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इस सबसे कामयाब गर्भ निरोधक से महिलाएं अनजान क्यों, सच्चाई जानकर पैरों तले खिसक जाएगी जमीन
जारिया गोरवेट, बीबीसी फ्यूचर
Updated Sun, 16 Sep 2018 10:33 AM IST
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गर्भनिरोध के लिए भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय तरीका नसबंदी रहा है, बल्कि ये विकल्प पूरी दुनिया में सब से ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसके बाद नंबर आता है गर्भ निरोधक दवाओं का। हालांकि, गर्भ निरोध के कई विकल्प हैं, लेकिन ये चलन में बहुत कम हैं। ऐसा ही एक विकल्प है आईयूडी यानी इंट्रा यूटेराइन डिवाइस। आकार में छोटे पेपर क्लिप के बराबर दिखने वाली आईयूडी कई आकार में आती है। गोल और झालरदार से लेकर चार पैर वाली मकड़ी की शक्ल तक में ये गर्भ निरोधक उपलब्ध है। भारत में सबसे ज़्यादा चलन में है, अंग्रेज़ी के अक्षर T के आकार वाली डिवाइस, यानी कॉपर-टी। ये प्लास्टिक की होती है और इसमें धागा निकला रहता है।
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पश्चिमी देशों में इसकी मांग ज्यादा है। इसे महिला की कोख में फिट किया जाता है। कंपनी और क्वालिटी के आधार पर ये डिवाइस गर्भाशय में करीब 12 साल तक रह सकती है। इसे सबसे कामयाब गर्भनिरोधक माना जाता है, लेकिन इसका मतलब ये हरगिज नहीं कि सारी दुनिया की औरतें इसके बारे में जानती हैं। मिसाल के लिए एशिया में 27 फीसद औरतें ही आईयूडी गर्भ निरोधक डिवाइस का इस्तेमाल करती हैं, जबकि उत्तरी अमरीका में महज 6.1 फीसदी, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में महज दो प्रतिशत महिलाएं ही इसके बारे में जानती हैं।
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आखिर इतनी कारगर चीज के बारे में महिलाएं अनजान क्यों हैं?
मार्केटिंग पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया
अमरीका में इसकी मार्केटिंग पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। दवा कंपनियों ने गर्भनिरोधक गोलियों का प्रचार खूब किया और मोटा पैसा कमाया। इसीलिए महिलाएं उनके बारे में ज्यादा जानती हैं। उनका इस्तेमाल भी करती हैं। नॉन-प्रॉफिट ह्यूमन डेवेलपमेंट संस्था एफ़एचआई 360 में काम करने वाले महामारियों के जानकार डेविड ह्यूबचर का कहना है कि बहुत सी कंपनियां कई तरह की गोलियां बाजार में उतार चुकी हैं। सभी गोलियों का फॉर्मूला कमोबेश एक जैसा ही है, पर हर कंपनी अपनी दवा को बेहतरीन गर्भनिरोधक बताकर बाजार में बेचती है। आईयूडी 1988 से बाजार में उपलब्ध है, लेकिन इसके प्रचार और मार्केटिंग पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया।
मार्केटिंग पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया
अमरीका में इसकी मार्केटिंग पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। दवा कंपनियों ने गर्भनिरोधक गोलियों का प्रचार खूब किया और मोटा पैसा कमाया। इसीलिए महिलाएं उनके बारे में ज्यादा जानती हैं। उनका इस्तेमाल भी करती हैं। नॉन-प्रॉफिट ह्यूमन डेवेलपमेंट संस्था एफ़एचआई 360 में काम करने वाले महामारियों के जानकार डेविड ह्यूबचर का कहना है कि बहुत सी कंपनियां कई तरह की गोलियां बाजार में उतार चुकी हैं। सभी गोलियों का फॉर्मूला कमोबेश एक जैसा ही है, पर हर कंपनी अपनी दवा को बेहतरीन गर्भनिरोधक बताकर बाजार में बेचती है। आईयूडी 1988 से बाजार में उपलब्ध है, लेकिन इसके प्रचार और मार्केटिंग पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया।
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आईयूडी को लेकर गलतफहमी
आईयूडी के बारे में जानकारी की कमी की और भी कई वजहें हैं। इसके बारे में कई तरह की अफवाहें लोगों के बीच फैलाई गई हैं। जैसे आईयूडी से सेक्शुअल लाइफ खराब हो जाती है। इससे बहुत दर्द होता है। सबसे ज्यादा गलतफहमी तो ये है कि आईयूडी से बांझपन हो जाता है। लोगों के बीच इस गलतफहमी का पहला सबूत उन्नीसवीं सदी में मिला था। दरअसल आईयूडी बनाने से पहले रिसर्चर और भी कई तरह की तरकीबों पर काम कर रहे थे। तजुर्बे के तहत ही महिलाओं की कोख में कई तरह की डिवाइस लगाई गई थीं। इन्हें स्टेम पेसरीज कहा जाता था। ये रबर, कांच या धातु से बने होते थे। लेकिन आईयूडी का सबसे कामयाब वर्जन 1920 में जर्मनी के डॉक्टर अर्न्स्ट ग्रेफेनबर्ग ने बनाया था। जी-स्पॉट का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा है।
आईयूडी के बारे में जानकारी की कमी की और भी कई वजहें हैं। इसके बारे में कई तरह की अफवाहें लोगों के बीच फैलाई गई हैं। जैसे आईयूडी से सेक्शुअल लाइफ खराब हो जाती है। इससे बहुत दर्द होता है। सबसे ज्यादा गलतफहमी तो ये है कि आईयूडी से बांझपन हो जाता है। लोगों के बीच इस गलतफहमी का पहला सबूत उन्नीसवीं सदी में मिला था। दरअसल आईयूडी बनाने से पहले रिसर्चर और भी कई तरह की तरकीबों पर काम कर रहे थे। तजुर्बे के तहत ही महिलाओं की कोख में कई तरह की डिवाइस लगाई गई थीं। इन्हें स्टेम पेसरीज कहा जाता था। ये रबर, कांच या धातु से बने होते थे। लेकिन आईयूडी का सबसे कामयाब वर्जन 1920 में जर्मनी के डॉक्टर अर्न्स्ट ग्रेफेनबर्ग ने बनाया था। जी-स्पॉट का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा है।
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ग्रेफेनबर्ग का डिजाइन किया हुआ आईयूडी एक सादे छल्ले जैसा था जिसे गर्भाशय में लगा दिया जाता था। डॉक्टर ग्रेफेनबर्ग अपने प्रोजेक्ट पर अभी काम कर ही रहे थे कि जर्मनी के नाजियों ने इन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया। लेकिन बाद में इन्हें डॉक्टर मार्गरेट सेंगर ने किसी तरह आजाद कराया और उन्हें लेकर अमरीका आ गईं। यहां आकर उन्होंने फिर से अपने प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। चीन की वन-चाइल्ड पॉलिसी कामयाब बनाने में आईयूडी का अहम रोल है। अब तो चीन ने भी अपने यहां कई तरह के डिवाइस बना लिए हैं, लेकिन उन्हें शरीर से वापस निकालने के लिए ऑपरेशन कराना पड़ता है। 1960 में अमरीका में डलकोन शील्ड नाम की आईयूडी बाजार में उतारी गई। ये डॉक्टर ग्रेफेनबर्ग की बनाई आईयूडी की तरह ही थी, लेकिन ये साइज में बड़ी थी और इसमें घोड़े की नाल की तरह तार निकला होता था।