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गांधी जी का अंतिम अनशन, जब पूरे देश की नजर बिड़ला हाउस के उस कमरे पर थी

Wed, 02 Oct 2019 08:10 AM IST
Garima Garg गरिमा गर्ग, एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
गरिमा गर्ग, एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Garima Garg Updated Wed, 02 Oct 2019 08:10 AM IST
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Gandhiji's journey from the last fast to his death, read the entire chapter here
गांधी जयंती - फोटो : amar ujala

2 अक्तूबर को पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है। गांधी जयंती न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी बड़े हर्ष के साथ मनाई जाती है। यहां हम बात कर रहे हैं गांधी जी के अंतिम अनशन की। आखिर क्यों हुआ ये अनशन, इसके पीछे क्या थी गांधी की इच्छा, अनशन को सफल करने के लिए क्या-क्या अपनाए गए तरीके, पढ़ते हैं आगे...

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  • गांधी जी के जीवन का अंतिम आमरण अनशन 13 जनवरी, 1948 को मंगलवार की सुबह 11:55 बजे आरंभ हुआ।
  • उस वक्त गांधी जी अपने ठंडे कमरे में एक राग अलाप रहे थे-

"या घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि,
सीस उतारै भुईं धरै, सो पैंठै घर मांहि।।"
 

  • साढ़े दस बजे उन्होंने अपने जीवन का अंतिम भोजन (दो चपातियां, एक सेब, आधा सेर बकरी का दूध और चकोतरे की तीन फांकें) किया।
  • खाना खाने के बाद गांधी जी ने बिड़ला हाउस के बगीचे में एक छोटा समारोह आरंभ किया।
  • उनके सचिव का कहना था कि " सितंबर में दिल्ली वापस आने के बाद से बापू कभी इतने प्रसंनचित्त और निश्चिंत नहीं दिखाई दिए, जितना अनशन शुरू हो जाने के बाद लग रहे थे।"
  • गांधी के अनशन के बारे में और उसे तोड़ने की शर्तोंं के बारे में भारतीय जनता की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली थीं। 
गांधी के अनशन करने के पीछे का कारण-
1- गांधी जी चाहते थे कि जिन शरणार्थी ने मुस्लिम घरों पर कब्जा कर लिया है, उन्हें खाली करके उनके मुसलमान मालिकों को लौटा दें और फिर शरणार्थी-कैंपों में वापस चले जाएं।" 
2- भारत और पाकिस्तान के बीच 55 करोड़ रुपयों के कर को लेकर ये अनशन था।

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दूसरी तरफ जब नाथूराम गोडसे को इस अनशन का पता चला तो उनका रंग पीला पड़ गया।

इसके कुछ पल बाद गोडसे ने मुड़कर आप्टे की तरफ देखा। उसने कहा कि हैदराबाद में छापेमार लड़ाई शुरू करने और जिन्ना की हत्या करने के सारे लंबे-चौड़े मंसूबे तो छोटे-मोटे तमाशे थे। अब हमे केवल एक ही काम की ओर अपना पूरा ध्यान देना चाहिए। सारी शक्ति, सारे साधन एक ही उद्देश्य को पूरा करने के लिए लगा देने चाहिए। 
आप्टे ने पूछा- "कौन-सा काम?"
इस प्रश्न पर गोडसे ने घोषणा की "हमें गांधी की हत्या करनी होगी।"
 

गांधी जी ने अपनी प्रार्थना सभा आरंभ करते हुए लोगों से कहा कि आप लोग मेरे साथ मिलकर टैगोर का ये गीत गाएं, जो वह साल-भर पहले प्रायश्चित-यात्रा के दौरान रोज गाया करते थे। 

'यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे,
तबे एकला चालो रे, एकला चालो
एकला चालो, एकला चालो।" 

गांधी जी की आवाज सुनकर वहां मौजूद 600 लोग बिल्कुल शांत हो गए।


उपस्थित जनसमूह में चिंता छा गई। मनु गांधी जी का सामान समेटने लगी और भीड़ चुपचाप गांधी जी को निकल जाने का रास्ता देने के लिए दो हिस्सों में बंट गई। प्रसिद्ध छायाकार मार्गरेट बुर्क-व्हाइट उनका चित्र लेते समय बहुत-से दूसरे लोगों की तरह सोच रही थी कि क्या हम गांधी को फिर कभी देख सकेंगे?

