पठानकोट: क्या शरीफ और सेना की सोच एक जैसी है?
पठानकोट में हुए चरमपंथी हमलों ने भारत की सुरक्षा और गुप्तचर तंत्र की खामियां उजागर कर दी हैं। इसके साथ ही यह भी साफ हो गया कि किस तरह दोनों देशों के रिश्ते सरकार के बाहर मौजूद तत्वों की दखलअंदाजी के शिकार हो सकते हैं। जब कभी दोनों देशों के बीच बातचीत का कार्यक्रम बनता है, कोई न कोई 'जिहादी' गुट इसकी राह में रोड़े अटका ही देता है।(इरफान हुसैन/पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक, बीबीसी)
पठानकोट: क्या शरीफ और सेना की सोच एक जैसी है?
साफ है, भारत सरकार यह उम्मीद करती है कि उसने पाकिस्तान के विदेश विभाग को जो सूचनाएं दी हैं, उसके आधार पर वहां की सरकार कार्रवाई करे। पर तुरत-फुरत नतीजे की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में चरमपंथियों का इस्तेमाल करने के पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए यह उम्मीद करना बेमानी है कि पठानकोट मामले की जांच तेजी से की जाएगी।
पठानकोट: क्या शरीफ और सेना की सोच एक जैसी है?
यदि मुंबई हमलों से बात समझी जाए, तो लगता है कि 'ठोस सबूत' देने की पाकिस्तानी मांग पठानकोट हमलों की जांच में भी रुकावट डालेगी। इसके बावजूद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत के साथ रिश्ते सुधारने की लगातार कोशिश करते रहे हैं। वे तल्खी से याद करते हैं कि किस तरह साल 1999 में वाजपेयी के लाहौर दौरे के कुछ हफ्तों बाद ही जनरल परवेज मुशर्रफ ने करगिल हमला कर दिया था। शरीफ खुद उस समय प्रधानमंत्री थे। सौभाग्य से पठानकोट हमलों के बाद भारत में वैसा राष्ट्रवादी उन्माद नहीं देखा गया, जैसा इसके पहले की 'सीमा पार कार्रवाइयों' के बाद हुआ था।
पठानकोट: क्या शरीफ और सेना की सोच एक जैसी है?
जवाब में पाकिस्तान पर हमला करने या राजनयिक रिश्ते तोड़ लेने की मांग नहीं की गई। शायद हमला करने वाले पहले की तरह बिना सोचे-समझे और हड़बड़ी में दिए गए जवाब भारत से नहीं मिलने से निराश हैं। दूसरी उत्साहजनक बात है पाकिस्तान का ये मानना है कि हमले की योजना वाकई वहीं बनी थी और वहीं से इसे शुरू भी किया गया था। यह पहले के पाकिस्तानी रवैये के उलट है। पहले होता यह था कि भारत में कहीं भी हमला होने के तुरंत बाद पाकिस्तान इसमें कोई हाथ होने से इनकार करने लगता था।
पठानकोट: क्या शरीफ और सेना की सोच एक जैसी है?
भारत के सबसे परिपक्व जवाब का कारण शायद नरेंद्र मोदी का हाल का लाहौर दौरा था। इस पहल पर राजनीति दांव लगाने के बाद मोदी यह नहीं चाहते थे कि ये पहल चरमपंथी हमले की भेंट चढ़ जाए। संयोगवश, एक कम चर्चित कश्मीरी गुट ने हमले की जिम्मेदारी ली। लेकिन, ऐसा प्रतीत होता है कि इस हमले की योजना काफी पेशेवर ढंग से बनाई गई थी और उसे उसी पेशेवर तरीके से अंजाम भी दिया गया था।