ईश्वर के सगुण साकार रूप आकार, वेष-विन्यास, रहन-सहन, वाहन आदि अद्भुत और अविश्वसनीय हैं। ईश्वर के साथ ऐसे विचित्र कथानक जुड़े हैं कि देवों और अवतारों के बारे में कल्पना करना कठिन हो जाता है। चार मुख के ब्रह्मा, हाथी की सूंड वाले गणेश, वानर की शक्ल लिए हनुमान की छवि। श्रद्धा भक्ति के कारण मान लेना पड़ता है कि इस तरह के रूपों का कहीं कोई अस्तित्व है। विभिन्न देवों की कल्पना इन रहस्यों और आदर्शो में से ही है। शिव के स्वरूप की मीमांसा से इस तथ्य को समझना उचित होगा।
महाशिवरात्रि 2018: भगवान शिव के हर स्वरूप में छिपा है एक अलौकिक रहस्य, जानिए इसके मायने
शिव के सिर पर चंद्रमा मन की अवस्था का प्रतीक है। चंद्रमा ज्ञान का प्रतीक भी है। सागर मंथन के समय देवों और दानवों का द्वंद्व टालने के लिए शंकर ने विष पी लिया था। तभी से उनका कंठ नीला है। इस कथानक का सीधा संबंध योग से है। योगी पुरुष अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार पा लेता है, जिससे उस पर बड़े तीक्ष्ण विषों, मान-अपमान, कटुता-क्लेश आदि का कोई प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह साधारण घटनाएं मानकर पचा लेता है और लोक की सेवा करते समय उन्हें स्वार्थ का ध्यान नहीं रहता। निर्विकार भाव से वह खुद अपमान और लांछनाओं का विष पीता है, लेकिन औरों के लिए अमृत ही लुटाता रहता है।
शिव ने शरीर पर भस्म रमा रखी है। योग की पूर्णता पर संयम की सिद्धि होती है। योगी अपने प्राण और ऊर्जा को शरीर में रमा लेते हैं, जिससे सौन्दर्य फूट पड़ता है। उसे बाह्य अलंकारों द्वारा सौन्दर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती। अक्षुण संयम ही उसका अलंकार बन जाता है, जिससे उसका स्वास्थ्य और शरीर सब कांतिमय हो जाता है।
शिव की एक तीसरी आंख भी मानी गई है। योग की भाषा में इसे तीसरा नेत्र खुलना या आज्ञा-चक्र का जागृत होना भी कहते हैं। प्रसंग है कि शिवजी ने एक बार तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भी जला दिया था। योगी का यह तीसरा नेत्र बड़ा महत्व रखता है। सामान्य स्थितियों में वह विवेक के रूप में जागृत रहता है, पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि वासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते।
शिव का वाहन बैल है। बैल सौम्यता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है, जो स्वभाव से सरल और सौम्य होता है, जिनमें छल-कपट आदि विकार नहीं होते। जिनमें निरन्तर काम करने की दृढ़ता होती है, वे ही शिव के वाहन बनते हैं।