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आंबेडकर के आगे संघ-भाजपा हुए नतमस्तक?

Thu, 26 Nov 2015 06:12 PM IST
अपूर्वानंद लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अपूर्वानंद लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Thu, 26 Nov 2015 06:12 PM IST
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आंबेडकर के आगे संघ-भाजपा हुए नतमस्तक?

Why RSS and BJP giving importance to Ambedkar?

भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 26 नवंबर को बड़े पैमाने पर संविधान दिवस मनाने का ऐलान किया है। अलग-अलग मंत्रालय लेख-भाषण प्रतियोगिता के साथ समानता-दौड़ आदि का भी आयोजन कर रहे हैं। इसे एक बड़े अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है, जिसका दूसरा हिस्सा है अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी के भीतर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के प्रति उमड़ी श्रद्धा और प्रेम भाव। दूसरे, यह पिछले एक साल से अब तक जानी हुई तिथियों को नई-नई राष्ट्रीय तिथियों से बदलने की भी एक कवायद है। (अपूर्वानंद लेखक और विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए)


आंबेडकर के आगे संघ-भाजपा हुए नतमस्तक?

Why RSS and BJP giving importance to Ambedkar?

जिन दिवसों को हिलाया नहीं जा सकता उनसे जुड़े संदेश को पूरी तरह परिवर्तित कर देने की कोशिश तो साफ दिख रही है। गांधी जयंती को स्वच्छता दिवस में तब्दील कर गाँधी की राजनीति और जीवन के मूल संप्रदायवाद विरोधी विचार को सार्वजनिक स्मृति से मिटा देने का षड्यंत्र पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है, भले ही गाँधी को सरकार का स्वच्छता अभियान का ‘ब्रांड एंबेसडर’ क्यों न बना दिया गया हो। जो चश्मा गांधी के चेहरे से छिटककर बिड़ला भवन की जमीन पर तब गिर गया था, जब नाथूराम गोडसे ने मुसलमानों का पक्षधर होने के अपराध की सजा देने के लिए उन्हें गोली मारी थी, उसे उठाकर संघ की सरकार ने सरकारी विज्ञापन में सजा दिया है।

आंबेडकर के आगे संघ-भाजपा हुए नतमस्तक?

Why RSS and BJP giving importance to Ambedkar?

उसी तरह शिक्षक दिवस को शिक्षकों से छीनकर प्रधानमंत्री का उपदेश दिवस बना दिया गया है जिसमें शिक्षकों की उपस्थिति उनका उपदेश सुनाने के लिए इंतजामकार भर की रह गई है। 14 नवंबर के कार्यक्रम से नेहरू की तस्वीर गायब कर दी गई है और इंदिरा को तो याद करने का सवाल ही नहीं उठता। राष्ट्र दरअसल कल्पना का खास ढंग का संगठन ही है। इसलिए प्रतीकों का काफी महत्व होता है। जिन प्रतीकों के माध्यम से हम अपनी राष्ट्र की कल्पना को मूर्त करते हैं, उनकी जगह नए प्रतीक प्रस्तुत करके एक नई कल्पना को यथार्थ करने का प्रयास होता है। तो हम उस राजनीतिक दल के संविधान प्रेम को कैसे समझें जिसकी पितृ-संस्था, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उस पर मात्र इसलिए अपना विश्वास जताया था जिससे उस पर गाँधी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध हटाया जा सके।

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आंबेडकर के आगे संघ-भाजपा हुए नतमस्तक?

Why RSS and BJP giving importance to Ambedkar?

आखिर यही शर्त सरदार पटेल ने उसके सामने रखी थी। वरना उसका ख्याल था कि मनुस्मृति से बेहतर संविधान क्या हो सकता है! याद रहे कि इस संगठन ने तिरंगा ध्वज को भी मानने से इनकार किया था यह कहकर कि तीन रंग अशुभ और अस्वास्थ्यकर होते हैं। इस तिरंगे के चक्र पर इस संघ और दल के एक वरिष्ठ नेता, अब मूक मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी ने यह कहकर ऐतराज जताया था कि यह बौद्ध धर्म का प्रतीक है। फिर ये सबके सब संविधान और तिरंगे के प्रेमी कैसे हो गए? भारतीय संविधान की आत्मा है बराबरी और इंसाफ। आंबेडकर ने इस संविधान के बनने के बहुत पहले कहा था कि विधायिका जनता का प्रतिनिधित्व करती है, न कि मात्र बुद्धिजीवियों का। उनका आशय पढ़े-लिखे लोगों को ही प्रतिनिधित्व का अधिकार देने से था।

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आंबेडकर के आगे संघ-भाजपा हुए नतमस्तक?

Why RSS and BJP giving importance to Ambedkar?

भारतीय संविधान जनता को संप्रभु मानता है और भारतीय राज्य अपनी संप्रभुता उसी जनता से ग्रहण करता है। यह ऐसा विलक्षण संविधान है जिसने एक ही बार हर वयस्क को मताधिकार दिया, उसमें किसी तरह की कोई शर्त नहीं लगाई। ऐसा करके उसने साधारण भारतीय जन की विवेक क्षमता पर भरोसा जताया। क्या जनतंत्र जैसे आधुनिक विचार का अभ्यास अनपढ़ जनता कर पाएगी? साल-दर-साल उस जनता ने इस विश्वास को सही साबित किया। इस तरह एक तरफ जहां संविधान जनता के लिए एक कसौटी है तो दूसरी ओर जनता संविधान की कसौटी है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कम से कम तीन राज्य सरकारों की कोशिश देख लें जो उन्होंने स्थानीय निकायों के चुनाव में जनता की भागीदारी को सीमित करने के लिए की।

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