फिर से आप ले सकेंगे मैगी का मजा, शुरू हुई बिक्री
मैगी नूडल्स खाने वालों के लिए खुशखबरी अब वह अपने किचन में मैगी को फिर से बना सकेंगे। कंपनी ने सभी टेस्ट पास करते हुए मैगी को फिर से बाजार में उतार दिया है। उल्लेखनीय है कि मैगी पर सीसा की मात्रा अधिक पाए जाने के बाद देशभर के बाजारों में इसकी बिक्री पर रोक लगा दी गयी थी।
फिर से आप ले सकेंगे मैगी का मजा, शुरू हुई बिक्री
मैगी पर भारत में बैन लगने के बाद नेस्ले को 40 करोड़ पैकेट नष्ट करने पड़े जिसकी कीमत लगभग सात करोड़ डॉलर थी। इतना ही नहीं, जब सरकार भी कमर कस ले कि 'व्यापार करने के गलत तरीकों' के इस्तेमाल के आरोप में कंपनी पर 10 करोड़ डॉलर का दावा होगा, तब रास्ता और भी कठिन हो जाता है।
फिर से आप ले सकेंगे मैगी का मजा, शुरू हुई बिक्री
ऐसे हालात में नेस्ले की भारतीय बाजार में वापसी तो हुई है लेकिन भारत में कंपनी के मुख्य कार्यकारी सुरेश नारायणन के लिए पिछले पांच महीने आसान नहीं थे। नारायणन कहते हैं, ''किसी भी संकट को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।'' मैगी के लिए समस्या शुरू हुई 2015 मई में जब स्थानीय नियामकों (रेगुलेटर) ने कहा कि उन्हें दो मिनट में तैयार होने वाली इन नूडल्स के नमूनों में अधिक सीसा की मात्रा मिली है। नेस्ले ने इस आरोप का खंडन किया और नमूनों की जांच से मिले नतीजों के गलत बताया। लेकिन खाद्य नियामक एजेंसियों ने इसके उत्पादन और बिक्री पर रोक लगा दी।
फिर से आप ले सकेंगे मैगी का मजा, शुरू हुई बिक्री
साथ ही कंपनी को पूरे देश के बाजार में उतारे जा चुके मैगी के पैकैट्स को वापस लेना पड़ा। इसी साल के अगस्त में मुंबई उच्च न्यायालय ने इस पर लगी रोक को हटा दिया। लेकिन इस घटना के कारण कंपनी को पिछले 15 सालों में पहली बार किसी तिमाही में घाटा झेलना पड़ा। पर संकट पर काबू पाने के लिए, नेस्ले की फिलिपींस की शाखा से भारत बुलाए गए सुरेश नारायणन के अनुसार इसका असर केवल हिसाब-खाता तक सीमित नहीं था। वे कहते हैं कि उत्पाद बनाने की पूरी प्रक्रिया के इस संकट ने झकझोर कर रख दिया था।
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वो कहत हैं, ''गेहूं मुहैया कराने वाले किसान, मिल मालिक, पैकेजिंग के लिए सामान देने वाले सप्लायर, गाड़ियां चलाने वाले, कंपनी के 5 उत्पादन केंद्रों में मैगी बनाने वाले मजदूर- सभी ने इसका असर झेला। पूरे भारत में मैगी बेचने वाली 4 लाख दुकानें इससे प्रभावित हुईं। आम आदमी को होने वाली परेशानी इस सबसे कहीं ज्यादा थी। यह मेरे लिए बेहद दुखद था।''लेकिन क्या नारायणन को लगता है कि कंपनी के साथ अन्याय हुआ? नारायणन कहते हैं कि वे 'अन्याय' जैसे शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहते। वो कहते हैं, ''खाद्य पदार्थ में सीसा जैसे भारी धातु की मात्रा जांचने का काम उन प्रयोगशालाओं में हुआ जो मान्यता प्राप्त नहीं थीं।