Muthulakshmi Reddy: भारत की पहली महिला विधायक मुथुलक्ष्मी रेड्डी, देवदासी प्रथा खत्म करने में निभाई अहम भूमिका
उस दौर में मुथुलक्ष्मी अपने स्कूल की अकेली लड़की थीं। समाज के रूढ़िवादियों ने स्कूल में एक लड़की के पढ़ने को लेकर काफी हंगामा किया था, लेकिन मुथुलक्ष्मी ने निडरता से सबका सामना करते हुए आगे की पढ़ाई जारी रखी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय महिलाओं के नाम कई उपलब्धियां हैं। आधुनिक भारत की महिलाएं देश विदेश में अपने परिश्रम, हुनर से सफलता का परचम लहरा रही हैं लेकिन इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो कई ऐसी महिलाएं रहीं, जिन्होंने उस दौर में भी कुछ ऐसा कर दिखाया जो इतिहास में हमेशा के लिए यादगार बन गया। देश की आजादी से पहले राजशाही सत्ता संभालने वाली राजकुमारी और रानियों से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों की तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने वाली महिला योद्धाओं तक, स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शामिल होने वाली महिलाओं से लेकर आजाद भारत की राजनीति का हिस्सा बनने वाली महिलाओं ने नारी शक्ति की मिसाल पेश की। इतिहास के पन्नों में ऐसी ही एक नारी शक्ति की उपलब्धियां दर्ज हैं, जिन्होंने महिला विरोधी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। इस महिला का नाम मुथुलक्ष्मी रेड्डी है, जिन्होंने देश में व्याप्त देवदासी प्रथा की अंत किया था। जानें मुथुलक्ष्मी रेड्डी के बारे में।
कौन है मुथुलक्ष्मी रेड्डी
मुथुलक्ष्मी रेड्डी के नाम कई उपलब्धियां हैं। वह भारत की पहली हाउस सर्जन रही हैं। इसके अलावा देश की पहली महिला विधायक मुथुलक्ष्मी रेड्डी थीं। मद्रास विधान परिषद की पहली महिला उपाध्यक्ष का गौरव भी मुथुलक्ष्मी रेड्डी के नाम है।
मुथुलक्ष्मी रेड्डी का जीवन परिचय
तमिलनाडु के पुडुकोट्टई में 30 जुलाई 1886 को मुथुलक्ष्मी रेड्डी का जन्म हुआ था। मुथुलक्ष्मी के पिता का नाम नारायण स्वामी अय्यर था, जो महाराजा कॉलेज में प्राध्यापक पद पर कार्यरत थे। वहीं उनकी मां चंद्रामाई, देवदासी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं।
मुथुलक्ष्मी की शिक्षा
बचपन से ही पढ़ाई में होनहार मुथुलक्ष्मी की पढ़ाई घर पर ही हुई। लड़की होने के कारण महाराजा कॉलेज में उनका दाखिला नहीं हो सका। हालांकि पिता और कुछ शिक्षकों ने उन्हें घर पर ही पढ़ाया, बाद में वह मैट्रिक की परीक्षा में टॉपर रहीं। पढ़ाई में उनकी रुचि और उपलब्धि को देखते हुए पुडुकोट्टई के मार्तंड भैरव थोंडामन राजा ने मुथुलक्ष्मी को वजीफा दिलाकर हाई स्कूल में दाखिला दिलाया।
उस दौर में वह अपने स्कूल की अकेली लड़की थीं। समाज के रूढ़िवादियों ने स्कूल में एक लड़की के पढ़ने को लेकर काफी हंगामा किया था, लेकिन मुथुलक्ष्मी ने निडरता से सबका सामना करते हुए आगे की पढ़ाई जारी रखी। वह मद्रास मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभाग की पहली भारतीय लड़की बनीं। कॉलेज में सर्जरी की टॉपर और गोल्ड मेडलिस्ट बनने की उपलब्धि भी हासिल की।
मुथुलक्ष्मी की शादी और पारिवारिक जीवन
बाद में साल 1914 में डॉक्टर टी सुन्दर रेड्डी से मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने शादी की। शादी के लिए उन्होंने पति के सामने शर्त रखी कि डाॅ टी सुंदर रेड्डी उनकी सामाजिक गतिविधियों और किसी जरूरतमंद की चिकित्सकीय सहायता करने के मामले में दखल नहीं देंगे। मुथुलक्ष्मी का चयन इंग्लैंड जाने के लिए भी हुआ था। लेकिन परिवार ने उन्हें विदेश जाने से मना कर दिया। तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री पानागल राजा ने सरकार को मुथुलक्ष्मी को एक साल की वित्तीय सहायता देने का भी निर्देश दिया था।
महिलाओं के खिलाफ कुरीतियों का अंत
साल 1926 में मुथुलक्ष्मी का नामांकन महिला भारतीय संघ द्वारा मद्रास विधान परिषद के लिए हुआ। साल 1926 से 30 तक वह परिषद की सदस्य रहीं। मुथुलक्ष्मी ने महिलाओं की उत्थान की दिशा में कार्य करते हुए बाल विवाह रोकथाम कानून, देवदासी प्रथा का अंत, वेश्यालय को बंद कराने और महिलाओं व बच्चों की तस्करी रोकने के लिए कानून बनाने में अहम भूमिका निभाई।
देवदासी प्रथा के खिलाफ कानून
उस दौर में देवदासी प्रथा चलन में थी, जिसमें किशोरियों व महिलाओं को भगवान की शरण में दे दिया जाता था। मुथुलक्ष्मी ने देवदासी प्रथा को खत्म करने के लिए कानून पास कराया। कट्टर समूहों के विरोध के बाद भी मद्रास विधान परिषद ने सर्वसम्मति से इस कानून का समर्थन किया और 1947 में देवदासी प्रथा के खिलाफ प्रेषित विधेयक आखिरकार कानून बन गया।

कमेंट
कमेंट X