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अपनों के होते हुए भी अनाथ हैं वे
अमर उजाला, (मालेरकोटला/संगरूर)
Updated Wed, 01 Jan 2014 11:06 PM IST
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नए वर्ष के आगाज में सरहद पार आने-जाने के लिए वीजा शर्तों को आसान करने की उम्मीद पाकिस्तान की उन महिलाओं को बंधी है जो अर्से से अपने मां-बाप को मिलने की बाट जोह रही हैं।
जी हां, भारत-पाकिस्तान संबंधों में आई कड़वाहट के दौरान जहां दोनों मुलकों में व्यापारिक रूप से कमी आई है, वहीं इस माहौल में पाक के गुजरांवाला, लाहौर और फैसलाबाद से बयाह कर भारतीय पंजाब के मालेरकोटला शहर में आई दर्जनों ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें अर्से से अपने सगे संबंधियों का चेहरा नजर नहीं आया।
वीजा नियमों में सख्ती और वीजा से पूर्व पुलिस जांच में होने वाली बेतहाशा भागदौड़ के कारण न तो ये महिलाएं अपने मायके जा पाई हैं और न ही कोई उधर से इधर आ पाया है। दोनों मुल्कों के बीच खींची दीवार के कारण वे अपनों के होते हुए भी अनाथ हो गईं। हालात ये हैं कि कई लड़कियां अब दादी और नानी बन चुकी हैं लेकिन उन्हें आज भी अपने माता-पिता और भाइयों के आने का इंतजार है।
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मालेरकोटला के मुहल्ला नई बस्ती में रहने वाली शेख हसीन जाहिरा ने अमर उजाला से बातचीत में अपना दर्द बयान किया है। जाहिरा शिया समुदाय से संबंध रखती हैं और करीब तीस साल पहले उनका निकाह पाक से यहां के लिए हुआ था, लेकिन वीजा में सख्त नियमावली के कारण आज तक हालात यह रहे है कि उनके बच्चे अपने नाना-नानी और मामा-मामी को देखने के लिए तरसते रहते हैं।
पच्चीस साल से मिलने को बेकरार
786 चौक के पास रहने वाली महिला रूबीना शबनम और अजीमपुरा में रहने वाली महिला नसीम अख्तर का कहना है कि पच्चीस साल से वे अपने निकटवर्ती रिश्तेदारों को मिलने के लिए बेकरार हैं। पाक के लाहौर और फैसलाबाद में उनकी बहनें रहती हैं, लेकिन वीजा नियमों में भारी परेशानियों के कारण उन्हें वहां जाने का मौका नहीं मिला। बार-बार वीजा आवेदन के बावजूद उन्हें दिल्ली के धक्के खाने पड़ रहे हैं और पेश आ रही कठिनाइयों के कारण अब उनका हौसला पस्त होने लगा था। अब उन्हें उम्मीद बंधी है कि नए वर्ष के आगाज में दोनों देशों द्वारा एक दूसरे की ओर एक-एक कदम आगे बढ़ाया जाएगा जिससे वे अब अपने खून के रिश्तेदारों से जी भरकर मिल सकेंगी।
बच्चे पूछते हैं अम्मी नानी के घर कब जाएंगे
स्कूलों में सर्दियों की छुट्टियां हो चुकी हैं और ज्यादातर बच्चे अपने ननिहाल जाने की तैयारी कर चुके हैं किंतु मालेरकोटला की मदीना बस्ती में रहने वाली छह साल की मासूम बच्ची सफियां को इस बार भी अपनी नानी का इंतजार है। मुहल्ले के अन्य बच्चों को ननिहाल जाते देख सफिया अपनी मां से लिपटकर बोली, अम्मी हम नानी के घर कब जाएंगे। सफिया की मां के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे क्योंकि पिछले 16 साल से खुद सफियां की मां ने अपने मायके का रुख नहीं किया था। कारण एक ही था, उसका वीजा सख्त नियमावली की वजह से लटकता रहा है।
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जी हां, भारत-पाकिस्तान संबंधों में आई कड़वाहट के दौरान जहां दोनों मुलकों में व्यापारिक रूप से कमी आई है, वहीं इस माहौल में पाक के गुजरांवाला, लाहौर और फैसलाबाद से बयाह कर भारतीय पंजाब के मालेरकोटला शहर में आई दर्जनों ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें अर्से से अपने सगे संबंधियों का चेहरा नजर नहीं आया।
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वीजा नियमों में सख्ती और वीजा से पूर्व पुलिस जांच में होने वाली बेतहाशा भागदौड़ के कारण न तो ये महिलाएं अपने मायके जा पाई हैं और न ही कोई उधर से इधर आ पाया है। दोनों मुल्कों के बीच खींची दीवार के कारण वे अपनों के होते हुए भी अनाथ हो गईं। हालात ये हैं कि कई लड़कियां अब दादी और नानी बन चुकी हैं लेकिन उन्हें आज भी अपने माता-पिता और भाइयों के आने का इंतजार है।
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मालेरकोटला के मुहल्ला नई बस्ती में रहने वाली शेख हसीन जाहिरा ने अमर उजाला से बातचीत में अपना दर्द बयान किया है। जाहिरा शिया समुदाय से संबंध रखती हैं और करीब तीस साल पहले उनका निकाह पाक से यहां के लिए हुआ था, लेकिन वीजा में सख्त नियमावली के कारण आज तक हालात यह रहे है कि उनके बच्चे अपने नाना-नानी और मामा-मामी को देखने के लिए तरसते रहते हैं।
पच्चीस साल से मिलने को बेकरार
786 चौक के पास रहने वाली महिला रूबीना शबनम और अजीमपुरा में रहने वाली महिला नसीम अख्तर का कहना है कि पच्चीस साल से वे अपने निकटवर्ती रिश्तेदारों को मिलने के लिए बेकरार हैं। पाक के लाहौर और फैसलाबाद में उनकी बहनें रहती हैं, लेकिन वीजा नियमों में भारी परेशानियों के कारण उन्हें वहां जाने का मौका नहीं मिला। बार-बार वीजा आवेदन के बावजूद उन्हें दिल्ली के धक्के खाने पड़ रहे हैं और पेश आ रही कठिनाइयों के कारण अब उनका हौसला पस्त होने लगा था। अब उन्हें उम्मीद बंधी है कि नए वर्ष के आगाज में दोनों देशों द्वारा एक दूसरे की ओर एक-एक कदम आगे बढ़ाया जाएगा जिससे वे अब अपने खून के रिश्तेदारों से जी भरकर मिल सकेंगी।
बच्चे पूछते हैं अम्मी नानी के घर कब जाएंगे
स्कूलों में सर्दियों की छुट्टियां हो चुकी हैं और ज्यादातर बच्चे अपने ननिहाल जाने की तैयारी कर चुके हैं किंतु मालेरकोटला की मदीना बस्ती में रहने वाली छह साल की मासूम बच्ची सफियां को इस बार भी अपनी नानी का इंतजार है। मुहल्ले के अन्य बच्चों को ननिहाल जाते देख सफिया अपनी मां से लिपटकर बोली, अम्मी हम नानी के घर कब जाएंगे। सफिया की मां के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे क्योंकि पिछले 16 साल से खुद सफियां की मां ने अपने मायके का रुख नहीं किया था। कारण एक ही था, उसका वीजा सख्त नियमावली की वजह से लटकता रहा है।