{"_id":"5bc9b0f8bdec2242912045f7","slug":"know-the-price-of-a-tour-to-the-real-titanic-ship","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"असली टाइटैनिक देखने की कीमत 78 लाख रुपये, ये कंपनी कराएगी आपकी हसरत पूरी","category":{"title":"Weird Stories","title_hn":"अजब गजब","slug":"weird-stories"}}
असली टाइटैनिक देखने की कीमत 78 लाख रुपये, ये कंपनी कराएगी आपकी हसरत पूरी
पीटर रुबिनस्टेन, बीबीसी फ्यूचर
Updated Fri, 19 Oct 2018 04:45 PM IST
विज्ञापन
Titanic
मेक्सिको की रेनाटा रोहास को समंदर बचपन से ही बहुत दिलकश लगता था। बचपन में वो अपने पिता के साथ मेक्सिको में कोजुमेल तट के पास तैराकी किया करती थीं। उस वक्त वो केवल पांच बरस की थीं। तब उन्हें समुद्र तट से ज्यादा दूर जाने की इजाजत नहीं थी। अब वक्त बदल गया है। अब रेनाटा दूर तलक जाकर समंदर में गोते लगा लेती हैं। समंदर की तलहटी उन्हें अपनी ओर खींचती मालूम होती है। वहां का मंजर रेनाटा को सपनों सरीखा लगता है। एक नई दुनिया नजर आती है। जो सुकून देने वाली है। दुनिया के शोर-शराबे से दूर ऐसी जगह, जहां वक्त ठहरा हुआ है।
Titanic
- फोटो : goodhousekeeping.com
जल्द ही टाइटैनिक नहीं रहेगा...
ये ऐसा सपना है जिसे जल्द पूरा न किया गया, तो ये हकीकत नहीं बन पाएगा। असल में समुद्र के पानी के साथ जंग लड़ते हुए टाइटैनिक का मलबा बडी तेजी से गल रहा है। जानकार कहते हैं कि यही रफ्तार रही तो अगले बीस सालों में टाइटैनिक का मलबा गल कर पूरी तरह से समंदर के पानी में विलीन हो जाएगा। रेनाटा उन गिने-चुने किस्मत वाले लोगों में से हैं, जो 2005 के बाद टाइटैनिक का मलबा देखने वाले पहले इंसान होंगे। रेनाटा के साथ कुछ और लोग भी अटलांटिक की गहराई में उतरकर टाइटैनिक का मलबा देखेंगे। ये लोग शायद वो आखिरी इंसान हों, जो ये मंजर देख पाएं।
टाइटैनिक देखने के लिए करना होगा खर्च
ये एक कॉमर्शियल मिशन होगा। रेनाटा और दूसरे लोगों को टाइटैनिक को देखने के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी। मगर इस दौरान वैज्ञानिक तजुर्बों को भी अंजाम दिया जाएगा। जो लोग समुद्र के भीतर टाइटैनिक का मलबा देखने जाएंगे, वो थ्री-डी मॉडल की मदद से टाइटैनिक की तस्वीर और पूरा मंजर तैयार करेंगे। ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षण किया जा सके।
ये ऐसा सपना है जिसे जल्द पूरा न किया गया, तो ये हकीकत नहीं बन पाएगा। असल में समुद्र के पानी के साथ जंग लड़ते हुए टाइटैनिक का मलबा बडी तेजी से गल रहा है। जानकार कहते हैं कि यही रफ्तार रही तो अगले बीस सालों में टाइटैनिक का मलबा गल कर पूरी तरह से समंदर के पानी में विलीन हो जाएगा। रेनाटा उन गिने-चुने किस्मत वाले लोगों में से हैं, जो 2005 के बाद टाइटैनिक का मलबा देखने वाले पहले इंसान होंगे। रेनाटा के साथ कुछ और लोग भी अटलांटिक की गहराई में उतरकर टाइटैनिक का मलबा देखेंगे। ये लोग शायद वो आखिरी इंसान हों, जो ये मंजर देख पाएं।
टाइटैनिक देखने के लिए करना होगा खर्च
ये एक कॉमर्शियल मिशन होगा। रेनाटा और दूसरे लोगों को टाइटैनिक को देखने के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी। मगर इस दौरान वैज्ञानिक तजुर्बों को भी अंजाम दिया जाएगा। जो लोग समुद्र के भीतर टाइटैनिक का मलबा देखने जाएंगे, वो थ्री-डी मॉडल की मदद से टाइटैनिक की तस्वीर और पूरा मंजर तैयार करेंगे। ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षण किया जा सके।
Titanic
- फोटो : goodhousekeeping.com
जब बर्फ के पहाड़ से टकराया टाइटैनिक
आरएमएस टाइटैनिक 14 अप्रैल 1912 को उत्तर अटलांटिक महासागर में एक हिमखंड से टकरा गया था। ये जहाज ब्रिटेन के साउथैम्पटन बंदरगाह से न्यूयॉर्क जा रहा था। हिमखंड से टकराने के बाद टाइटैनिक दो टुकड़ों में टूट गया था। इसका मलबा 3.8 किलोमीटर की गहराई में समा गया था। जहां ये हादसा हुआ, वो कनाडा के न्यूफाउंडलैंड तट से करीब 600 किलोमीटर दूर है। इस हादसे में 1500 लोग मारे गए थे। भयंकर सर्द समंदर में अंधेरे से घिरा टाइटैनिक का मलबा करीब 70 साल तक अनछुआ ही पड़ा रहा था। इस दौरान बैक्टीरिया इसके मेटल के बने ढांचे को कुतरते रहे। नतीजा ये हुआ कि इसके मलबे के ऊपर बर्फ की छोटी-छोटी नरम सी बूंदों जैसी आकृतियां बन गईं।
