जब एक अंग्रेज के लिए भारतीय सैनिक ने दे दी जान
ये कहानी है एक अंग्रेज़ और एक भारतीय सैनिक की, जो जंग के मैदान में दोस्त बने थे और आज भी उनकी तीसरी पीढ़ी के बीच गहरी दोस्ती बनी हुई है। भारत में जालंधर के मंता सिंह 15वीं लुधियाना सिख में सेवारत थे और उन्होंने 1915 की न्यूवे शपेल की लड़ाई में हिस्सा लिया था।यह पहले विश्व युद्ध के सबसे भयानक लड़ाइयों में से एक था जिसमें खून की नदियां बही थीं। एक सैनिक ने तो इसे 'नरक का पूर्वाभ्यास' तक बताया था।
जब एक अंग्रेज के लिए भारतीय सैनिक ने दे दी जान
जिस समय कैप्टन जॉर्ज हेन्डरसन भयानक लड़ाई में घायल हो गये थे, उस वक़्त उनके मित्र लेफ़्टिनेंट मंता सिंह ने उन्हें एक ठेले पर लादकर भयानक गोलीबारी के बीच सुरक्षित बाहर निकाला था। इस दौरान मंता सिंह के पैर में गोली लग गई और बाद में संक्रमण फेलने से ब्रिटेन के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी।कुछ साल बाद कैप्टन जॉर्ज हेन्डरसन पंजाब आए और मंता सिंह के बेटे अस्सा सिंह को ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी दिलाई।
जब एक अंग्रेज के लिए भारतीय सैनिक ने दे दी जान
फिर कई साल बाद भी अस्सा सिंह और कैप्टन जॉर्ज हेन्डरसन के बेटे रॉबर्ट के बीच उत्तरी अफ़्रीका में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बहुत अच्छी दोस्ती बनी रही।जब वह युद्ध समाप्त हुआ तो रॉबर्ट की मदद से अस्सा सिंह ब्रिटेन में जाकर बस गए और अब उनकी तीसरी पीढ़ी में भी मित्रता बनी हुई है।
जब एक अंग्रेज के लिए भारतीय सैनिक ने दे दी जान
मंता सिंह से पोते जयमल सिंह और कैप्टन जॉर्ज हेन्डरसन के पोते इयान हेन्डरसन हर साल ब्राइटन जाते हैं और भारत के उन सैनिकों की स्मारक पर माला चढ़ाते हैं जिन्होंने ब्रिटेन की तरफ से लड़ते हुए अपनी जान दी थी। मंता सिंह और उनके परिवार की यह कहानी भारतीय मूल के ब्रिटिश पत्रकार श्राबनी बसू की उस नई किताब का हिस्सा है, जिसका नाम है 'फ़ॉर किंग एंड अनॉदर कंट्री'।
जब एक अंग्रेज के लिए भारतीय सैनिक ने दे दी जान
श्राबनी बसू ने सेन्ट्रल लंडन के ब्रिटिश लाइब्रेरी में अपनी मेहनती खोज के बदौलत भारतीय सैनिकों की इस वीरता को दुनिया के सामने लाया है।वो कहती हैं, "यह युद्ध उनका अपना नहीं था बल्कि भारतीय सैनिक तो हज़ारों मील दूर किसी और की लड़ाई लड़ने के लिए गए थे।"