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ब्रेव डॉटर: मां-बाप हैं नहीं, उम्र 8 साल, कूड़ा बीनती है, फिर स्कूल जाती है और...सपना आसमां छूने का
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, यमुनानगर(हरियाणा)
Updated Sat, 07 Jul 2018 10:32 AM IST
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बहादुर बेटी
मिलिए ब्रेव डॉटर ऑफ इंडिया से। इस बेटी पर न केवल उसकी बहन को नाज है, बल्कि पूरे गांव, जिले, प्रदेश और देश भर को गर्व है। पीएम मोदी भी गर्व करेंगे। छोटी सी उम्र में इतना हौंसला, इतनी लगन देखकर आप इसे सलाम करेंगे।
बहादुर बेटी
ये बहादुर बेटी है हरियाणा के यमुनानगर की। कहते हैं कि डूबते हुए को तिनके का सहारा होता है, लेकिन इस मासूम के पास न तो कोई सहारा है और न ही कोई उम्मीद। मां-बाप हैं नहीं, पर पढ़ना चाहती है, कुछ बनना चाहती है। इसलिए कूड़ा बीन कर रुपये जमा करती है और किताबें-ड्रेस खरीदकर स्कूल जाती है। हम तीसरी क्लास में पढ़ने वाली इस मासूम की पहचान उजागर नहीं करेंगे, लेकिन सरकार और सिस्टम से सवाल जरूर करेंगे कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के विज्ञापन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, पर नतीजा कहां नजर आया।
बहादुर बेटी
देश भर में ऐसी कई मासूम बेटियां हैं, जिन्हें कोई मदद नहीं मिलती। उन्हें में से एक है यमुनानगर के आजाद नगर में रहने वाली आठ साल की मुस्कान (बदला हुआ नाम), जो सुबह स्कूल जाने से पहले एक घंटा गलियों में घूमकर कूड़ा बीनती है, फिर तैयार होकर स्कूल जाती है। स्कूल से घर लौटकर फिर से कूड़ा बीनने निकल जाती है। शाम को इसे बेचकर चंद रुपये कमाती है। रोजाना जरूरत के सामान पर खर्च करने के बाद बचे हुए पैसों को जमा करती है। इसी पैसे से पेन, पेंसिल, कॉपी और ड्रेस खरीद कर अपनी पढ़ाई पूरी करती है।
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बहादुर बेटी
बचपन में ही माता-पिता का उठा साया
पता चला है कि मुस्कान के सिर से बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया। उसके बाद वह अपने मामा के पास रहने लगी। अब कुछ समय से वह अपनी बहन के पास रह रही है। बहन की माली हालत भी काफी खराब है, जिसकी वजह से वह मुस्कान की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ है। ऐसे में मुस्कान के पास इस काम के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दूसरों की फेंकी हुई अलग-अलग तरह की चप्पलें पहनकर स्कूल जाती है तो बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन इसकी परवाह किए बिना वह पढ़ती है और फिर उसी दिनचर्या पर निकल जाती है।
पता चला है कि मुस्कान के सिर से बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया। उसके बाद वह अपने मामा के पास रहने लगी। अब कुछ समय से वह अपनी बहन के पास रह रही है। बहन की माली हालत भी काफी खराब है, जिसकी वजह से वह मुस्कान की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थ है। ऐसे में मुस्कान के पास इस काम के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दूसरों की फेंकी हुई अलग-अलग तरह की चप्पलें पहनकर स्कूल जाती है तो बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन इसकी परवाह किए बिना वह पढ़ती है और फिर उसी दिनचर्या पर निकल जाती है।
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mid day meal
मिड डे मील लंच और दिनभर की कमाई से डिनर
मुस्कान चाय व बिस्कुट से नाश्ता कर घर से निकलती है। स्कूल में मिड डे मील के रूप में लंच मिल जाता है। उसके बाद दिनभर कूड़ा बीन कर जो चंद रुपयों की कमाई होती है, उसी से रात का खाना खाती है। फिलहाल उसके पास स्कूल की एक ही वर्दी है। जिसे वह शाम को रोजाना धोकर सुबह स्कूल पहनकर जाती है।
मुस्कान चाय व बिस्कुट से नाश्ता कर घर से निकलती है। स्कूल में मिड डे मील के रूप में लंच मिल जाता है। उसके बाद दिनभर कूड़ा बीन कर जो चंद रुपयों की कमाई होती है, उसी से रात का खाना खाती है। फिलहाल उसके पास स्कूल की एक ही वर्दी है। जिसे वह शाम को रोजाना धोकर सुबह स्कूल पहनकर जाती है।
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