लखनऊ विश्वविद्यालय वैसे तो अपने गौरवपूर्ण 100वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। मगर इसका जन्म 155 साल पहले ही हो गया था। एक मई 1864 को हुसैनाबाद में कैनिंग कॉलेज की स्थापना हुई थी, जो आगे चलकर लखनऊ विश्वविद्यालय बना। हुसैनाबाद कोठी में अस्थायी स्कूल के तौर शुरू होकर यह अमीनाबाद के अमीनुद्दौला पार्क, कैसरबाग में परीखाना (वर्तमान भातखंडे संगीत सम संस्थान), लाल बारादरी होते हुए आखिर में बादशाहबाग स्थित वर्तमान परिसर तक पहुंचा है। इसी कैनिंग कॉलेज को 25 नवंबर 1920 को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया और 1921 में यहां पढ़ाई की शुरुआत हो गई।
155 साल पहले हुआ 100 साल के विश्वविद्यालय का जन्म, जानें- इसकी खासियतों के बारे में
खान बहादुर शेख सिद्दीकी अहमद साहब की उर्दू में लिखी गई मशहूर किताब अंजुमन-ए-हिंद में कैनिंग कॉलेज की स्थापना का विस्तृत ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड चार्ल्स कैनिंग की मृत्यु के बाद अवध के ताल्लुकेदारों ने उनके सम्मान में स्कूल खोलने की इच्छा जताई। इसके लिए 18 अगस्त 1862 में अवध में बैठक हुई। 22 नवंबर को ताल्लुकेदार्स की दूसरी बैठक में इस आशय की सूचना सरकार को देने पर सहमति बनी। तीसरी बैठक 7 दिसंबर 1862 को हुई, जिसमें तय किया गया कि हर ताल्लुकेदार अपने यहां की मालगुजारी (कर के रूप में प्राप्त रकम) का आधा फीसदी इस शैक्षणिक संस्था को देगा। बैठक में यह भी तय हुआ कि इसी रकम के बराबर की राशि सरकार से देने का अनुरोध किया जाएगा। सरकार ने ताल्लुकेदारों के इस प्रस्ताव को मान लिया तथा एक मई 1864 को कैनिंग कॉलेज की शुरुआत हुसैनाबाद से हो गई।
आमजन के लिए ‘कैनिंग’ खास के लिए ‘कॉल्विन’
अवध के ताल्लुकेदारों ने 27 फरवरी 1864 को हुई बैठक में एक प्रस्ताव और पास किया। इस प्रस्ताव के अनुसार सभी ताल्लुकेदार अपनी मालगुजारी का एक फीसदी हिस्सा शिक्षण संस्थान के लिए देंगे। आधा फीसदी कैनिंग कॉलेज और आधा फीसदी उस संस्थान के लिए जिसमें सिर्फ ताल्लुकेदारों के बच्चे पढ़ाई करेंगे। ताल्लुकेदार्स के बच्चों के लिए यह विशिष्ट संस्थान कॉल्विन ताल्लुकेदार्स के रूप में वर्ष 1889 में सामने आया। उससे पहले आम और खास सभी के बच्चे कैनिंग कॉलेज में ही पढ़ते रहे।
सिर्फ आठ छात्रों के साथ 1866 से हुई डिग्री कक्षाओं की शुरुआत
वर्ष 1864 में अपनी स्थापना के बाद अगले दो साल तक यहां पर सिर्फ हाईस्कूल तक की पढ़ाई हुआ करती थी। आगरा कॉलेज के प्रिंसिपल टॉमस साहब की निगरानी में यह विद्यालय कलकत्ता विवि से संबद्ध था। वर्ष 1887 में इलाहाबाद विवि बनने के बाद यह कलकत्ता के बजाय इलाहाबाद विवि से संबद्ध हो गया। कैनिंग कॉलेज में वर्ष 1864 से डिग्री कक्षाओं की शुरुआत की गई। शुरुआत में डिग्री स्तर पर सिर्फ आठ विद्यार्थी ही थे। हालांकि कुल विद्यार्थियों की बात करें तो 1865 में 377, 1866 में 518, 1867 में 533, 1868 में 621 और 1869 में यह संख्या 666 थी। अवध के कमिश्नर को इस विद्यालय समिति का अध्यक्ष तथा अंजुमन-ए-हिंद के सचिव को इसका सचिव बनाया गया। इन्हीं की निगरानी में यह विद्यालय संचालित होता रहा।
कैनिंग कॉलेज में वर्ष 1884 तक सभी कक्षाएं एक साथ चलती रहीं। इसके बाद प्राइमरी कक्षाओं को अलग कर दिया गया। 1887 में मिडिल की कक्षाएं भी अलग कर दी गईं। वर्ष 1877 में जुबिली स्कूल जो अब राजकीय जुबिली इंटर कॉलेज है, को हाईस्कूल का दर्जा भी दे दिया गया। इसके बाद यहां पर कक्षा 11 से लेकर ऊपरी दर्जे की पढ़ाई होती रही। 13 अगस्त 1920 को इलाहाबाद विवि में ले. गवर्नर सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में विशेष बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय स्थापित करने की जानकारी दी। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी और स्कूल टीचिंग के बीच की लाइन इंटरमीडिएट करने की बात भी तय हुई। लखनऊ विश्वविद्यालय में 1921 में शुरू हुए पहले शैक्षिक सत्र में डिग्री के साथ ही 12वीं के विद्यार्थी भी थे। इंटरमीडिएट का बैच पास होने के बाद अगले साल यानी 1922 में यहां इंटर की पढ़ाई बंद हो गई।