दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव के लिए संगठनों ने भावी प्रत्याशियों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन फिर भी टिकट के दावेदारों ने टिकट पाने के लिए प्रचार में पूरी ताकत झोंक रखी है। दावेदार हस्तलिखित पोस्टर, प्रिटेंड पोस्टर, फोन, ईमेल, वॉट्सअप, ट्विटर का सहारा ले रहे हैं। प्रचार के लिए पैसे भी खूब बहाए जा रहे हैं। इसका कारण यह है कि जब तक दावेदार पैनल के उम्मीदवार नहीं बन जाते, उनका यह खर्च चुनावी खर्च में शामिल नहीं होगा।
DUSU इलेक्शन में पसीना नहीं पैसे बहा रहे हैं टिकट के उम्मीदवार, ऐसे कर रहे प्रचार
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कैंपस से लेकर दिल्ली के अन्य स्थानों की दीवारों पर टिकट के लिए दावेदारी करने वालों के पोस्टर पटे हुए हैं। कॉलेज व कैंपस में बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों में कैंपस प्रचार के लिए पहुंच रहे हैं। कैलेंडर, डायरी, पैन बांटे जा रहे हैं। प्रत्याशी घोषित होने पर छात्रों को लुभाने के लिए फिल्म से लेकर मनोरंजन पार्क में यात्रा कराए जाने पर विचार हो रहा है। ऐसे में यह चुनाव लाखों-करोड़ों का हो जाएगा।
लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक, चुनाव खर्च की सीमा पांच हजार रुपये ही है। छात्र संगठनों के मुताबिक, उम्मीदवार बनने के बाद उनका एक दिन का खर्च ही 20 हजार से काफी ऊपर पहुंच जाता है। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के चलते केवल हस्तलिखित पोस्टर का ही इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए कागज और रंग का प्रयोग करने में ही काफी खर्च आ जाता है। भावी उम्मीदवार हस्तलिखित पोस्टर को ही बड़ी संख्या में प्रिंट करवा लेते हैं। जिसपर काफी खर्चा हो जाता है। संगठनों से जुड़े लोगों की मानें तो उम्मीदवारों के साथ उनके समर्थक होते हैं, जिनका दिनभर का खाने-पीने का खर्च करीब हजार रुपये होता है। वहीं एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में जाने का खर्च भी काफी अधिक हो जाता है।
नामांकन से पहले ही प्रचार के लिए तमाम संगठन दिन-रात एक किए हुए हैं। एक और जहां कैंपस व विभिन्न स्थानों की दीवारें प्रिटेंड पोस्टर से पटी पड़ी है। वहीं कम समय से में ज्यादा से ज्यादा छात्रों तक पहुंच बनाने के लिए हाईटेक प्रचार(सोशल मीडिया) का सहारा भी लिया जा रहा है। संगठन कम दिनों में प्रचार के लिए सोशल मीडिया को अहम हथियार मान रहे हैं। एनएसयूआई की सोशल मीडिया इंचार्ज प्रियंका खेड़ा ने बताया कि कॉलेज-कॉलेज जाकर प्रचार पर तो जोर है ही, लेकिन अब सोश्ल मीडिया पर प्रचार को तेज किया गया है।
एबीवीपी के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक साकेत बहुगुणा कहते हैं कि लिगंदोह कमेटी की सिफारिशों के आधार पर चुनाव के लिए पांच हजार की सीमा व्यवहारिक नहीं है। व्यवहारिक नहीं होने के कारण इसका पालन संभव नहीं हो पाता। एक कॉलेज यूनियन के उम्मीदवार के लिए भी पांच हजार और डूसू के लिए खड़े होने वाले के लिए भी खर्च की सीमा पांच हजार रुपये है। डीयू में पचास कॉलेज व विभाग हैं। कई कॉलेजों की दूरी काफी अधिक है। यदि उम्मीदवार अपनी गाड़ी का प्रयोग करे तो पेट्रोल ही हजारों का लग जाता है।