"ऐसा लगता है कि मुझे बार-बार ये साबित करने की जरूरत है कि मैं जहाँ पर हूँ वहाँ मैं क्यों हूँ। हर मीटिंग में जाने से पहले मुझे ऐसा ही लगता है। क्या आज मेरी मूर्खता साबित हो जाएगी? क्या आज लोग एक मुखौटे के आर-पार देख लेंगे कि असल में इस बंदे में कोई जान नहीं है?" ये कहना है जेरेमी न्यूमैन का जो हाल तक बीडीओ कंपनी के ग्लोबल सीईओ थे। ये कंपनी दुनिया की सबसे बडी अकाउंटिंग फर्म्स में से एक है।
कामयाब और काबिल लोगों के मन में होते हैं ये अजीबो-गरीब डर, नहीं जानते होंगे आप
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अपनी नई किताब 'लीडिंग प्रोफेशनल्सः पावर, पॉलिटिक्स एंड प्राइमा डोनास' में जब मैंने ऐसे लोगों के बारे में लिखा तो मुझे दुनिया भर से रिस्पॉन्स मिले। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों ने कहा कि वे भी ऐसे ही हैं। डरे हुए कामयाब लोग पैदा नहीं होते, वे वक्त के साथ ऐसे बन जाते हैं।
इसकी नींव बचपन में ही पड जाती है। मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और शारीरिक असुरक्षा की भावना उन्हें ऐसा बनाती है। जिन बच्चों ने आकस्मिक और अप्रत्याशित गरीबी देखी है, वे इससे कभी उबर नहीं पाते। बडे होने पर वे इतना कमा सकते हैं कि फिर गरीबी नहीं देखनी पडेगी, ऐसा विश्वास वे कर ही नहीं पाते।
कुछ बच्चों को लगता है कि उनके माता-पिता उनकी तरफ तभी ध्यान देते हैं, जब वे बहुत अच्छा रिजल्ट लाते हैं। उनकी ये सोच घर छोडने के सालों बाद तक बनी रहती है। असुरक्षा की ये भावना उनकी पहचान से जुड जाती है।
ऐसे लोग टॉप की कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन करते हैं। वे उन कंपनियों को चुनते हैं, जहाँ काम करना दुनिया भर के एमबीए ग्रैजुएट्स का सपना होता है। ऐसे फर्म्स अपने नये कर्मचारियों को बताते हैं कि हम इस बिजनेस में सर्वश्रेष्ठ हैं। चूंकि आप भी हमारे साथ काम करते हैं इसलिए आप भी श्रेष्ठ हैं।
जिन लोगों को अपनी क्षमता पर भरोसा नहीं होता, वे खुशी से भर जाते हैं। लेकिन जल्द ही वे इस आशंका से घिर जाते हैं कि यदि वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे, तो उनको निकाल दिया जाएगा। ऐसी कंपनियों में मूल्यांकन और ईनाम की व्यवस्था इनके डर को जिंदा रखती है। यहाँ तरक्की के लिए कडी प्रतिस्पर्धा होती है और प्रमोशन कैसे मिलता है, ये स्पष्ट नहीं होता।
ऊंचे होते पैमाने
पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी की डॉक्टर अलेक्जांड्रा मिचेल ने इन्वेस्टमेंट बैंकर्स के जीवन और करियर पर बडी रिसर्च की है। वो कहती हैं, "साल के अंत में आपको मिलने वाला ईनाम दूसरों के बरक्स आपके मूल्यांकन पर निर्भर करता है। आपको पता नहीं होता कि वे क्या काम कर रहे हैं। आपको बस इतना पता होता है कि वे सुपर स्मार्ट हैं और गाढी मेहनत कर रहे हैं।"
कर्मचारियों को पता होता है कि उनके काम को सहकर्मियों के बनिस्पत आंका जाएगा। चूंकि उन्हें ये पता नहीं होता कि उनके सहकर्मी असल में क्या कर रहे हैं, इसलिए वे अपने लिए बहुत ऊंचा मानक तय कर लेते हैं जिससे कोई कसर ना रह जाए।चूंकि इस व्यवस्था में सभी लोग ऐसा ही करते हैं, इसलिए ये पैमाना ऊंचे से और ऊंचा होता जाता है।
शोध के दौरान एक कंसल्टिंग फर्म के सीनियर एक्जीक्यूटिव ने अपने दो सहकर्मियों के बारे में बताया जो काम तो अच्छा करते थे, मगर हमेशा इस आशंका में रहते थे कि उन्हें खराब परफॉर्मेंस के लिए झिडकी मिलेगी और नौकरी छोडने को कहा जाएगा।जब उनके बॉस उन्हें जल्दी घर जाने और परिवार को समय देने को कहते तो उनका जवाब होता, "नहीं नहीं, मुझे काम करना है।"
जूनियर लेवल के कर्मचारी जब अपने सीनियर को ऐसे काम करते हुए देखते हैं तो उनको लगता है कि तरक्की पाने का यही एक तरीका है। इस तरह यह पैटर्न दोहराया जाता है। ग्लोबल लॉ फर्म 'एलेन एंड ओवरी' के सीनियर पार्टनर रह चुके डेविड मोर्ली सीनियर वकीलों को सर्कस के रिंगमास्टर की तरह बताते हैं।
मोर्ली कहते हैं, "यदि आपका काम अच्छा है और आप अपने काम को इंज्वॉय करते हैं तो आप तरक्की करते जाएंगे। आप लंबा-चौडा बिल बनाएंगे जिनको आपके क्लाएंट चुकाएंगे। फिर आपके फोन की घंटी बजेगी और आप अगले काम में लग जाएंगे। यह एक नशे की तरह है।"
सब कुछ इतना पॉजिटिव नहीं है। लंबे समय तक काम करते रहने और लगातार आगे रहने की होड से शारीरिक और मानसिक सेहत को नुकसान होता है। थकान, दर्द, लत, भोजन संबंधी विकार और किसी का अवसाद का शिकार हो जाना बेहद सामान्य बात है।