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लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पिंकी करमाकर ऐसे पाल रही हैं परिवार का पेट, रोजाना मिलते हैं महज 167 रुपये

Thu, 12 Aug 2021 05:25 PM IST
Ananya Chaturvedi लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Ananya Chaturvedi Updated Thu, 12 Aug 2021 05:25 PM IST
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this is how pinky karmakar is surviving today
पिंकी करमाकर - फोटो : Instagarm/thecitizensdaily

हमारे देश की कई पुराने खिलाड़ी जिन्होंने एक समय में कड़ी मेहनत के बाद ओलंपिक या एशियन गेम्स जैसे खेलों में देश का नाम रोशन किया था और मैडल भी ले कर आये थे, आज उन्ही खिलाड़ियों के बारे में देश भूल चुका है। ऐसे कितने ही खिलाड़ी हैं जो आज दाने दाने को मोहताज हो चुके हैं।  सरकार को दोष देते हुए यह खिलाड़ी आज छोटे-मोटे काम कर अपनी जीविका चला रहे हैं।

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ऐसी ही एक खिलाड़ी हैं पिंकी करमाकर जिन्होंने लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। पिंकी की पिछले दस सालों से ज़िन्दगी बड़ी ही कठिनाईयों से गुजर रही है। पिंकी ने इन दस सालों में बहुत कुछ देखा और दाने दाने की मोहताज होने तक की नौबत आ गयी। पिंकी का कहना है की सरकार की तरफ से उन्हें काफी मदद की उम्मीद थी लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। पिंकी को सिर्फ और सिर्फ निराशा का सामना करना पड़ा।
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नौ साल पहले जिस पिंकी को सीएम का काफिला चाय बागान स्तिथ घर तक छोड़ने आया था, आज वही पिंकी पायी पायी को मोहताज हो चुकी हैं। पिंकी की आर्थिक स्तिथि इस वक़्त काफी ख़राब है। मां की मृत्यु और पिता के बुजुर्ग होने के बाद अब पिंकी ही अपने परिवार का ध्यान रखती हैं। एक वही अब अपने घर में जो की घर की रोटी चलती हैं।   
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पिंकी करमाकर ने साल 2012 के लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उन्होंने कक्षा 10 वीं रहते हुए एक मशालची के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया था। पिंकी ने राष्ट्रीय तीरंदाज बनने का सपना देखा था। फिलहाल वे असम के डिबरूगढ़ क्षेत्र में रह रही हैं और वहां के बोरबोरूआ चाय के बागानों में डेली वेज वर्कर के तौर पर काम कर रही हैं। उनके एक दिन की कमाई 167 रुपए है। उनकी मां के गुजर जाने और पिता के रिटायर हो जाने पर जब परिवार को गंभीर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा तो उसका गुजारा करना मुश्किल हो गया।

उनका कहना है कि उन्हें सरकार से पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिली। उन्हें यूनिसेफ ने चुना था। लेकिन उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए। उनका कहना है कि ओलंपिक के पथ प्रदर्शकों को हर दिन कुछ पारिश्रमिक मिलता है। लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। पिछले 10 सालों से वे आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही हैं। उनका एक छोटा भाई और दो छोटी बहनें भी हैं जिनकी पढाई का खर्चा तथा पूरे घर का भार पिंकी के कन्धों पर है।
 
साल 2011 में ओलंपिक के बाद पिंकी ने बाल विवाह और शराब बंदी की दिशा में जागरूकता अभियान भी चलाया था, वे आज भी समाज सेवा के अभियानों से जुड़ी हैं। वे अब भी इस लड़ाई को जारी रखना चाहती हैं और आज भी नेशनल लेवल आर्चर बनकर परिवार और अपने देश का नाम रोशन करने का सपना देखती हैं।

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