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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

Sat, 19 Sep 2015 08:20 PM IST
Updated Sat, 19 Sep 2015 08:20 PM IST
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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

Meeruthiya Gangsters is not true face of meerut

जरायम न मेरठ की धरती की पहचान है और न ही इस माटी के नौजवानों की कहानी गढ़ता है। क्रांति की इस धरा के वीरों ने तो अपने शौर्य और साहस के बूते देश का राज तिलक किया है। चाहे जंग का मैदान हो या खेलों का, मेरठी युवाओं ने हर क्षेत्र में मजबूती के साथ अपना दमखम दिखाया है। लेकिन, फिल्मकारों को न क्रांति धरा का गौरवशाली इतिहास नजर आता है और न ही देश का मान बढ़ाने वाले मेरठी। मेरठ ब्यूरो से शालू अग्रवाल की रिपोर्ट।

मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

Meeruthiya Gangsters is not true face of meerut

पहले ओमकारा, जॉली एलएलबी जैसी फिल्मों के जरिए मेरठ के प्रति अपने नकारात्मक नजरिये की नुमाइश की और अब मेरठिया गैंगस्टर्स में भी वही छवि पेश करने जा रहे हैं। ऐसे फिल्मकारों को आईना दिखाती देश की शान बढ़ाने वाले मेरठी शूरवीरों, नौजवानों और बेटियों की सफलता इसका सबूत हैं।

मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

Meeruthiya Gangsters is not true face of meerut

कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच भी मेरठ की बेटी अन्नू रानी ने कॉमनवेल्थ गेम्स-2014 में देश का नाम बुलंद किया। नेशनल में रिकॉर्ड होल्डर, भाला फेंकने में माहिर अन्नू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीता। इससे पहले भी अन्नू चार साल तक लगातार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में गोल्ड मेडल लाईं।

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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

Meeruthiya Gangsters is not true face of meerut

मेरठ के बेटे ही नहीं, यहां की बहुओं ने भी देश-विदेश में मेरठ का नाम ऊंचा किया है। मोदीपुरम निवासी सीमा पूनिया मेरठ की बहू हैं। सीमा ने हाल में हुए एशियन गेम्स में डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक हासिल किया। कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीत चुकीं सीमा का खेलों में दुनिया में बड़ा नाम है। देश-विदेश में कई पदक अपने नाम कर चुकी हैं। अच्छे-अच्छे खिलाड़ी डिस्कस थ्रो में सीमा का लोहा मानते हैं।

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Meeruthiya Gangsters is not true face of meerut

मेरठ के क्रांतिकारियों ने इस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराया, तो सेना में तैनात लाड़लों ने दुश्मन से देश की रक्षा की। ललियाना निवासी 22 वर्षीय ग्रेनेडियर जुबेर अहमद छुट्टी रद्द कराकर सीमा पर दुश्मन के छक्के छुड़ाने जा पहुंचे थे। जुबेर की बूढ़ी मां आज भी गर्व से अपने बेटे का नाम लेते हुए कहती हैं, धन्य हूं मैं जो मुझे जुबेर जैसा बेट मिला। उसने अपनी जान देकर मातृभूमि का ऋण अदा किया। जुबेर कारगिल युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

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