कोराना संग जीना है: वैक्सीन बाजार में आने तक कोरोना से हारे नहीं, इसके साथ जीने की सोचें
- कोरोना वायरस से निकट भविष्य में निजात मिलने की उम्मीद नहीं के बराबर है।
- समय की मांग को देखते हुए अपने जीवन में कुछ बदलाव किए जाएं।
- कोरोना के अस्तित्व के साथ जीने की आदत डाल लेने में ही सबकी भलाई है।
- लॉकडाउन को इसका स्थायी हल नहीं समझा जा सकता।
विस्तार
कोरोना का कहर अपने चरम पर है या फिर अभी इससे कहीं ज्यादा तबाही देखना शेष है। इस बारे में कोई भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता। लेकिन क्या इस कहर से बचने के लिए जीवन में कुछ बदलाव नहीं किए जा सकते।
अगर हम अपने दैनिक जीवन में कुछ बदलाव ले आएं तो निश्चित तौर पर इसे काफी हद तक काबू में किया जा सकता है। दरअसल, कोरोना वायरस से निकट भविष्य में निजात मिलने की उम्मीद नहीं के बराबर है। इसलिए लोगों को स्वीडन की तरह कोरोना के साथ जीना सीख लेना चाहिए।
कोरोना के कहर से पूरी दुनिया हिली हुई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था, रोज़गार, से लेकर तमाम जिंदगियां पुनर्जीवन को तरस रही हैं। दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों और वायरोलॉजिस्ट ने भी यह आगाह कर दिया है कि इसका संक्रमण इतनी जल्दी उड़न छू नहीं होने वाला और ना हीं इतनी जल्दी इससे निपटने को वैक्सीन तैयार होने की संभावना है। इसलिए बेहतर है कि आप इसी के साथ जीने की आदत डाल लें।
कोरोना के साथ जीने की आदत डालने का मतलब यह नहीं है कि बीमार होते हुए भी सामान्य जीवन जीने की कोशिश की जाए। बल्कि यह जरूरी है कि समय की मांग को देखते हुए अपने जीवन में कुछ बदलाव किए जाएं। यह बदलाव हमारे मेलजोल के तौर तरीके और स्वच्छता से जुड़े हुए हैं। ताकि कोरोना का संक्रमण आपके शरीर को जीर्ण नहीं कर सके। साथ ही आपका दैनिक जीवन पटरी पर आने लगे।
शुरुआत में जब स्वीडन ने लॉकडाउन नहीं कर कोरोना से निपटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग, स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और अनुशासित रहने की बात कही तो निश्चित तौर पर यहां रहने वाले हम जैसे कई प्रवासियों को यह बात जरा भी ठीक नहीं लगी थी।
जबकि दुनियाभर में इसकी आलोचना भी खूब हुई। लेकिन धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी कि कोरोना के अस्तित्व के साथ जीने की आदत डाल लेने में ही सबकी भलाई है। यह हमारे मानसिक और आर्थिक सेहत के लिए भी जरूरी है।
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यही वजह है कि आज स्वीडन में लोग बेशक कोरोना से खासे परेशान हैं लेकिन जीवन का पहिया धीमी रफ़्तार से ही सही आगे बढ़ रहा है। लोग जरूरत के सभी काम कर पा रहे हैं। मॉल, रेस्तरां, रिटेल, दफ्तर, विद्यालय, पार्क सभी खुले हुए हैं।
लेकिन इन सभी जगहों पर जाने के लिए विशेषज्ञों की बताई गई बातों का अनिवार्य रूप से पालन हो रहा है। ताकि संक्रमण का खतरा कम से कम हो। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कोरोना से निपटने के स्वीडन के तरीके में भविष्य तलाश रहा है।
ऐसा मैं इसलिए भी कह रही हूं क्योंकि इटली, जर्मनी, फिनलैंड समेत तमाम यूरोपीय देश जो अबतक लॉकडाउन का सख्ती से पालन कर रहे थे, उन्होंने कोरोना संक्रमित लोगों की कम होती संख्या को देखते हुए नियमों में ढील देना शुरू कर दिया है।
कोरोना लोगों के शरीर के साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है....
