुछ दान-दक्षिणा देते हैं। प्रत्येक युग में गुरु की सत्ता परमब्रह्म की तरह कण-कण में व्याप्त रही है। गुरु विहीन संसार अज्ञानता की कालरात्रि मात्र ही है। संत तुलसीदास ने कहा है कि 'गुरु बिन भवनिधि तरइ न कोई। जो बिरंचि संकर सम होई ।। अर्थात- गुरु की कृपा प्राप्ति के बगैर जीव संसार सागर से मुक्त नहीं हो सकता चाहे वह ब्रह्मा और शंकर के समान ही क्यों न हो। 

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शास्त्रों में 'गु' का अर्थ अंधकार यामूल अज्ञान, और 'रु' का अर्थ उसका निरोधक, 'प्रकाश' बताया गया है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन से निवारण कर देता है, अर्थात अंधकार से हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला 'गुरु' ही है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी, क्योंकि यह सम्बन्ध आध्यात्मिक उन्नति एवं परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही होता है।

गुरु की महिमा वास्तव में शिष्य की दृष्टि से है, गुरु की दृष्टि से नहीं। एक गुरु की दृष्टि होती है, एक शिष्य की दृष्टि होती है और एक तीसरे आदमी की दृष्टि होती है। गुरु की दृष्टि यह होती है कि मैने कुछ नही किया। प्रत्युत जो स्वतः स्वाभाविक वास्तविक तत्व है, उसकी तरफ शिष्य की दृष्टि करा दी। तात्पर्य यह कि मैने उसी के स्वरुप का उसी को बोध कराया है। अपने पास से उसको कुछ दिया ही नहीं।

शिष्य की दृष्टि यह होती है कि गुरु ने मुझे सब कुछ दे दिया, जो कुछ हुआ है, सब गुरु की कृपा से ही हुआ है। तीसरे आदमी की दृष्टि यह होती है कि शिष्य की श्रद्धा से ही उसको ज्ञान हुआ है। किन्तु असली महिमा उस गुरु की ही है, जिसने शिष्य को आत्मबोध कराया, आत्मज्ञान के मार्ग पर चलाया ।

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