उस दिन हिंदू राष्ट्र के कार्यालय में उन चार नौजवानों की भेंट पर दृष्टि रखने के लिए कोई भी तैनात नहीं था। यह बड़े दुर्भाग्य की बता थी, क्योंकि उस रात नाथूराम गोडसे ने जो बातें कहीं, वे किसी भी पुलिस वाले के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण बातें हो सकती थीं। 

गोडसे की बगल में उनका साझेदार आप्टे, विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा बैठे थे। गोडसे उनके सामने भारतीय राजनीतिक घटनाक्रम का सिंहावलोकन कर रहा था। 

कुछ देर बाद गोडसे ने प्रतिज्ञा लेते हुए कहा कि हमे ही कुछ करना होगा। "हमें गांधी जी को रोकना होगा" उसने घोषणा की।

मदनलाल ने तुरंत उसके इन शब्दों का समर्थन किया, "हां आप सहीं कहते हैं, अब बदला लेने का अवसर आ गया है, जिसकी तालाश में मैं उस समय से हूं, जब छह महीने पहले फिरोजपुर के अस्पताल में अपने पिता को घायल पड़ा हुआ छोड़कर आया था।"
करकरे भी सहमत था, "ठीक कहते हो भाई ।"

उसके बाद वे चारों वेशधारी हथियार बेचने वाले के पास गए। दिगंबर बडगे ने फर्श पर बिछे हुए कंबल पर हथियार निकालकर फैला दिए। उन्होंने कुछ हथगोले, कुछ फलीते और थोड़ा सा बारुद एक ऑटोमेटिक पिस्तौल के साथ खरीद लिया। 

आप्टे ने 14 जनवरी को बुद्धवार के दिन अंधेरा हो जाने के बाद बंबई में हिंदु महासभा के दादरवाले कार्यालय में मिलने को कहा। 
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गांधी जी बेहद कमजोर हो गए थे। उन्हें चक्कर आ रहे थे। वह अपनी चटाई पर चुपचाप लेटे थे और छत पर नजरें गड़ाए हुए थे। वह सरदार पटेल के बारे में सोच रहे थे क्योंकि सरदार पटेल 55 करोड वाली बात पर उनके साथ नहीं थे। 

थोड़ी देर बाद गांधी जी कोहनियों के बल ऊपर उठे और उस इंसान को बड़े गौर से देखने लगे, जिसने संघर्षों में उनका साथ दिया। 
उन्होंने भराए हुए क्षीण स्वर में कहा कि "तुम बह सरदार नहीं हो, जिसे मैं किसी युग में जानता था"

इतना कहकर वह पुन: चटाई पर लेट गए। 

ये उनका पहला अनशन था जो देशवासियों के मन में उनके प्रति गुस्सा पैदा कर रहा था। शाम को जानी-पहचानी आवाज बिड़ला हाउस के अंदर आ रही थी। ऐसी आवाज कलकत्ता में हुए अनशन के वक्त भी सुनी गई थी। 

गांधी जी को भी ये आवाज सुनाई दी उन्होंने अपने सचिव प्यारेलाल से पूछा " क्या हो रहा है?"
प्यारेलाल ने बताया कि शर्णाथियों का जुलूस है। 
बहुत लोग हैं क्या? गांधी जी ने पूछा। 
नहीं ज्यादा नहीं हैं।
क्या कर रहे हैं नारेबाजी?
गांधी ने फिर पूछा,"क्या कह रहे हैं ये लोग?"
प्यारेलाल सकुचाते हुए बोले,"वे लोग कह रहे हैं कि गांधी जी को मरने दो।"

