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धर्म में क्या हैं समलैंगिक संबंध- अप्राकृतिक व्यभिचार या पाप?, नहीं जानते होंगे आप

Fri, 07 Sep 2018 04:44 PM IST
पुष्पेश पंत, बीबीसी हिंदी
पुष्पेश पंत, बीबीसी हिंदी Updated Fri, 07 Sep 2018 04:44 PM IST
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Know What religion syas about homosexual relationship
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जब से भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दंड संहिता की धारा 377 पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई शुरू की, तब से ही भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में समलैंगिकता के बारे में बहस गरम होने लगी थी। बहरहाल, गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि समलैंगिक समुदाय को भी समान अधिकार हैं। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने आईपीसी की धारा 377 को मनमाना और अतार्किक बताते हुए असंवैधानिक करार दिया।


ये तो रही अदालती फैसले की बात, लेकिन धर्मों में समलैंगिक संबंधों को किस रूप में देखा गया है। सवाल ये है कि क्या धर्म में समलैंगिक संबंध अप्राकृतिक व्याभिचार या पाप है? समलैंगिकता वाली बहस हमेशा ही पाखंड और दोहरे मानदंडों की वजह से पटरी से उतरती रही है। इस बार भी यह खतरा नजर आ रहा है। सबसे बड़ा कुतर्क यह है कि सभी धर्म समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक व्यभिचार या पाप समझते हैं। ईसाई मिशनरियों और कट्टरपंथी मुसलमान मौलवियों के इस देश में पैर रखने से पहले तक हिंदू अपने यौनाचार और काम भावना की अभिव्यक्ति के बारे में कुंठित नहीं थे।
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महादेव शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर वाला है जिसे आज की शब्दावली में एंड्रोजीनस सैक्सुअलिटी की सहज स्वीकृति ही कहा जा सकता है। मिथकीय आख्यान में विष्णु का मोहिनी रूप धारण कर शिव को रिझाना किसी भी भक्त को अप्राकृतिक अनाचार नहीं लगता था। महाभारत में अर्जुन की मर्दानगी बृहन्नला बनने से कलंकित नहीं होती, शिखंडी का लिंग परिवर्तन संभवत: सेक्स रिअसाइनमेंट का पहला उदाहरण है। गुप्त काल में रचित वात्स्यायन के कामसूत्र में निमोंछिए चिकने नौकरों, मालिश करने वाले नाइयों के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले पुरुषों का बखान विस्तार से किया गया है और इस संभोग सुख के तरीके भी दर्ज हैं।

महाभारत में अर्जुन की मर्दानगी बृहन्नला बनने से कलंकित नहीं होती, शिखंडी का लिंग परिवर्तन संभवत: सेक्स रिअसाइनमेंट का पहला उदाहरण है। गुप्त काल में रचित वात्स्यायन के कामसूत्र में निमोंछिए चिकने नौकरों, मालिश करने वाले नाइयों के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले पुरुषों का बखान विस्तार से किया गया है और इस संभोग सुख के तरीके भी दर्ज हैं।

 
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स्त्रैण गुणों वाला अपराधी नहीं
स्त्रैण गुणों वाले व्यक्तियों को पापी या अपराधी नहीं घोषित किया गया है। स्त्रियों की आपसी रतिक्रीड़ा का भी सहज वर्णन है। खजुराहो के मंदिर हों या ओडिशा के, उनकी दीवारों पर जो मूर्तियां उकेरी गई हैं उनमें भी यही खुली सोच दिखलाई देती है। मध्य काल में सखी भाव वाली परंपरा को समलैंगिकता का उदात्तीकरण (उत्थान की प्रक्रिया) ही माना सकता है। इस सबका सार संक्षेप यह है कि समलैंगिकता सिर्फ अब्राहमी धर्मों में- यहूदी, ईसाई धर्म तथा इस्लाम में ही वर्जित रही है।

