अच्छा बॉस सबको चाहिए। हर शख़्स किसी अच्छे बॉस के साथ काम करना चाहता है। लेकिन क्या एक अच्छा बॉस आपकी तरक़्की के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है? यह एक बड़ा सवाल है। चलिए, सबसे पहले जान लेते हैं अच्छे बॉस की परिभाषा क्या है? अच्छा बॉस वो है जो आपकी इज़्ज़त करे, आपकी हर बात माने, औऱ आपको प्रोफेशनली आगे बढ़ने का मौक़ा दे।
तरक्की के लिए कौन सा बॉस है ज्यादा फायदेमंद, तानाशाह या अच्छा?
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वहीं, कुछ बॉस ऐसे भी होते हैं जो काम के मामले में आपको हर रोज़ एक नई चुनौती देते हैं। वो आपकी शिकायतें, गिले-शिकवे भी सुनते हैं, साथ ही आपकी कमी बताने में भी कोई परहेज़ नहीं करते। ऐसे बॉस को अक्सर लोग तानाशाह कहते हैं।
अगर आप अपने पेशे में तरक़्क़ी करना चाहते हैं तो ऐसे तानाशाह बॉस ही आपके लिए बेहतर हैं। ऐसे बहुत से बॉस देखे गए हैं जो बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, वो अच्छी परफोर्मेंस की बात भी करते हैं। लेकिन, साथ ही उनके मन में कहीं भीतर यह भाव रहता है कि कर्मचारी उनकी इज़्ज़त में कमी ना कर दें। वो सबके साथ एक दोस्ताना ताल्लुक़ात रखना चाहते हैं।
ऐसे बॉस को हमेशा डर लगा रहता है कि अगर उसने अपने किसी स्टाफ़ को कोई ऐसा काम सौंप दिया जो उसके बस का ना हो तो वह उससे नाराज़ हो जाएगा और इज़्ज़त करना कम ना कर देगा। ऐसे में वे किसी भी कर्मचारी को काम का कोई बड़ा चैलेंज नहीं दे पाते।
ऐसे टीम लीडर के होते हुए कर्मचारी भी अपनी प्रतिभा को पहचान नहीं पाते। किसी कर्मचारी को अपनी क्षमताओं का समझने का मौका तभी मिलता है जब उसके सामने कोई चुनौती होती है। ऐसे में आपका अच्छा बॉस आपके लिए घातक साबित होता है।
असल में अच्छा बॉस वही है, जिसे अपने पसंद किया जाने या ना किये जाने की चिंता ना हो। उसकी नज़र सिर्फ काम के नतीजे पर होती है। उसे इस बात से सरोकार नहीं होता कि आपने काम कैसे किया है। खुद उसके मंज़िल, उसके टारगेट ऊंचे होते हैं। तभी वो अपने स्टाफ़ को भी बड़े चैलेंज दे पाता है।
ऐसे बॉस अपने क़ायदे-क़ानून के भी पक्के होते हैं। कुछ मुलाज़िम ऐसे बॉस को हो सकता है, वक़्ती तौर पर पसंद ना करें। लेकिन दिल में उसके लिए इज़्ज़त हमेशा रहती है। असल में लोग उसके काम करने के तरीक़े और उसके काम की इज़्ज़त करते हैं।
अपने स्टाफ़ से सख़्ती से काम लेना और मज़बूत इरादों वाला बॉस होना कोई गुनाह नहीं है।
लेकिन ज़्यादातर बॉस अपने मातहतों के दरमियान अपनी अच्छी पहचान बनाए रखना चाहते हैं, जो एक तरह की बीमारी भी है। अगर आप यह जानना चाहते हैं कि कही आपको यह बीमारी नहीं लग गई तो ज़रा इन सवालों पर ग़ौर फरमाइये।
क्या पिछले एक साल में ऐसा हुआ है कि कोई जूनियर आपकी उम्मीदों पर खरा ना उतरा हो तो आपने उससे अपनी अपेक्षाएं ही बदल दी हों?
क्या पिछले एक साल में आपने अपने किसी कर्मचारी को उसके खराब रवैये की वजह से डांटा फटकारा हो?
क्या ऐसा हुआ है कि कोई मुलाज़िम बहुत मेहनत के बाद भी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया। फिर भी आपने उसकी मेहनत की तारीफ़ की है। उसे इनाम के तौर पर कुछ बोनस दिया है?
क्या आपने अपने स्टाफ़ के लिए डेडलाइन के साथ कुछ मुश्किल टारगेट रखे हैं? लक्ष्य भी ऐसे जिनका नतीजा साफ़ तौर पर नज़र आए।
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