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देव दीपावली : जब पृथ्वी पर उतर आता है पूरा देवलोक

Fri, 23 Nov 2018 07:35 AM IST
मधुकर मिश्र, अमर उजाला
मधुकर मिश्र, अमर उजाला Updated Fri, 23 Nov 2018 07:35 AM IST
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significance of dev deepawali at varanasi
देव दीपावली 2018

बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी यूं तो साल के 12 महीने तीर्थयात्रियों, सैलानियों से गुलजार रहती है। लेकिन देशी-विदेशी पर्यटकों को कार्तिक पूर्णिमा का विशेष रूप से इंतजार रहता है क्योंकि देव दीपावली के दिन असंख्य दीपकों की रोशनी से नहाए हुए काशी के घाट आसमान में टिमटिमाते तारों से नजर आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा की शाम जब लाखों दिए काशी की उत्तरवाहिनी गंगा किनारे एक साथ जलते हैं, तो रोशनी से सराबोर गंगा के घाट के घाट देवलोक के समान प्रतीत होते हैं। काशी में गंगा किनारे इसी अनुपम छटा को देखने और अपने कैमरे में कैद करने के लिए लोग दुनिया के कोने-कोने से यहां पहुंचते हैं।

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dev deepawali - फोटो : अमर उजाला

देव दीपावली की पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के कुछ दिन पहले देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु 4 महीने की निद्रा के बाद जागते हैं। जिसकी खुशी में सभी देवता स्वर्ग से उतरकर बनारस के घाटों पर दीपों का उत्सव मनाते हैं। इसके अलावा मान्यता यह भी है कि भगवान शंकर ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुर नाम के असुर का वध करके काशी को मुक्त कराया था। जिसके बाद देवताओं ने इसी कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने सेनापति कार्तिकेय के साथ भगवान शंकर की महाआरती की और इस पावन नगरी को दीप मालाओं से सजाया था।

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dev deepawali - फोटो : अमर उजाला

इस तरह लिया भव्य रूप
1986 में तत्कालीन काशी नरेश डा. विभूति नारायण सिंह ने देश की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने वाली पावन नगरी में देव दीपावली को भव्यता के साथ मनाना शुरु किया गया था। उसके बाद से यह लोकोत्सव जनोत्सव में तब्दील हो गया है। आलम यह है कि देव दीपावली की शाम जब गंगा के अर्धचंद्राकार घाटों पर हजारों-लाखों दिए एकसाथ जलते हैं तो यह पूरा क्षेत्र जगमगा उठता है। इस पावन पर्व पर गंगा घाटों की छटा देखते ही बनती है। इस बार यह पर्व 23 नवंबर को है।

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dev deepawali - फोटो : अमर उजाला

मोक्ष की नगरी में देवताओं का महापर्व
मान्यता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो सूर्य की पहली किरण इसी पावन काशी नगरी की धरती पर पड़ी थी। परंपराओं और संस्कृतियों से रची-बसी काशी की देश दुनिया में पहचान बाबा विश्वनाथ, गंगा और उसके पावन घाटों से है। यहां के लोगों की सुबह हर-हर गंगे के साथ शुरू होती है तो शाम उसी मोक्षदायिनी गंगा के तट पर प्रतिदिन होने वाली आरती जय मां गंगे के साथ खत्म होती है। श्रावण में शिवपूजन और गंगा तीरे होने वाली शाम की आरती के बाद यदि कोई पर्व लोगों को इस शहर की ओर आकर्षित करता है तो वह देव दीपावली ही है।

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dev deepawali - फोटो : अमर उजाला

आस्था बनी आकर्षण का केंद्र
काशी के घाटों में मनाए जाने वाली इस देव दीपावली की लोकप्रियता आज देश-विदेश तक पहुंच चुकी है। आस्था से जुड़े इस दीपोत्सव ने आज इतना बड़ा रूप ले लिया है कि पर्यटन विभाग आज खुद इसको प्रचारित-प्रसारित करता है। इस अद्भुत नजारे को देखने और कैमरे में कैद करने के लिए लोग महीनों पहले से होटल और नावों की बुकिंग करवा लेते हैं, क्योंकि काशी में गंगा की लहरों के साथ इस प्रकाश भरी रात्रि में जिसने भी विचरण किया, वह इसमें खोकर ही रह गया।

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