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कला और संस्कृति को सहेज परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रहीं है परिवार की ये बेटियां

Thu, 02 Jan 2020 10:52 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: अपराजिता शुक्ला Updated Thu, 02 Jan 2020 10:52 AM IST
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women who made her career in art and culture
- फोटो : अमर उजाला

जमाना बदल गया है। अब केवल लड़के ही परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने का हुनर नहीं रखते बल्कि लड़कियां भी इस काम में आगे आ रही हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर उनको सही तालीम या शिक्षा दी जाए तो वो कोई भी काम करने में किसी से पीछे नहीं रहेंगी। ऐसे ही कला और संस्कृति वाले इन घरानों की परंपरा को आगे बढ़ाने में केवल घर की बेटियां ही नहीं बल्कि बहुएं भी आगे आईं है और इन्होंने भी कमान संभाल रखी है। तो चलिए जानें उन होनहार बहुओं और बेटियों के बारे में जो परिवार की कला और संस्कृति की विरासत को सहेज रही हैं।

women who made her career in art and culture
- फोटो : अमर उजाला
यायावर लेखिका
रिटायरमेंट की उम्र में लोग थक-हार कर बैठ जाते हैं या सुविधाओं से दिन गुजारने की कोशिश करते हैं, लेकिन विनीता मिश्रा की बात ही कुछ अलग है। वे इन दिनों यायावरी में व्यस्त और मस्त हैं। जितनी शांत वे खुद हैं, उतनी ही दूर तक जाती है उनके लिखे शब्दों की आवाज। उनकी लेखनी स्त्री के विभिन्न मनोभाव, नारी सशक्तीकरण, आध्यात्मिक व सामाजिक विसंगति को आईना दिखाती नजर आती है। साइंस की स्टूडेंट होकर हिंदी में लेखन व रुचि के बारे में कहती हैं, बचपन से लिखती रही हूं। मेरी बेटी ने मेरा परिचय अपने दोस्तों से कराया। उसकी ही एक दोस्त ने मुझे बताया कि आपके लिखे हुए को पढ़ना लोगों का अधिकार है। इसके बाद ही मैंने छपने का महत्व जाना। कई कविताएं व लेख प्रकाशित हो चुके हैं। दो कविता संग्रह प्रकाशन की ओर हैं।
कोई संस्था नहीं, बस अपना काम किए जा रहीं

अक्सर वे गरीब बच्चों को पढ़ाती दिख जाती हैं तो कभी बस्तियों में पोलियो ड्रॉप का महत्व बताने पहुंच जाती हैं। फिलहाल महिलाओं को आर्थिक निर्भरता के महत्व का पाठ पढ़ा रही हैं। साथ ही अंगदान के लिए लोगों को प्रेरित कर रही हैं। (तस्वीर में- विनीता मिश्रा)

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- फोटो : अमर उजाला
बहुत देर से सीखना शुरू किया, पर क्लास में आगे रही
बचपन से ही डांस सीखना चाहती थीं, लेकिन घर से इसलिए नहीं निकल सकीं क्योंकि कोई ले जाने-लाने वाला नहीं था। थोड़ी बड़ी हुईं, रास्तों की समझ आई तो घर से जाने की इजाजत मिली और नेहा मिश्रा ने डांस क्लास जॉइन कर ली। कथक गुरु स्व. पंडित अर्जुन मिश्रा के बेटे पं. अनुज मिश्रा उनके बचपन के मित्र थे। उन्होंने ही अपने पिता की क्लास जॉइन करने की सलाह उन्हें दी। कथक गुरु ने उनका डांस देखा तो उन्हें अपनी शिष्या बना लिया। दस साल तक उनसे कथक सीखा। नेहा कहती हैं, मैंने कथक देर से सीखना शुरू किया, लेकिन पर क्लास में हमेशा आगे रही। खास बात है कि शिष्या से बहू बनीं नेहा अपनी पारिवारिक परंपरा को बखूबी सहेज रही हैं।
जब बॉलीवुड भी हुआ उनके डांस का दीवाना

