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वो पहलवान जिसे कोई छूना नहीं चाहता था, पर क्यों?

Mon, 15 Jun 2015 09:33 AM IST
Updated Mon, 15 Jun 2015 09:33 AM IST
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वो पहलवान जिसे कोई छूना नहीं चाहता था, पर क्यों?

wrestler in maharashtra

हिंदुस्तान में अब वैसी जगहें कम हैं जहां औरतें नहीं जा सकतीं। कुश्ती सीखने की जगह जिसे महाराष्ट्र में तालीम कहते हैं, उनमें से एक है। 26 साल के दुबले-पतले अमोल साठे ने उस समय रोकते हुए कहा जब मैं तालीम में जाने की कोशिश कर रही थी जहां नौजवान लड़के कुश्ती के दांव-पेंच सीखते हैं। साठे ने कहा, "औरतें ध्यान भंग करती हैं इसीलिए उनका दूर रहना ही ठीक है।" लेकिन एक पत्रकार के लिए महिला-पुरूष का भेद उतना नहीं होता। मैनेजर से बात हुई और हमारा काम बन गया।



STORY-रूपा झा/बीबीसी संवाददाता

वो पहलवान जिसे कोई छूना नहीं चाहता था, पर क्यों?

wrestler in maharashtra

मिट्टी की ताकत-बड़े से अखाड़े में कुछ नौजवान पहलवान कसरत कर रहे थे। नंगे बदन केवल एक लंगोट में। उनकी पसलियां तेल लगने से और चमक रही थीं। मेरी मौजूदगी से वे सब चौंक गए। थोड़ा शर्माते और झेंपते हुए पहलवानों की टोली लाल मिट्टी के गड्ढे में जा पंहुची जहां वे प्रैक्टिस करते हैं। हनुमान की तस्वीरों से सजी दीवारों की पपड़ियां उखड़ रही हैं। कोई एसी, कोई फैन नहीं है। प्रैक्टिस से पहले साठे के साथ दूसरे पहलवान भी तैयारी करते हैं। 200 दंड बैठक, कुछ और कसरत और फिर कुछ ही पल में हर कोई लाल मिट्टी से सना हुआ दिखता है। ये कोई साधारण मिट्टी नहीं है। साठे बताते हैं कि इसमें मक्खन, कर्पूर , नींबू, चीनी, हल्दी और कई तरह की जड़ी-बूटी का इस्तेमाल होता है। अमोल मुस्कुरा कर कहते हैं, "इस मिट्टी से हमें ताकत मिलती है"।

वो पहलवान जिसे कोई छूना नहीं चाहता था, पर क्यों?

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जीतने की शर्त-माटी-कुश्ती के नियम अंतरराष्ट्रीय कुश्ती से अलग होते हैं। इस कुश्ती में खेल ख़त्म होने की कोई सीमा नहीं होती है। ये एक मिनट से एक घंटे तक चल सकती है। जीतने की शर्त केवल ये है कि अपने विरोधी पहलवान को चित कर उसकी पीठ को ज़मीन पर टिका दिया हो। अमोल बहुत फुर्तीले पहलवान हैं। मिनटों में वे अपने विरोधी को चित कर देते हैं। अमोल ने कई राष्ट्रीय खिताब जीते हैं। पहलवानी के जरिए अमोल ने जाति के उस शिकंजे से ख़ुद को आज़ाद किया जिसमें रहते हुए उनकी सांस उखड़ रही थी। अमोल अब अपनी पत्नी के साथ शहर में रहते हैं, दो कमरे के अच्छे से घर में।

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गांव से शहर तक का सफर आसान नहीं रहा होगा। उनके माता-पिता से मिलने हम सातारा ज़िले के मसौली गांव के लिए निकले।

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गांव पहुंचते ही ऐसा लगा कि अमोल कोई आम पहलवान नहीं कोई फिल्मी कलाकार हो। लोग उनसे मिलने के लिए उमड़ कर आते हैं। दो कमरे के छोटे से घर से उनके अभाव की ज़िंदगी का अंदाज़ा हो जाता है। बिना खिड़की के दो छोटे कमरे, एसबेस्टस की छत, पूरा घर भट्टी की तरह गर्म हो गया था। साठे के पिता मज़दूर हैं। अमोल को देखकर गर्व से मुस्कुराते हैं। वो कहते हैं, " हमारे पास तो पढ़ाई के साधन नहीं थे, कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे जीने की उम्मीद बंधती। मैं दूसरे दलित बच्चों की तरह अपने बच्चों को ज़िल्लत की ज़िंदगी जीने नहीं देना चाहता था इसीलिए उन्हें पहलवानी सिखाई। ये एक ज़रिया है जिससे हमने इज़्ज़त कमाई।"

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