लॉकडाउन से घर बैठे लोगों की मानसिक सेहत और देश की अर्थव्यवस्था दिनों-दिन गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है। इसलिए सरकार ने लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझाते हुए धीरे-धीरे सख्ती कम करना शुरू कर दिया है। लेकिन लॉकडाउन में ढील देते ही ज़्यादातर देशों में कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ने लगा है।
जर्मनी में दोबारा कोरोना संक्रमण तेजी से फैलने लगा। यही नहीं समय के साथ कोरोना के लक्षण और संक्रमण के तरीकों में बदलाव भी देखा जाने लगा है। यह बतलाता है कि लंबे समय तक लॉकडाउन के सहारे इस बीमारी से नहीं निपटा जा सकता। जरूरी है कि हम इससे निपटने के लिए अपने नियम खुद बनाए और उसका पूरी ईमानदारी से पालन करें।
डब्ल्युएचओ के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हेल्थ इमरजेंसी प्रोग्राम, डॉक्टर माइक रेयान ने भी साफ शब्दों में कह दिया है कि हमें इस वायरस के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। संभव है कि इस वायरस का भी कुछ दूसरे वायरस की तरह स्थानीयकरण हो जाए और वह कभी दूर ही नहीं जाए।
जैसे एचआईवी का वायरस आज भी बना हुआ है, लेकिन हम एहतियात बरत कर इससे दूरी बनाए हुए हैं। इसी तरह खसरा को भी तमाम प्रयासों के बावजूद खत्म नहीं किया जा सका, लेकिन इससे पीड़ित लोगों की संख्या दिनों दिन कम होती चली गई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह भी चेताया है कि कोरोना लोगों के शरीर के साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता जा रहा है। इसलिए लॉकडाउन को इसका स्थायी हल नहीं समझा जा सकता। जबतक वैक्सीन नहीं तैयार कर लिया जाता लोगों को इसी के साथ जीने की आदत डालनी होगी।
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कोरोना की भयावहता सोचने की जगह अब इसके साथ जीने के तरीके सोचें जाएं...
अगर कोई वैक्सीन साल भर में तैयार होकर बाजार में उपलब्ध हो जाता है तो यह अपने आप में रिकॉर्ड साबित होगा, क्योंकि वैक्सीन तैयार करने की प्रक्रिया लंबी होती है। तबतक विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से बताई गई सावधानियों को अपनाकर इससे बचने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।
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कोरोना की वजह से बच्चे व युवाओं के साथ स्वास्थ्यकर्मियों पर भी भारी मानसिक दबाव बना हुआ है, इसलिए जरूरी है कि कोरोना की भयावहता सोचने की जगह अब इसके साथ जीने के तरीके सोचें जाएं।
स्वीडन की पब्लिक हेल्थ एजेंसी वैक्सीन नहीं उपलब्ध होने तक हर्ड इम्युनिटी, एंटीबॉडीज के जरिए कोरोना वायरस को बेअसर करने की बात काफी हद तक स्वीकार करने लगी है। कारण है वैक्सीन तैयार होने में लंबा समय लगने का अनुमान।
यह कहा जा रहा है कि जब देश की 60 फीसदी आबादी कोरोना से संक्रमित हो जाए और वे लोग ठीक होने लगे यानी इम्युन होने लगे तो तो इसका मतलब यह है कि कोरोना ऐसे लोगों पर बेअसर हो रहा है। यानी इस बीमारी से लड़ने के लिए लोगों के शरीर में प्रतिरक्षात्मक गुण (एंटी बॉडिज) विकसित होने लगे हैं।
हालांकि यह बड़ा ही विवादित प्रयोग है। कई वैज्ञानिक इसके विरोध में हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है। लेकिन इसके पक्षधर वैज्ञानिक मानते हैं कि लॉकडाउन कोरोना को पूरी तरह से नहीं रोक सकता।
एक समय के बाद जब लोग बाहर निकलेंगे तब परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं, इसलिए किसी सोसाइटी में जैसे-जैसे लोग इम्युन होंगे कोरोना वायरस वहां उतना ही कमजोर पड़ता जाएगा।
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