'खुले में शौच न करने की पहल' को किया जीवन समर्पित, अब राष्ट्रपति ने किया नारी शक्ति से सम्मानित
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कलावती को आत्म निर्भर बनने की प्रेरणा उनके पति जयराज सिंह से मिली। पति भी राजमिस्त्री थे। उनके निधन के बाद कलावती ने अपना पूरा जीवन खुले में शौचालय अभियान को दे दिया। रविवार को जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें दिल्ली में नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया तो फिर से उनके संघर्ष की कहानी लोगों के सामने आ गई। आज से करीब 42 साल पहले कलावती सीतापुर से अपने पति के साथ कानपुर आई थीं।
जेके मंदिर के पीछे राजापुरवा में रहते हुए वह भी अपने पति के साथ भवन निर्माण में मजदूरी करने लगी। इसी दौरान उन्होंने पति का हाथ बंटाने के लिए राजमिस्त्री के रूप में काम करना शुरू किया। कुछ समय बाद वह श्रमिकों के कल्याण के लिए गठित संस्था श्रमिक भारती से जुड़ गईं। इसके बाद कलावती ने पीछे नहीं देखा। वह अपने साथ और भी महिलाओं को जोड़कर पूरा कुनबा तैयार कर लिया।
कलावती यह अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से भी पहले से ही श्रमिक भारती के जरिए चला रही थीं। मोदी की मुहिम ने उन्हें और ताकत दी। जिसका परिणाम आज सभी के सामने है। सबसे पहले उन्होेंने करीब तीन लाख की लागत से एक सामुदायिक शौचालय का निर्माण किया था। अब तक वह 40 हजार से अधिक शौचालयों का निर्माण कर चुकी है।
पति की मौत के बाद वह वर्ष 2015 से अपनी बेटी और दामाद के साथ शिवराजपुर स्थित कुंवरपुर गांव में रह रही हैं। श्रमिक भारती के अमिताभ ने बताया कि कलावती में अपने काम के प्रति लगन थी, जिसकी वजह से वह इस मुकाम पर पहुंची।

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