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झारखंड की इस महिला ने मेंटल हेल्थ की दिशा में किया सकारात्मक काम, बदला 36 हजार से ज्यादा महिलाओं का जीवन

Mon, 26 Jul 2021 03:18 PM IST
संकल्प सिंह लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संकल्प सिंह Updated Mon, 26 Jul 2021 03:18 PM IST
सार

सुमित्रा महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पिछले लंबे समय से काम कर रही हैं। उन्होंने पिछले 12 वर्षों के दौरान मानसिक स्वास्थ्य के अलावा महिलाओं-बच्चों के पोषण, हिंसा और शिशु  मृत्यु दर की दिशा में कई सकारात्मक कार्य किए हैं।

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Jharkhand woman sumitra is working positive job towards mental health of women in remote villages of Jharkhand
सुमित्रा गगरई - फोटो : Facebook/Sumitra_Gagarai

विस्तार

झारखंड में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार की संख्या काफी ज्यादा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो पिछले कुछ सालों के अंदर झारखंड में महिलाओं को डायन समझकर उनको मारने की संख्या में वृद्धि हुई है। स्थानीय भाषा में इसको डायन बिसाही कहते हैं। हालांकि दूसरी तरफ कई क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव भी आए हैं। शिशु मृत्यु दर में सुधार हुआ है। पहले जहां हर 1000 बच्चों में 44 बच्चों की मौत होती थी। अब यह संख्या प्रति 1000 बच्चों में 29 पर आ गई है। झारखंड के सुदूर जनजातीय अंचलों में काम करने वाली सुमित्रा गगरई का कहना है कि हालात तो सुधरें हैं, पर अभी भी ऐसी कई जगह हैं, जहां पर काम करने की सख्त जरूरत है। सुमित्रा महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पिछले लंबे समय से काम कर रही हैं। उन्होंने पिछले 12 वर्षों के दौरान मानसिक स्वास्थ्य के अलावा महिलाओं-बच्चों के पोषण, हिंसा और शिशु  मृत्यु दर की दिशा में कई सकारात्मक कार्य किए हैं।   

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सुमित्रा सुदूर इलाकों में पड़ने वाले गावों में स्वास्थ्य को संस्कृति बनाने के मिशन पर काम कर रही हैं। उन्होंने अब तक 36 हजार से भी ज्यादा महिलाओं की जिंदगी को बदला है। सुमित्रा ने महिलाओं की जिंदगी को बेहतर करने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए। वे एक स्थानीय एनजीओ 'एकजुट' में कोऑर्डिनेटर का काम करती हैं। वे स्व-सहायता समूहों और महिलाओं के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करती हैं। 

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मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में काम करने के लिए सुमित्रा को साल 2020 में कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) फाउंडेशन ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में वुमेन एक्जम्पलर अवार्ड से सम्मानित किया था। सुमित्रा का संबंध 'हो' जनजाति से है। उनकी उम्र 31 वर्ष की है। उनका खुद का जीवन काफी गरीबी में बीता था। सुमित्रा बताती हैं कि 16 वर्ष की उम्र में उनकी बहन ने मानसिक डिप्रेशन में ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया।  

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उनका कहना है कि झारखंड के कई इलाकों में आज भी अंधविश्वास काफी ज्यादा है। हर चीज का इलाज झाड़-फूंक के साथ किया जाता है। महिलाएं तीन-तीन दिनों तक प्रसव के पीड़ा को झेलती हैं। इन्हीं सब चीजों को बदलने के लिए सुमित्रा कई गावों में घूम-घूमकर नुक्कड़ नाटकों और कहानियों के माध्यम जागरूक संदेश देती हैं। 

सुमित्रा कहती हैं कि झारखंड के सुदूर इलाकों में अंधविश्वास के चलते बच्चों के जन्म के बाद गर्भनाल काटने को लेकर कई कुरीतियां थीं। इस दौरान किसी भी प्रकार की साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता था। इसी वजह से नवजात बच्चों की मृत्यु दर काफी ज्यादा थी। इसके बाद सुमित्रा और उनकी साथियों ने खेल-खेल में वहां की अधिकांश महिलाओं को इसके बारे जागरूक किया। उनके इन्हीं प्रयासों के चलते नवजात बच्चों की मृत्यु दर में 45 फीसदी तक कमी आई है। इसी वजह से सुमित्रा के एकजुट संस्था के जागरुकता मॉडल का जिक्र लोकप्रिय मेडिकल जर्नल लांसेट में भी किया गया था।   
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