नेहा ने अपनी ननद के साथ रियलिटी शो में हिस्सा लिया था। कहती हैं, जब लारा दत्ता समेत सभी जजों ने मेरी तारीफ की तो लगा कि यह मेरी नहीं, लखनऊ घराने की देन है। नेहा बताती हैं, मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था। वेट भी 99 किग्रा हो गया था, लेकिन थोड़ी सी ज्यादा मेहनत ने सब ठीक कर दिया। देश-विदेश में अपना हुनर दिखा चुकीं नेहा कहती हैं कि फिलहाल मेरी कोशिश कथक में पारंगत ऐसे डांसर तैयार करना है, जो दुनिया तक लखनवी घराने की खुशबू पहुंचा सकें। (तस्वीर में- नेहा मिश्रा/ नृत्यांगना)

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- फोटो : अमर उजाला
जिंदगी का मकसद लोगों को कला से जोड़ना
पति के तबादले के साथ ही जगह बदलती रहती थी। नए-नए अनुभव मिलते। लोक गायन और कविता लेखन दोनों साथ-साथ चल रहा था। इस बीच पति का ट्रांसफर लखनऊ हो गया। लोक गायिका, कवयित्री उमा त्रिगुणायत बताती हैं, लखनऊ आने के बाद अहसास हुआ कि एक कलाकार के लिए मंच कितना जरूरी होता है। इसी सोच ने सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संगठन अल्पिका को जन्म दिया। कवि गोष्ठियों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराने वाली उमा पिछले तीस साल से कलाकारों को मंच प्रदान करने के साथ-साथ लगातार उन्हें निखारने का भी काम कर रही हैं। 80 साल से भी अधिक की उम्र में उनका जज्बा कई युवाओं को मात देता दिखता है। कहती हैं कि पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी कर दीं, कुछ अपनी संतुष्टि के लिए भी तो करना है न।
मां की प्रेरणा ने बना दिया कोरियोग्राफर

उमा की बेटी रेणु ने अपनी पहचान कोरियोग्राफर व कथक गुरु के रूप में बना ली है। भातखंडे संगीत विवि से विरासत करने के बाद स्कॉलरशिप लेकर पं. बिरजू महाराज से प्रशिक्षण हासिल किया। हाल ही में उन्होंने सुपर-30 फिल्म के लिए कोरियोग्राफी की है। शास्त्रीय नृत्य के अलावा वे लेखन व साहित्य में भी उतना ही दखल रखती हैं। उन्होंने लखनऊ, देहरादून, मुंबई समेत कई शहरों में शिष्यों को मंच दिया है। टीवी सीरियलों में नृत्य निर्देशन के अलावा राजस्थानी फिल्म बाबा रामदेव पीर व हिंदी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में भी काम किया है। 2018 में उन्हें स्मार्क अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। (तस्वीर में- उमा त्रिगुणायत, रेणु शर्मा (बेटी) लोक गायिका/ नृत्यांगना)

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- फोटो : अमर उजाला
भारतीय भाषाओं को बचाने में जुटीं
इन दिनों शहर में भारतीय भाषाओं व बोलियों को बचाने की एक अनूठी मुहिम छिड़ी हुई है। कभी किसी के घर की बैठक, कभी किसी स्कूल तो कभी किसी ऑडिटोरियम में कुछ लोग आपको अलग-अलग कहानियों का पाठ करते मिल जाते हैं। दरअसल कहानियों, भारतीय भाषाओं और बोलियों को बचाने की इस अनूठी पहल को नाम दिया गया है कथा कथन। इसके लखनऊ चैप्टर की शुरुआत करने का श्रेय जाता है आकाशवाणी की वरिष्ठ उद्घोषिका नूतन वशिष्ठ व उनकी टीम को। नूतन बताती हैं, कथा कथन की शुुरुआत मार्च 2016 में मुंबई में जमीर गुलरेज ने की। उनकी पत्नी रेखा राव मेरी अच्छी मित्र हैं। उनसे हमें जानकारी मिली। यह कोशिश अच्छी लगी, बस यहीं से प्रेरणा मिली और 2017 में लखनऊ चैप्टर की शुरुआत हो गई। इसके बाद हम लोगों ने इलाहाबाद चैप्टर शुरू किया।
लोगों से जुड़ने की कोशिश

नूतन बताती हैं कि पुनीता और अनुपमा शरद हमारी एक्टिव मेंबर हैं। हम स्कूल-स्कूल संपर्क करते हैं। बाल संरक्षण गृह तक जाते हैं। हमारा मानना है कि यदि एक भी युवा को कहानी समझ में आ गई तो वह इंटरनेट पर सर्च करेगा, इससे साहित्य अन्य लोगों तक पहुंचेगा। (तस्वीर में- नूतन वशिष्ठ/ उद्घोषिका)

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