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Savitribai Phule Death Anniversary: देश की पहली महिला शिक्षक की पुण्यतिथि, पढ़ें जीवन से जुड़ी रोचक बातें
Sat, 09 Mar 2024 01:03 PM IST
शिवानी अवस्थी
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवानी अवस्थी
Updated Sat, 09 Mar 2024 01:03 PM IST
सार
फुले ने 19वीं शताब्दी में पुणे (महाराष्ट्र) के समाज में व्याप्त दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई थी। उनका योगदान तर्कसंगतता और मानवीय कारणों जैसे सत्य, समानता और मानवता के इर्द-गिर्द घूमता है।
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सावित्रीबाई फुले
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
Savitribai Phule Death Anniversary 2024 : घर परिवार को संभालने और रसोई में खाना बनाने तक सीमित महिलाएं आज पढ़ लिखकर नौकरी कर रही हैं। राजनीति से लेकर व्यापार और रक्षा विभाग जैसे क्षेत्रों में उच्च पदों पर कार्यरत हैं। महिलाओं को शिक्षा की ओर अग्रसर करने और उनके लिए शिक्षा का मार्ग खोलने का श्रेय एक महिला को ही जाता है। इनके नाम देश की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव है।
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भारत की पहली महिला शिक्षिका का नाम सावित्रीबाई फुले हैं। 10 मार्च को समाजसेवी सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि मनाई जाती है। वह महिलाओं के लिए काम करने वाली समाज सुधारक के तौर पर मशहूर हैं। फुले ने 19वीं शताब्दी में पुणे (महाराष्ट्र) के समाज में व्याप्त दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई थी। उनका योगदान तर्कसंगतता और मानवीय कारणों जैसे सत्य, समानता और मानवता के इर्द-गिर्द घूमता है।
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सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि के मौके पर उनके जीवन से जुड़ी रोचक बातों और उनके योगदान के बारे में जान लीजिए।
सावित्रीबाई फुले की जीवन परिचय
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र राज्य के सतना जिले के नायगांव में हुआ था। उस दौर में दलितों के साथ भेदभाव होता था। दलितों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। खासकर महिलाओं को पढ़ाई की बिल्कुल अनुमति नहीं थी। लेकिन सावित्रीबाई फुले न केवल खुद शिक्षित हुईं, बल्कि अपनी जैसी कई महिलाओं के लिए शिक्षा का मार्ग खोला।
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एक बार जब सावित्रीबाई छोटी थीं, जो उन्हें कहीं से एक अंग्रेजी किताब मिली। जब पिता ने सावित्रीबाई के हाथ में किताब देखी तो उसे छीन कर फेंक दिया। उनके पिता ने समझाया कि शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार सिर्फ उच्च जाति के पुरुषों को ही है। दलितों और खासकर स्त्रियों को पढ़ाई की इजाजत नहीं है।
सावित्रीबाई फुले की शिक्षा
बचपन में ही सावित्रीबाई फुले ने पढ़ाई करने की ठान ली थी। हालांकि महज 9 वर्ष की उम्र में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से कर दिया गया। जब उनका विवाह हुआ तो सावित्रीबाई फुले अशिक्षित थी और उनके पति ज्योतिराव फुले तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। सावित्रीबाई ने जब पति के समक्ष शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा जाहिर की तो ज्योतिराव फुले ने उन्हें इसी इजाजत दी और पढ़ने के लिए स्कूल भेजा।
शादी के बाद स्कूल जाना सावित्रीबाई के लिए आसान नहीं था। उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन पर पत्थर फेंके गए। कूड़ा और कीचड़ डाला गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और स्कूल जाना जारी रखा।
पहला बालिका स्कूल
सावित्रीबाई फुले ने न केवल खुद पढ़ाई की, बल्कि अपने जैसी तमाम लड़कियों को शिक्षा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और मार्ग भी खोले। बालिकाओं को पढ़ाई के लिए संघर्ष न करना पड़े, ये सोचकर सावित्रीबाई फुले ने साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में देश का पहला बालिका स्कूल स्थापित किया। एक-एक कर सावित्रीबाई फुले ने बालिकाओं के लिए 18 स्कूलों का निर्माण कराया।
शिक्षा को लेकर उनके प्रयासों के कारण सावित्रीबाई फुले को देश की पहली महिला शिक्षक माना जाता है। सावित्रीबाई फुले देश के पहले बालिका स्कूल की प्रधानाचार्या भी रहीं। 10 मार्च 1897 को 66 वर्ष की आयु में सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया।

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