चमोली जिले में स्थित नीती घाटी के रैणी में स्नो एवलांच के साथ ही ग्लेशियर फटने की घटना से हुई तबाही के बाद आपदा के कारणों का पता लगाने के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों की दो टीमें रवाना कर दी गई हैं। संस्थान की ओर से भेजे गए वैज्ञानिकों की टीमों में संस्थान के हाइड्रोलॉजिस्ट और जियोमार्फोलाजिस्ट शामिल हैं जो आपदा से जुड़े तमाम वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन करने के साथ ही इस बात का पता लगाएंगे कि ऋषिगंगा आपदा की वजह क्या रही।
2 of 6
वाडिया इंस्टीट्यूट
- फोटो : अमर उजाला (file photo)
वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. कालाचंद साईं ने बताया कि संस्थान के हाइड्रोलॉजिस्ट डॉ. अमित कुमार, डॉ. समीर तिवारी व डॉ. अभय वर्मा के साथ ही दो जियोमार्फोलॉजिस्ट डॉ. मनीष मेहता व डॉ. विनीत कुमार को आपदा के बाद तमाम उपकरणों के साथ रवाना कर दिया गया है। साईं ने बताया कि वैज्ञानिक आपदा के बाद रियल टाइम फ्लड मेजरमेंट के साथ ही आपदा से हुए नुकसान का भी आकलन करेंगे। साथ ही आपदा की वजह से प्रभावित क्षेत्रों की भू आकृति में क्या क्या बदलाव हुआ है, इसका पता लगाएंगे।
3 of 6
चमोली में आपदा
- फोटो : अमर उजाला
संस्थान के वरिष्ठ जल विज्ञानी डॉ. एसके राय का कहना है कि ऋषिगंगा आपदा की मुख्य वजह क्या हो सकती है, इस बारे में अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। अध्ययन के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की टीम सेटेलाइट से मिले डाटा का भी विश्लेषण कर रही है। वैज्ञानिकों की मानें तो जिस जगह पर आपदा आई वहां फिलहाल संस्थान की ओर से कोई मॉनिटरिंग स्टेशन नहीं लगाए गए हैं। ऐसे में आपदास्थल का विस्तृत अध्ययन करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
4 of 6
चमोली में आपदा
- फोटो : अमर उजाला
फिलहाल संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि सेटेलाइट के जरिए मिले डाटा के आधार पर इस बात की जानकारी जुटाई जा रही है कि आखिरकार आपदा के समय क्या हुआ। ऋषिगंगा आपदा के बाद उत्तराखंड में स्थित छोटे बड़े 1400 ग्लेशियर की निगरानी व उनके अध्ययन को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि वर्तमान में वाडिया इंस्टीट्यूट के जलविज्ञानियों की ओर से राज्य में स्थित ग्लेशियरों में से सिर्फ पांच ग्लेशियर गंगोत्री, डोकरियानी, चौराबाड़ी, कासनी व पिंडारी जैसे ग्लेशियरों की ही मॉनिटरिंग की जा रही है।
5 of 6
चमोली में तपोवन डेम
- फोटो : अमर उजाला
इसके अलावा संस्थान की ओर से जम्मू कश्मीर स्थित काराकोरम ग्लेशियर, हिमाचल प्रदेश स्थित पंछीनाला व पठसेव और सिक्किम में जेमू ग्लेशियर की ही मॉनिटरिंग की जा रही है। संस्थान के वैज्ञानिकों की मानें तो चमोली के नीति घाटी स्थित रैणी में जहां आपदा आयी, उससे थोड़ी दूर स्थित दो ग्लेशियर द्रोणगिरी व वांगिनी की मॉनिटरिंग के लिए स्टेशन स्थापित किया जा रहा है और जल्दी ही इन ग्लेशियर की मानीटिरिंग की जाएगी।