जोगीरा सारारारा.... की आवाज के साथ जब ढोलक और मंजीरे की धुन गली-गली में गूंजती थी तो हर आदमी फगुआ के रंग में रंग जाता था। फगुआ सिर्फ गीत नहीं है बल्कि हमारी परंपरा और विरासत है। एक दौर था जब हर कोई फाल्गुन महीने का इंतजार करता था। वसंत पंचमी के दिन से होलिका का डांढ़ा (लकड़ी का टुकड़ा, जिसके आसपास होलिका सजाई जाती है) लगाते ही युवाओं का अल्हड़पन शुरू हो जाता था। इसके बाद तो दुश्मन को भी दोस्त बनाकर घर-घर फगुआ गाया जाता था। आधुनिकता के साथ-साथ हमारी परंपरा और विरासत गायब होती जा रही है। अब तो न ही वह गीत रहे और न ही उनको गाने वाले। अब तो फगुआ की जगह डीजे और फूहड़ गीतों का शोर बजने लगा है। शहर को तो छोड़ ही दें, बल्कि गांव में भी अब ये परंपरा खत्म हो रही है।
Fagua Song In Holi: ढोलक की थाप पर फगुआ के बिना अधूरी थी होली, आखिर क्यों दम तोड़ रही है 'जोगीरा' की परंपरा
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: निधि पाल
Updated Fri, 18 Mar 2022 07:59 AM IST
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