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मां के पदचिन्हों पर चल सहेज रहीं कला और संस्कृति की विरासत ये बेटियां

Wed, 01 Jan 2020 11:02 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: अपराजिता शुक्ला Updated Wed, 01 Jan 2020 11:02 AM IST
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inspirational story of women who made her career in art and culture
- फोटो : अमर उजाला

मां ने संघर्ष के बल पर कला और संस्कृति में एक मुकाम हासिल किया है। इस विरासत को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है उनकी बेटियों ने। इन बेटियों ने परिवार की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ ही इसे अपना करियर भी चुना। तो चलिए जानें ऐसी ही कुछ बेटियों के बारे में.....

inspirational story of women who made her career in art and culture
- फोटो : अमर उजाला
मां की परछाईं पेंटर बिटिया
पढ़ने से ज्यादा तृप्ति पाहवा को ड्राइंग अच्छा लगता था। कलर और ब्रश से लगाव ने उन्हें म्यूरल आर्टिस्ट बना दिया। पर, उनका दायरा कहीं ज्यादा विस्तार लिए है। आर्टिस्ट होने के साथ-साथ वे ऐसी गुरु हैं, जिनके स्टूडेंट्स में 14 साल से लेकर 55 साल तक की महिलाएं हैं। यही नहीं, आर्ट थेरेपी के जरिए वे कई युवतियों की जिंदगी में दोबारा खुशियां लेकर आईं। वे मोटिवेशनल स्पीकर नहीं हैं, लेकिन आर्ट सिखाते-सिखाते लोगों के जीवन को एक दिशा दे रही हैं। तृप्ति के स्टूडेंट दुबई, कनाडा, न्यू जर्सी, गुजरात, मुंबई तक में हैं जिन्हें वे ऑनलाइन सिखाती हैं। फिलहाल वे अमेरिका के एक रेस्टोरेंट के लिए इंडियन हेरिटेज पर पेंटिंग का ऑर्डर पूरा करने में व्यस्त हैं। कहती हैं कि आर्ट को कॅरिअर बनाने से लोग इसलिए हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें कमाएंगे क्या। सच तो ये है कि लोगों को मालूम नहीं कि आर्ट की मार्केटिंग भी होती है। लोगों को हम इसके बारे में भी सिखाते हैं।
बेटी में ट्रांसफर हो गया हुनर

तृप्ति गर्व से कहती हैं, गुलप्रीत ने सच कर दिखाया कि बेटी मां की परछाईं होती है। यूं तो वह इंटीरियर डिजाइनर बनना चाहती है, लेकिन मैं गर्व से कह सकती हूं कि उसे वह सबकुछ आता है, जो मैं कर सकती हूं। मिनिएचर हो, म्यूरल आर्ट हो या फिर कुछ और। गुलप्रीत के मुताबिक, अच्छा लगता है मम्मी के साथ काम करके। स्कूल में जब मैंने पहली बार मिट्टी के गणेश बनाए थे, तब किसी ने यकीन नहीं किया था, मुझे फिर से बनाकर दिखाना पड़ा। आज लोगों को विश्वास है कि मेरी बनाई पेंटिंग्स भी डिमांड में हैं।

inspirational story of women who made her career in art and culture
- फोटो : अमर उजाला
रंगमंच पर दो पीढ़ियां एक साथ
एक तरफ लोग ग्लैमर के पीछे भाग रहे हैं। एक-दो नाटक किए और निकल पड़ते हैं टेलीविजन या फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने। पर, राजधानी में हुसैनगंज निवासी रंगकर्मी अचला बोस ही नहीं, उनकी दोनों बेटियां दीपिका और श्रद्धा रंगमंच से जुड़ी तो उसी की होकर रह गईं। अचला बताती हैं कि वह 1985 में आकांक्षा थियेटर के जरिए रंगमंच से जुड़ीं। रंगमंच से जुड़ाव के कारण ही उन्हें 2007 के लिए 2016 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। बेटियों के थियेटर से जुड़ने के बाबत कहती हैं कि दोनों ने खुद ही तय किया कि उन्हें रंगमंच से ही जुड़ना है। 200 से अधिक नाटक कर चुकीं दीपिका बताती हैं, पहला नाटक पांच साल की उम्र में किया था। भातखंडे से कथक सीखा, लेकिन नृत्य से ज्यादा मन थियेटर में लगा। टेलीविजन में काम के बारे में कहती हैं कि थियेटर में स्ट्रगल जरूर है, लेकिन यह वास्तविकता के करीब है। टेलीविजन में वह बात नहीं। वहीं पिछले 14 साल से नाटक करती आ रहीं श्रद्धा कहती हैं कि भातखंडे से क्लासिक वोकल सीखा, लेकिन घर में थियेटर का माहौल था, इसलिए इसमें अपने आप रुचि बढ़ने लगी। अब तो यही हमारा जुनून है।
सिर्फ नाटक नहीं, एक संदेश भी