पश्चिम में भी इसके पहले यूनान तथा रोम में वयस्कों तथा किशोरों के अंतरंग शारीरिक संबंध समाज में स्वीकृत थे। मजेदार बात यह है कि जिस बुरी व्याभिचारी लत को अंग्रेज 'ग्रीक लव' कहते रहे हैं उसे फ्रांसीसी 'वाइस आंग्लैस' (अंग्रेजी ऐब) कहते हैं। प्रख्यात साहित्यकार ऑस्कर वाइल्ड से लेकर क्रिस्टोफर इशरवुड तक विलायती अभिजात्य वर्ग के लोग बेड ब्रेकफास्ट एंड बॉय की तलाश में मोरक्को से लेकर मलाया तक फिरते रहे हैं। दर्शन को नई दिशा देने वाले मिशेल फूको ने अपनी समलैंगिकता को कभी छुपाया नहीं, दुर्भाग्य यह है कि पाखंड और दोहरे मानदंडों के कारण एलन ट्यूरिंग जैसे प्रतिभाशाली गणितज्ञ, वैज्ञानिक और कोड ब्रेकर को उत्पीड़न के बाद आत्महत्या करनी पड़ी थी।

 
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ब्रिटिश शासन काल का क़ानून
इन सबके मद्देनजर 1960 के दशक में ही वुल्फेंडन कमीशन की रिपोर्ट के बाद ब्रिटेन ने समलैंगिकता वाले विक्टोरियन कानून को रद्द कर दिया था, पर गुलाम भारत ने आजादी के बाद भी गोरे हुक्मरानों की पहनाई बेड़ियों में जकड़े रहने का फैसला किया। जब सुप्रीम कोर्ट यह फैसला सुना चुका है कि निजता और एकांत बुनियादी अधिकार है तब यह समझना असंभव है कि कैसे पुलिस समलैंगिकों के आचरण की निगरानी कर धर-पकड़ कर सकती है?

पश्चिम में जिन्हें थर्ड सेक्स कहा जाता है वैसे कई व्यक्ति भारत में इस कानून की वजह से प्रताड़ित और तिरस्कृत होते रहे हैं और वेश्यावृत्ति को ही अपनी जीविका का आधार बनाने को मजबूर हुए हैं, निश्चय ही 377 के शिकंजे से मुक्ति उन्हें मानवीय गरिमा के साथ जीने का मौका देगा। इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि ईसाई अमेरिका के अनेक राज्यों ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से निकाल दिया गया है और इनके विवाह को कई प्रांतों ने कानूनी मान्यता दी है।
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gay parade
खुद पोप यह कह चुके हैं कि समलैंगिक भी उसी ईश्वर की संतान हैं जिसे हम पूजते हैं इसलिए इनके प्रति भेदभाव नहीं बरता जाना चाहिए। बदकिस्मती यह है कि इन्हीं दिनों चर्च में किशोरों और कच्ची उम्र के लड़कों के यौन उत्पीड़न के मामलों का पर्दाफाश हुआ है जिन्हें छुपाने का प्रयास वैटिकन के अधिकारी करते रहे हैं, ऐसे में समलैंगिकता के बारे में खुलकर बोलने से पोप और कार्डिनल बिशप कतराते हैं।

यह याद रखने की जरूरत है कि वयस्कों के बीच सहमति पर आधारित समलैंगिक आचरण और किशोरों बच्चों के यौन शोषण में बहुत फर्क है। यह कुतर्क 377 को जारी रखने के लिए नहीं दिया जा सकता। 21वीं सदी के पहले चरण में वैज्ञानिक शोध यह बात अकाट्य रूप से प्रमाणित कर चुका है कि समलैंगिकता रोग या मानसिक विकृति नहीं है, यह अप्राकृतिक नहीं कही जा सकती। जिनका रुझान इस ओर होता है उन्हें इच्छानुसार जीवनयापन के बुनियादी अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।


 
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