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इसलिए होती हैं भारतीय पिच स्लो

Wed, 29 Mar 2017 11:11 AM IST
राखी शर्मा / बीबीसी हिंदी के लिए
राखी शर्मा / बीबीसी हिंदी के लिए Updated Wed, 29 Mar 2017 11:11 AM IST
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That is why Indian pitch slow
क्रिकेट के किसी भी फॉर्मेट में मुकाबले का नतीजा काफी हद तक पिच या विकेट पर भी नर्भर करता है। आइए आपको बताते हैं किस तरह से और कितने दिन में तैयार होती है क्रिकेट की एक पिच। पिच तैयार करने के दो पहलू होते हैं-


विकेट का निर्माण और विकेट की तैयारी पहले जानते हैं विकेट का निर्माण आखिर किस तरह से होता है ? किसी भी नए विकेट को तैयार होने में करीब दो साल का समय लगता है। इसे तैयार करने में पारंपरिक तरीकों के अलावा विज्ञान की भी भागेदारी रहती है। 
 

अच्छी विकेट के लिए गाद और रेत जरूरी

That is why Indian pitch slow
अच्छी विकेट बनाने के लिए जिस मिट्टी की आवश्कता होती है, उसमें क्ले की मात्रा 50 से 70 प्रतिशत होनी चाहिए। इसके अलावा उसमें सिल्ट यानी गाद और रेत भी होना आवश्यक है। इन दोनों का भी सही अनुपात में होना जरूरी है। ये मापदंड आईसीसी द्वारा रखे जाते हैं। भारतीय पिचों के स्लो होने का मुख्य कारण क्ले की मात्रा कम और सिल्ट की मात्रा जरूरत से दस गुना ज्यादा होना है। 
 

IIT जैसे संस्थान देते है मिट्टी की जानकारी

That is why Indian pitch slow
पहले जहां स्टेडियम होता था उसके 5-10 किलोमीटर के दायरे में ही ऐसी मिट्टी की खोज की जाती थी। लेकिन पिछले कुछ सालों से तकनीक के इस्तेमाल से तरीका बदल गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और आईआईटी मुंबई प्रत्येक राज्यों की मिट्टी,

उसमें पाए जाने वाले खनिज पदार्थ और उनकी जगह की जानकारी मुहैया कराती है, जिससे बीसीसीआई को बड़ी मदद पहुंची है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पास अब 250 के करीब बेंचमार्क मिट्टी के नमूने हैं जिनसे विदेशी पिचों के टक्कर की विकेट तैयार की जा सकती है।
 
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विकेट का निर्माण

That is why Indian pitch slow
जब कोई नई विकेट तैयार की जाती है तो उसमें दो या तीन लेयर डाली जाती है। ऊपरी लेयर जिसे 'प्लेइंग सरफेस' भी कहते हैं, उसमें 8-12 इंच की मोटी क्ले की पट्टी बनाई जाती है। दूसरी लेयर 8 इंच की होती है, जो दो भागों में बांटी जाती है। पहले 4 इंच में रेत ठोस करने के बाद दूसरे 4 इंच में बलुई मिट्टी डाली जाती है। ये लेयर उपसतह जल निकासी का काम करती है।

पहले जल निकासी लेयर की उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया जाता था। इसके नुकसान मैच के दिन देखने को मिलता था। मैच से पहले जब विकेट को पानी दिया जाता था तो वो पानी प्लेइंग सरफेस और जल निकासी लेयर के बीच जम जाता था। इससे मैच के दौरान वो जमा हुआ पानी वाष्प के रूप में प्लेइंग सरफेस की तरफ बढ़ता था। इससे विकेट की डेन्सिटी प्रभावित होती थी और वो धीमा हो जाता था। इसका ज्यादा नुकसान टेस्ट मैचों में देखने को मिलता था।
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प्लेइंग सरफेस की क्ले 

That is why Indian pitch slow
जिस जगह विकेट बिछाना होता है, उसे पहले समतल कर लिया जाता है। फिर उस पर 4 इंच रेत डालकर उसे ठोस किया जाता। उस पर 4 इंच की बलुई मिट्टी डाली जाती है। इसे भी प्लेट वाइब्रेटर की मदद से ठोस किया जाता है।

आखिर में प्लेइंग सरफेस की क्ले बिछाई जाती है जो 8-12 इंच की परत होती है। हालांकि क्ले सीधे बाहर से लाकर नहीं बिछाई जाती। पहले उसके छोटे छोटे संघ काटे जाते हैं और धूप में सुखाए जाते हैं। इस क्ले की 20-25 मिलीमीटर की एक-एक लेयर प्लेइंग सरफेस पर डाली जाती है। ये करीब 5 इंच तक पानी और रोलर की मदद से बैठाई जाती है।
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