‘अहसास’ जैसे नाटक करके अपनी पहचान बनाने वाली अचला बोस कहती हैं कि रंगकर्म हमारे लिए समाज सेवा की तरह है। इसके जरिए हम अक्सर एक गंभीर मुद्दे को उठाते हैं। जैसे ‘अहसास’ एक दिव्यांग बच्चे की कहानी है, इसी तरह नाटक के जरिए हमने महिला मुद्दों को उठाने की कोशिश की है। दीपिका कहती हैं, यह सच है कि रंगकर्म एक वर्ग विशेष तक सीमित होकर रह गया है, लेकिन युवाओं के इससे जुड़ने के कारण यह नई पीढ़ी की पसंद बनता जा रहा है।

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inspirational story of women who made her career in art and culture
- फोटो : अमर उजाला
वाह ! वायलिन
पर मां-बेटी की जुगलबंदी

महानगर में एक घर ऐसा भी है जहां सुबह की शुरुआत वायलिन की सुमधुर धुनों से होती है। यहां जुगलबंदी होती है मां नंदिता पंडित और बेटी रत्नांगी पंडित के बीच। 30-45 मिनट के रियाज के बाद दोनों अपने-अपने काम में लग जाती हैं। संध्यावंदन की तरह यह सिलसिला शाम को भी बना रहता है। नंदिता बताती हैं, दरअसल मुझे तालीम हमारे पिता पं. दाऊजी गोस्वामीजी ने दी। उनको बजाता देख मुझे अच्छा लगता था। पिताजी की दी तालीम के साथ ही भातखंडे से हमने म्यूजिक वोकल एंड वायलिन में पढ़ाई की। लॉरेटो, शेरवुड में अपनी सेवाएं दे चुकीं नंदिता बताती हैं कि बेटी को समय नहीं दे पाने के कारण मैंने स्कूल छोड़ा। फिलवक्त कुछ बच्चों को तालीम दे रही हूं। नंदिता की स्टूडेंट्स दिशा और परीक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रस्तुतियां दे रही हैं।
एन. राजन जैसा बनने की ख्वाहिश

ला-मार्टीनियर की स्टूडेंट रत्नांगी कहती हैं, यह अलग बात है कि अपने स्कूल में वायलिन प्लेयर सिर्फ मैं हूं। अच्छा लगता है जब किसी भी प्रोग्राम के लिए टीचर्स कहती हैं, ‘रत्नांगी विल डू इट’। रत्नांगी नाना और मम्मी को तो आदर्श मानती ही हैं, साथ ही सुप्रसिद्ध वायलिन वादक एन. राजन जैसा बनना चाहती हैं। खास बात है कि कक्षा आठ में पढ़ने वाली रत्नांगी अपने थियेटर आर्टिस्ट पापा को स्टेज पर म्यूजिक में मदद करती हैं। 

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shakti - फोटो : अमर उजाला
गौरवान्वित करती तबले की थाप
महज छह साल की थी वह, जब उसने पहली बार पंडित किशन महाराज सभागार में तबला बजाया था। वहां मौजूद संगीत प्रेमियों ने कहा था कि इसके तबले की हर थाप इसके बेहतरीन भविष्य का संकेत दे रही है। तबसे पढ़ाई के साथ-साथ उसका रियाज जारी है। गर्विता मिश्रा के पिताजी स्वयं एक तबला वादक हैं और भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय में तालवाद्य विभाग में विभागाध्यक्ष हैं। गर्विता कहती हैं, आमतौर पर तबला पुरुष वाद्य माना जाता है, पर, अब लड़कियां भी इसमें अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। मंच शेयर कर रही हैं, टीचिंग में भी अच्छा स्कोप है। सीएमएस की छात्रा गर्विता (16) को उनके बेहतरीन प्रदर्शन के कारण 2016 में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिली।
पापा की विरासत अब मेरी

गर्विता कहती हैं, मैं जब छोटी थी तभी पापा के साथ प्रोग्राम में जाती-आती थी। हालांकि पापा ने कभी मुझ पर तबला सीखने के लिए दबाव नहीं डाला, लेकिन जब बजाने लगी तो रियाज के अनुशासन का पाठ उन्होंने ही पढ़ाया। मैं चाहती हूं कि पापा गर्व करें कि उनकी बेटी ने उनकी विरासत संभाली। मैं बनना तो आर्किटेक्ट चाहती हूं, पर तबला वादन मेरा पैशन है।

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