Hariyali Teej 2025 : श्रावण मास की शुरुआत अगले महीने 11 जुलाई 2025 से होने जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रावण मास भगवान शिव और माता पार्वती की भक्ति का अत्यंत पवित्र समय होता है। यह माह शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दौरान शिवलिंग पर जल अभिषेक और पूजा-अर्चना करने से भोलेनाथ की असीम कृपा प्राप्त होती है। पूरे माह श्रद्धालु मंदिरों में जाकर शिव की आराधना करते हैं, जिससे मनचाहे फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-शांति आती है।
Hariyali Teej 2025: इस वर्ष किस दिन मनाई जाएगी हरियाली तीज? जानिए तिथि, पूजा विधि और महत्व
हरियाली तीज हिंदू धर्म का एक खास पर्व है, जो वैवाहिक सुख और समृद्धि का प्रतीक है। यह श्रावण मास में मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। आइए इस लेख में हरियाली तीज 2025 की तिथि पूजा विधि और महत्व के बारे में जानते हैं।
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हरियाली तीज 2025 की तारीख और तिथि
हरियाली तीज हर साल श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है, जो आमतौर पर नाग पंचमी से दो दिन पहले पड़ती है। इस साल, हरियाली तीज 27 जुलाई 2025, रविवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि 26 जुलाई 2025 को रात 10:41 बजे शुरू होगी और 27 जुलाई 2025 को रात 10:41 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर, यह पर्व 27 जुलाई को ही मनाया जाएगा। इस दिन रवि योग और शिव योग का संयोग बन रहा है, जो पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
हरियाली तीज की पूजा विधि
हरियाली तीज के दिन सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं व्रत रखती हैं। ऐसे में सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ हरे रंग के वस्त्र पहनें। घर को साफ करें और पूजा घर को फूलों से सजाएं। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मिट्टी या धातु से बनी भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मूर्तियां स्थापित करें। सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें, फिर शिवलिंग और माता पार्वती को जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, फूल, और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।
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इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें। अंत में शांति मंत्र और क्षमा मंत्र पढ़ें, और शिव-पार्वती की आरती करें। बाद में सुखी जीवन की कामना करते हुए महादेव और माता पार्वती का आशीर्वाद लें। पूजा के बाद प्रसाद बांटे और जरूरतमंदों को दान दें।
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हरियाली तीज भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। मान्यता है कि माता पार्वती ने 107 जन्मों के बाद 108वें जन्म में कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। इस दिन व्रत रखने से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। यह पर्व राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड में खास उत्साह से मनाया जाता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।