बुंबई पहुंचकर गोडसे, आप्टे और बडगे सबसे पहले हिंदुत्व के कट्टर समर्थन वीर सावरकर के पास गए। वीर सावरकर गांधी जी के हर आदर्श से, उनके हर सिद्धांत से कड़ी घृणा करते थे। ऐसे में उन तीनों का उनके पास जाना लाजमी था। सावरकर से भेंट करने के बाद तीनों एक दूसरे से अलग हो गए। 

दूसरी तरफ 15 जनवरी को सुशीला नैयर ने जब गांधी जी के मूत्र की जांच की तो उसमें एसीटोन और एसेटिक अम्ल के अंश पाए। गांधी जी के शरीर में कार्बोहाईड्रेट का संचित भंडार खत्म होता जा रहा था। अनशन शुरू होने के लगभग अड़तालीस घंटे बाद वह खतरे की सीमा के अंदर पहुंच गए थे। 

उस वक्त गांधी जी ने कहा था कि "अगर मेरे मूत्र में एसीटोन पाया गया है तो इसका अर्थ है कि मेरी राम में आस्था कम है।"

अगले दिन सुबह 7 बजकर 20 मिनट पर नारायण आप्टे एयर-इंडिया के कार्यालय में पहुंचा। बंबई से दिल्ली जाने  वाले विमान के लिए डी.एन.कर्मारकर और श्री.एस मराठे ते नाम से दो टिकट बनाए। 

अब गांधी जी के अनशन का कुछ-कुछ असर दिल्ली के लोगों पर दिख रहा था। दस हजार लोग नेहरू का भाषण सुनने आए। जिसमें उन्होंने कहा, "अगर गांधी जी के प्राण चले गए तो भारत की आत्मा मिट जाएगी। "  

लाहौर से गांधी जी के नाम एक तार आया था जिसमें लिखा था कि, "यहां हर व्यक्ति एक ही प्रश्न पूछता है- हम गांधी की जान बचाने में क्या सहायता कर सकते हैं?" देश की मस्जिदों में उनकी जान बचाने की दुआ मांगी जाने लगी।
भारत सरकार ने पाकिस्तान को उसके 55 करोड़ रुपयों के भुगतान की घोषणा कर दी थी। गांधी जी की हत्या करने वाले धरातल पर घेरा बनाकर बैठे हुए थे। 

अभी तक इस साजिश में गोडसे और आप्टे शामिल थे, बड़गे शामिल नहीं था। हथियारों के लिए उन दोनों को बडगे की मदद की जरूरत पड़ी। उन्होंने उससे कहा कि वीर सावरकर ने गांधी, नेहरू और सुहरावर्दी को खत्म करने का आदेश दिया है। 
हम सारा खर्च देख लेंगे, तुम हमारे साथ दिल्ली चलो। लालची बडगे मान गया। 
वे सब दिल्ली पहुंच गए। 

गुरुवार की शाम बिड़ला हाउस के पीछे सैंकड़ों लोग थे। गांधी जी की हालत बहुत खराब थी। चूंकि वे उठ नहीं पा रहे थे इसलिए माइक्रोफोन पास लगा दिए। गांधी जी ने उनसे कहा कि, "मेरी चिंता मत करो। जो इस दुनिया में पैदा हुआ है उसे किसी -न-किसी दिन मरना ही है। मृत्यु हम सबकी मित्र है। हमें उसका उपकार मानना चाहिए कि वह हम सबको हर तरह के कष्टों से सदा के लिए मुक्ति दिला देती है। तुम मेरी चिंता मत करों। तुम अपने देश की और उसमें भाई-चारा पैदा करने की चिंता करो।

दर्जनों भारतीय और विदेशी पत्रकार बिड़ला हाउस के फाटक पर जमा हो गए थे।

उस वक्त उन्होंने प्रार्थना-सभा में चिंतित श्रोताओंं से कहा कि, "मुझे कोई शीग्रता नहीं है। मैं कोई भी काम अधूरा नहीं छोड़ना चाहता।" हांफते हुए उन्होंने कहा कि, "यदि हमारे चारों ओर सारे भारत में, पूरे पाकिस्तान में शांति स्थापित न हुई तो मुझे जिंदा रहने में कोई दिलचस्पी नहीं रह जाएगी। इस बलिदान का यही अर्थ है।"
ये बाते चल ही रही थी कि कराची से एक तार आया। उसमें पूछा गया कि, "जिन मुस्लमानों को दिल्ली से उनके घरों से भगा दिया गया था, क्या वे फिर आकर वहां बस सकते हैं?"

