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तस्वीरें: यहां आसमान से मौत बनकर टूटती है बिजली

Tue, 14 Jul 2015 01:31 PM IST
Updated Tue, 14 Jul 2015 01:31 PM IST
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तस्वीरें: यहां आसमान से मौत बनकर टूटती है बिजली

jharkhand light suffering and death

प्रवीण लकड़ा का घर यही है, पूछने पर दस बरस का एक लड़का बाहर निकलता है। धीमी आवाज में कहता है, "हां, पर भाई तो रहा नहीं। ऊ चला गया। मां- बाबा, दीदी सब दूर खेत पर मिलेंगे।" खेत में काम करते मिले पैरो उरांव और उनकी पत्नी एतवरिया। साथ में बेटी और बहू।


पूरी रिपोर्ट-नीरज सिन्हा/रांची से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

तस्वीरें: यहां आसमान से मौत बनकर टूटती है बिजली

jharkhand light suffering and death

एक ही नज़र में साफ हो गया कि गांव का यह ग़रीब परिवार सीने में तमाम ग़म समेटे जिंदगी की दिक्कतों से जूझ रहा है। एतवरिया बताती हैं, "मिट्टी दिए चार दिन ही हुए हैं। गुलेल लेकर चिरैयों का शिकार करने प्रवीण और उनका दोस्त रोहित तिग्गा घर से कुछ ही दूर निकले थे। अचानक बारिश होने पर एक महुआ पेड़ के नीचे खड़े हुए। इस बीच बिजली गिरी और दोनों की मौत हो गई।" ये हादसा बानगी भर है। झारखंड के कस्बाई इलाकों में आसमान से मौत बनकर गिरती बिजली बड़ी आपदा साबित हो रही है।

तस्वीरें: यहां आसमान से मौत बनकर टूटती है बिजली

jharkhand light suffering and death

मौत का डर-आसमान पर बादल गरजने और बिजली चमकने से कई घरों में चित्कार मच जाता है। कई बार लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता। राज्य के अलग- अलग हिस्सों में पिछली एक-दो जुलाई को हुई बारिश के दौरान बिजली गिरने से 13 लोगों की मौतें हुईं। गांवों में इसे ठनका गिरना भी कहा जाता है। राज्य के विभिन्न जिलों से मिले आंकड़े बताते हैं कि तीन महीने के दौरान बिजली गिरने से कम से कम 48 लोगों की मौत हुई है।

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सौ से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। दर्जनों जानवरों के मारे जाने की भी खबर है। रांची ज़िले के हेसल खीरा टोली गांव के रहने वाले प्रवीण लकड़ा और रोहित तिग्गा की मौत एक जुलाई को आसमान से गिरी बिजली की चपेट में आने से हुई। प्रवीण नौंवी कक्षा और रोहित इंटर के छात्र थे। फिलहाल दोनों परिवारों को बतौर सरकारी मुआवजा तीन- तीन हज़ार रुपए मिले हैं। प्रवीण की भाभी दयमंती बताती हैं, "मां-बाबा ठहरे अनपढ़। मुआवजे के बाकी पैसे के लिए सरकारी बाबुओं ने कई कागज़ी प्रक्रिया पूरी करने को कहा है। मौसम खेती संभालने का है। अब खेत देखें या सरकारी कार्यालय जाएं, समझ में नहीं आता।" इसी गांव में रहने वाले पास्कल कहते हैं, "पहले जैसी बात नहीं रही कि बारिश होने के साथ ही हल- बैल लेकर खेतों में निकल जाएं। खेतों में काम करते जब-तब बिजली के झटके महसूस किए जाते हैं। डर लगता है कि न जाने कब ठनका गिर जाए।"

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बिजली गिरने से घायल हुए लोगों को गांव वाले गोबर के ढेर में भी दबा देते हैं। उनका मानना है कि इससे जान बचने की गुंजाइश रहती है। 20 जून को खूंटी जिले के मान्हू गांव में वज्रपात की घटना में गांव के लोगों ने ये नुस्खे काफी देर तक आजमाये पर एक स्कूली बच्चे को नहीं बचाया जा सका।

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