'बॉक्सिंग में एक मैरी कॉम है और एक ही रहेगी। दूसरी मैरी कॉम गढ़ना मुश्किल है!' इस तरह की बातें आप सुनते रहते होंगे। जब आप छह बार विश्व चैम्पियन रहीं और पद्म विभूषण मैरी कॉम से बात करते हैं तो -हर ओर उनके चहचहाने की आवाज गूंजती है। मैरी कॉम हर वक्त आत्म विश्वास से भरी नजर आती हैं। उनका मानना है कि वो आज जो कुछ भी हैं, वो इसलिए हैं क्योंकि ईश्वर उनसे बहुत प्यार करते हैं। 37 साल की उम्र में मैरी के पास विश्व चैम्पियनशिप के सात गोल्ड मेडल होने का रिकॉर्ड है, उनके पास ओलंपिक का कांस्य पदक है (वो ओलंपिक मेडल जीतने वाली पहली और इकलौती भारतीय महिला बॉक्सर हैं), उनके पास एशियन और कॉमनवेल्थ गोल्ड भी है।
मैरी कॉम की बॉक्सिंग क्वीन बनने की पूरी कहानी
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इनमें से ज़्यादातर मेडल उन्होंने मां बनने के बाद जीते हैं। 2005 में उन्होंने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था, वो भी सिजेरियन डिलीवरी के जरिए। वो जानती हैं कि टॉप पर बने रहने के लिए और मुकाबला करने के लिए क्या चाहिए होता है। उनकी कड़ी मेहनत ही उन्हें आत्मविश्वास देती है। मैरी की लंबाई पांच फीट दो इंच है और उनका वजन करीब 48 किलो है। ये सोचना कितना मुश्किल लगता है ना कि इतनी कम लंबाई और दुबले-पतले शरीर वाली एक चैम्पियन हो सकती है? कई लोगों को लगता है कि चैम्पियन की आंखों में माइक टायसन जैसा गुस्सा होना चाहिए और उसकी बॉडी लैंग्वेज मोहम्मद अली जैसी होनी चाहिए।
लेकिन मैरी जब रिंग में होती हैं तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती है। लेकिन वो अपने खेल में बहुत तेज और केंद्रित भी रहती हैं। उन्होंने बीबीसी से इंटरव्यू में कहा, "आपका कोच, सपोर्ट स्टाफ और परिवार आपको एक हद तक ही सपोर्ट दे सकता है। रिंग में आप अकेले होते हैं। रिंग के अंदर के वो 9 से 10 मिनट सबसे अहम होते हैं और आपको अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है। मैं ये बात अपने आप को बार-बार कहती हूं। और इस लड़ाई की तैयारी के लिए मैं शारीरिक और मानसिक तौर पर खुद पर काम करती हूं। मैं नई तकनीक सीखती हूं। मैं अपनी ताकत और मजबूतियों पर काम करती हूं। मैं अपने प्रतिद्वंदियों के खेल को समझती हूं और स्मार्टली खेलने में यकीन करती हूं।"
मैरी कहती हैं कि दो घंटे की बॉक्सिंग प्रैक्टिस काफी होती है, लेकिन अनुशासन होना बहुत जरूरी है। फिटनेस और खान-पान के मामले में भी वो मानती हैं कि इसमें एक बैलेंस होना चाहिए, बहुत ज्यादा नियम-कायदे की जरूरत नहीं है। वो घर का बना मणिपुरी खाना खाती हैं। उबली सब्जियों और मछली के साथ प्रोटीन से भरे चावल उनके खाने का हिस्सा हैं। मैरी अपने लिए खुद फैसले लेती हैं। वो अपने मूड के हिसाब से प्रैक्टिस का वक्त तय करती हैं। वो कहती हैं कि 37 साल की उम्र में जीतने के लिए ऐसे बदलाव करने जरूरी हैं। वो कहती हैं, "आज की मैरी और 2012 से पहले की मैरी में अंतर है। युवा मैरी एक के बाद एक लगातार पंच मारती थी। अब मैरी हमला करने के लिए सही वक्त का इंतजार करती है और इस तरह अपनी ऊर्जा बचाती हैं।"
मैरी ने अपना अंतरराष्ट्रीय सफर 2001 में शुरू किया था। शुरुआत में वो अपनी शारीरिक ताक़त और सहन-शक्ति पर निर्भर रहती थीं। लेकिन आज वो अपनी स्किल्स पर ज़्यादा भरोसा करती हैं।
वो अकेली महिला हैं जो रिकॉर्ड छह बार वर्ल्ड एमेच्योर बॉक्सिंग चैंपियन रही हैं, इसके अलावा वो अकेली बॉक्सर हैं जिन्होंने पहली सात विश्व चैम्पियनशिप में हर बार एक मेडल जीता है और अकेली बॉक्सर हैं (महिला या पुरुष) जिन्होंने आठ विश्व चैम्पियनशिप मेडल जीते हैं। वो एआईबीए विश्व महिला की रैंकिंग लाइट फ्लाइवेट केटेगरी में पहले पायदान पर रह चुकी हैं। वो दक्षिण कोरिया में 2014 में हुए एशियन खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला मुक्केबाज़ बनीं। इसके अलावा 2018 के कॉमनवेल्थ खेलों में भी स्वर्ण पदक जीतने वाली वो पहली महिला मुक्केबाज रहीं। इसके साथ ही वो अकेली मुक्केबाज हैं, जो रिकॉर्ड पांच बार एशियन एमेच्योर बॉक्सिंग चैम्पियन रही हैं। लेकिन मणिपुर की इस लड़की का यहां तक का सफर आसान नहीं था।

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