चार साल के लंबे इंतजार के बाद ओलंपिक गेम्स फिर से शुरू होने वाले हैं। दुनियाभर के खिलाड़ियों के साथ-साथ भारतीय खिलाड़ी भी खेलों के इस महाकुंभ में पदक के लिए अपनी चुनौती पेश करेंगे। लेकिन पिछले दो ओलंपिक गेम्स में कुछ मौके ऐसे भी आए जब खिलाड़ी पदक जीतने के करीब पहुंच गए थे लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लगी। जानते हैं 2008 (बीजिंग) और 2012 (लंदन) में ऐसे खिलाड़ियों को।
2008 और 2012 के ओलंपिक गेम्स में जब पदक से चूक गया भारत
लंदन ओलंपिक में डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ा ने ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा में देश के लिए पदक की उम्मीद जगा दी थी। वह डिस्कस थ्रो के फाइनल में पहुंच गए थे, पदक की जंग में उन्होंने कड़ी चुनौती पेश की। लेकिन वह 64.79 मीटर दूर तक ही डिस्कस फेंक पाए और आठवें नंबर पर रहे।
2008 और 2012 के ओलंपिक गेम्स में जब पदक से चूक गया भारत
विकास गौड़ा के अलावा ट्रैक एंड फील्ड में महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया भी फाइनल में प्रवेश कर गई थीं लेकिन वह 63.62 मीटर दूर तक ही डिस्कस फेंक सकीं जिससे पदक की करीब नहीं आ सकी। वह स्पर्धा में छठे नंबर पर रहीं।
2008 और 2012 के ओलंपिक गेम्स में जब पदक से चूक गया भारत
बैडमिंटन के एकल स्पर्धा में महिला वर्ग से साइना नेहवाल ने कांस्य पदक जीता था तो पुरुष वर्ग के एकल में पी कश्यप ने गजब का खेल दिखाकर पदक की उम्मीद जगा दी थी, लेकिन क्वार्टर फाइनल में हार ने उनके इतिहास रचने का मौका गंवा दिया।
2008 और 2012 के ओलंपिक गेम्स में जब पदक से चूक गया भारत
मुक्केबाजी में भी भारत को दो से ज्यादा पदक मिल सकते थे लेकिन दो मुक्केबाज क्वार्टर फाइनल में ही हार गए। लाइट फ्लाइवेट वर्ग में एल देवेंद्रो सिंह क्वार्टर फाइनल में पहुंच गए थे और अगर वह एक मुकाबला जीतकर सेमीफाइनल में पहुंच जाते तो पदक पक्का हो जाता।