मंदिर हो या मस्जिद, लगभगर हर धार्मिक स्थल से जुड़ा कोई न कोई चमत्कारी किस्सा सुनने को मिल ही जाता है। मगर महाराष्ट्र के पुणे के पास एक दरगाह ऐसी है जिससे जुड़ा रहस्य विज्ञान भी आज तक नहीं सुलझा पाया है। मुंबई से करीब 16 किलोमीटर दूर पुणे-बेंगलुरु हाइवे पर शिवपुरी गांव में मौजूद कमर अली शाह दरवेश की दरगाह में एक रहस्यमी पत्थर है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से आते हैं।
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आज तक अनसुलझा है इस पत्थर का रहस्य, कानी उंगली से लोग उठा लेते हैं 90 किलो का पत्थर
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Updated Thu, 23 Aug 2018 04:01 PM IST
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Kamar Ali Darvesh Dargah
Kamar Ali Darvesh Dargah
क्या है रहस्य?
दरगाह परिसर में एक पत्थर रखा हुआ है। इसका वजन 90 किलोग्राम है। जाहिर है कि इतना भारी पत्थर अकेले उठाना मुमकिन नहीं है। वैसे तो लोग अकेले इसे उठा लेते हैं, मगर कुल पल से ज्यादा देर तक थामकर नहीं रख सकते। ताज्जुब की बात यह है कि उसी पत्थर को जब 11 लोग एक साथ मिलकर उठाने की कोशिश करते हैं, तो वह पत्थर इतना हल्का महसूस होता है कि उसे कानी उंगली से भी उठाना मुमकिन हो जाता है।
दरगाह परिसर में एक पत्थर रखा हुआ है। इसका वजन 90 किलोग्राम है। जाहिर है कि इतना भारी पत्थर अकेले उठाना मुमकिन नहीं है। वैसे तो लोग अकेले इसे उठा लेते हैं, मगर कुल पल से ज्यादा देर तक थामकर नहीं रख सकते। ताज्जुब की बात यह है कि उसी पत्थर को जब 11 लोग एक साथ मिलकर उठाने की कोशिश करते हैं, तो वह पत्थर इतना हल्का महसूस होता है कि उसे कानी उंगली से भी उठाना मुमकिन हो जाता है।
ऐसी मान्यता है कि अगर 11 लोग एक साथ मिलकर, सूफी संत कमर अली शाह का नाम लेते हुए, कानी उंगली से पत्थर उठाने की कोशिश करेंगे, तो यह आसानी से उठ जाएगा। हालांकि, अगर गिनती नें 11 से एक भी इंसान कम हुआ, तो इस पत्थर को कानी उंगली से उठाना मुमकिन नहीं। यही नहीं, अगर पत्थर उठाते वक्त 11 लोगों में से किसी एक शख्स ने भी संत का नाम नहीं लिया, तो पत्थर उसकी ओर झुक जाएगा। जब भी लोग इसे उठाते हैं, उनकी कोशिश होती है कि वे ज्यादा से ज्यादा वक्त तक सांस थामकर फकीर बाबा का नाम लेते रहें।
Kamar Ali Darvesh Dargah
पत्थर से जुड़ा है यह किस्सा
कहा जाता है कि जिस जगह आज दरगाह मौजूद है, वहां पहले एक व्यायामशाला हुआ करती थी। पहलवान वहां कसरत करते थे। कमर अली शाह दरवेश के माता-पिता भी चाहते थे कि उनका बेटा भी पहलवानी करे, मगर कमर अली को इसमें दिलचस्पी नहीं थी। पहलवान इस बात के लिए उनका मजाक भी उड़ाते थे।
शरीर को गठीला बनाने के लिए पहलवान वहां पड़े भारी पत्थरों को उठाकर वर्जिश करते थे।हालांकि, भारी होने की वजह से उठा पाना मुश्किल होता था। एक दिन जब वे सभी बलशाली लोग दुबली-पतली कद-काठी वाले संत की खिल्ली उड़ा रहे थे, तब उन्होंने कहा कि जिस पत्थर को उठाने में उनके पसीने छूट रहे हैं, वह तो सिर्फ उंगली से ही उठाई जा सकती है। पहले तो सभी ने संत का मजाक उड़ाया, मगर जब पहलवानों ने उनके बताए तरीके को आजमाते हुए पत्थर उठाने की कोशिश की, तो वह बड़ी आसानी से उठ गया।
कहा जाता है कि जिस जगह आज दरगाह मौजूद है, वहां पहले एक व्यायामशाला हुआ करती थी। पहलवान वहां कसरत करते थे। कमर अली शाह दरवेश के माता-पिता भी चाहते थे कि उनका बेटा भी पहलवानी करे, मगर कमर अली को इसमें दिलचस्पी नहीं थी। पहलवान इस बात के लिए उनका मजाक भी उड़ाते थे।
शरीर को गठीला बनाने के लिए पहलवान वहां पड़े भारी पत्थरों को उठाकर वर्जिश करते थे।हालांकि, भारी होने की वजह से उठा पाना मुश्किल होता था। एक दिन जब वे सभी बलशाली लोग दुबली-पतली कद-काठी वाले संत की खिल्ली उड़ा रहे थे, तब उन्होंने कहा कि जिस पत्थर को उठाने में उनके पसीने छूट रहे हैं, वह तो सिर्फ उंगली से ही उठाई जा सकती है। पहले तो सभी ने संत का मजाक उड़ाया, मगर जब पहलवानों ने उनके बताए तरीके को आजमाते हुए पत्थर उठाने की कोशिश की, तो वह बड़ी आसानी से उठ गया।
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Kamar Ali Darvesh Dargah
आखिर उंगली से कैसे उठ सकता है इतना भारी पत्थर?
दरअसल, संत कमर अली दरवेश यह सीख देना चाहते थे कि आध्यात्मिक शक्ति शारीरिक ताकत से ज्यादा प्रभावशाली होती है। इसलिए उन्होंने कहा कि जब लोग एक साथ पवित्र मन से उनका नाम लेते हुए पत्थर उठाएंगे, तो वह बड़ी आसानी से ऐसा करने में कामयाब हो जाएंगे।
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कौन हैं कमर अली दरवेश ?
कमर अली दरवेश सूफी संत थे। 700 साल पहले वह इस गांव में अपने माता-पिता के साथ आए थे। 18 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को इसी जगह दफना दिया गया था। इस दरगाह में विदेशी भी मन्नत मांगने आते हैं। हालांकि, महिलाओं का प्रवेश यहां वर्जित है।
कमर अली दरवेश सूफी संत थे। 700 साल पहले वह इस गांव में अपने माता-पिता के साथ आए थे। 18 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को इसी जगह दफना दिया गया था। इस दरगाह में विदेशी भी मन्नत मांगने आते हैं। हालांकि, महिलाओं का प्रवेश यहां वर्जित है।