गांधी जी बुदबुदाकर बोले कि "यही वास्तविक कसौटी है।"

गोपाल गोडसे गांधी जी की हत्या करने दिल्ली जा रहा था। वह अपने भाई नाथूराम को दिए गए वचन पर अटल था। उसके इस अटल निश्चय में उसकी पत्नी उसके साथ थी। इसलिए उसने केवल उसी को बताया था कि ये पिस्तौल गांधी जी की हत्या के लिए खरीदी गई है। पत्नी उसकी प्रशंसा कर रही थी। 

अनशन पूरा करने से पहले पहले उन्होंने सचिव प्यारेलाल नैयर को सात शर्तें लिखवाईं। और कहां कि जब इस पर राजनीतिक संगठनों के नेता उस पर हस्ताक्षर कर देंगे तभी वे मानेंगे की उनकी बात पूरी हुई। 

प्यारेलाल गांधी जी को बचाने के लिए भागे-भागे शांति समीति के पास गए। जामा मस्जिद के सामने एक लाख लोगों की भीड़ रखी गई, जहां सब शर्ते मान लेने की गुहार लगा रहे थे। उनके सबसे प्रिय शिष्य प्रधानमंत्री के कार्यालय का  सारा काम-काज छोड़कर उनकी चटाई के पास बैठे थे।  दूसरी तरफ काम तमाम करने के लिए पूर्ण हो चुकी थीं। मदनलाल और करकरे अपने हथगोले, टाइम-बम और देसी पिस्तौल लेकर(बडगे ने लाकर दिया) दिल्ली पहुंच चुके थे। गोपाल गोडसे दूसरा पिस्तौल लेकर  आ रहा था। बडगे उसी शाम चलने वाला था औक मुश्किल से एक घंटे बाद नाथूराम गोडसे और आप्टे भी एयर इंडिया का हवाई जहाज पकड़ने वाले थे। 

लोग गांधी जी के लिए नारे लगा रहे थे, "गांधी जी अमर रहे!" 

उस वक्त नेहरू जी अपनी बात लोगों तक पहुंचा रहे थे,तभी भीड़ में एक आवाज आई की, "गांधी जी हमें सही लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकते इसलिए उन्हें मरने दो।" वो लाल मदनलाल की थी। करकरे और मदनलाल बिरला हाउस तक आ गए थे। पुलिस ने मदनलाल को हिरासत में ले लिया। लेकिन भीड़ के तितर-बितर होने का कारण मदनलाल को छोड़ दिया गया। 

रात होते होते प्यालेलाल गांधी जी के पास एक काजग लेकर आए, जिस पर उनके सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर करके सभी संप्रदायों के लोगों के बीच शांति, सद्भावना और भाईचारा स्थापित करने का वचन दिया था। पर उस पर अभी भी दो के हस्ताक्षर नहीं हुए थे। इसलिए गांधी जी ने अनशन नहीं तोड़ा। 

18 जनवरी, रविवार का दिन था। दिन के 11 बजे थे। कांग्रेस के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने बापू को बताया कि आपकी सारी शर्तों पर हस्ताक्षर कर दिए गए हैं। मौलाना आजाद और जवाहरलाल नेहरू ने संतरे का गिलास अपने हाथों में लेकर  गांधी जी के होठों में लगा दिया। ग्लूोज से उनके शरीर में शक्ति आ गई थी। 
उन्होंने कहा, "आप लोगों ने जो उपकार किया है उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकूंगा।

(स्रोत और संदर्भः फ्रीडम एट मिडनाइट-लेखक लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लिपिएर)
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