इकोलॉजिस्ट लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि, 'आज की तारीख में टाइटैनिक के मलबे में उस वक्त से ज्यादा जिंदगी आबाद है, जब वो डूबा था।' असल में बर्फ और जंग के ये छोटे-छोटे बुलबुले बैक्टीरिया की उपज हैं। ये बैक्टीरिया लोहा खाते हैं। इसके एवज में इनसे एसिड निकलता है, जो जंग में तब्दील हो जाता है। जीवों की इस किस्म को समंदर की गहराई में ही देखा जा सकता है। पहली बार टाइटैनिक के मलबे को 1985 में अन्वेषक रॉबर्ट बलार्ड और उनकी टीम ने खोजा था।
उस वक्त तक जंग के ये बुलबुले पूरी तरह से टाइटैनिक के मलबे पर कब्जा जमा चुके थे। जंग पैदा करने वाले ये बैक्टीरिया, रोजाना करीब 180 किलो मलबा चट कर जाते हैं। इसीलिए वैज्ञानिक कह रहे हैं कि टाइटैनिक के मलबे की उम्र अब ज्यादा नहीं बची है। लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि अगले 20 से 50 साल में बैक्टीरिया, टाइटैनिक के मलबे को पूरी तरह से खा जाएंगे।
आरएमएस टाइटैनिक 14 अप्रैल 1912 को उत्तर अटलांटिक महासागर में एक हिमखंड से टकरा गया था। ये जहाज ब्रिटेन के साउथैम्पटन बंदरगाह से न्यूयॉर्क जा रहा था। हिमखंड से टकराने के बाद टाइटैनिक दो टुकड़ों में टूट गया था। इसका मलबा 3.8 किलोमीटर की गहराई में समा गया था। जहां ये हादसा हुआ, वो कनाडा के न्यूफाउंडलैंड तट से करीब 600 किलोमीटर दूर है। इस हादसे में 1500 लोग मारे गए थे। भयंकर सर्द समंदर में अंधेरे से घिरा टाइटैनिक का मलबा करीब 70 साल तक अनछुआ ही पड़ा रहा था। इस दौरान बैक्टीरिया इसके मेटल के बने ढांचे को कुतरते रहे। नतीजा ये हुआ कि इसके मलबे के ऊपर बर्फ की छोटी-छोटी नरम सी बूंदों जैसी आकृतियां बन गईं।
इकोलॉजिस्ट लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि, 'आज की तारीख में टाइटैनिक के मलबे में उस वक्त से ज्यादा जिंदगी आबाद है, जब वो डूबा था।' असल में बर्फ और जंग के ये छोटे-छोटे बुलबुले बैक्टीरिया की उपज हैं। ये बैक्टीरिया लोहा खाते हैं। इसके एवज में इनसे एसिड निकलता है, जो जंग में तब्दील हो जाता है। जीवों की इस किस्म को समंदर की गहराई में ही देखा जा सकता है। पहली बार टाइटैनिक के मलबे को 1985 में अन्वेषक रॉबर्ट बलार्ड और उनकी टीम ने खोजा था।
उस वक्त तक जंग के ये बुलबुले पूरी तरह से टाइटैनिक के मलबे पर कब्जा जमा चुके थे। जंग पैदा करने वाले ये बैक्टीरिया, रोजाना करीब 180 किलो मलबा चट कर जाते हैं। इसीलिए वैज्ञानिक कह रहे हैं कि टाइटैनिक के मलबे की उम्र अब ज्यादा नहीं बची है। लोरी जॉन्सटन कहते हैं कि अगले 20 से 50 साल में बैक्टीरिया, टाइटैनिक के मलबे को पूरी तरह से खा जाएंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Titanic
- फोटो : goodhousekeeping.com
कैसे नजर आएगा टाइटैनिक का मलबा
यानी घड़ी की सुई टिक-टिक कर रही है। टाइटैनिक को वैज्ञानिक तजुर्बे के लिए देखना हो या फिर यूं ही शानदार मंजर देखने का शौक पूरा करना हो, वक्त बहुत कम बचा है। इस मौके का फायदा उठाने के लिए ओशनगेट नाम की कंपनी ने कदम बढ़ाया है। कंपनी ने एलान किया है कि वो छोटी-छोटी पनडुब्बियों में बैठाकर लोगों को समंदर की तलहटी में ले जाएगी। इस मिशन का मकसद वैज्ञानिक भी होगा और मौज मस्ती भी। लोग ओशनगेट की छोटी पनडुब्बी में सवार होकर टाइटैनिक के मलबे का दीदार कर सकेंगे।
ओशनगेट कंपनी 2009 में बनी थी। अब तक ये समुद्र के भीतर के 13 मिशन को अंजाम दे चुकी है। अब 2019 में ओशनगेट ने कुछ लोगों को टाइटैनिक के मलबे के करीब ले जाने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए दुनिया भर से आवेदन मंगाए गए हैं। चुने गए लोगों को 11 दिन के इस खतरनाक मगर बेहद रोमांचक मिशन पर ले जाया जाएगा। एक बार में 9 लोग ओशनगेट की पनडुब्बी में सवार होकर समुद्र के भीतर जा सकेंगे।
इन लोगों को न्यूफाउंडलैंड के सेंट जॉन्स तट से हेलीकॉप्टर से समंदर में एक जहाज पर ले जाया जाएगा। फिर पनडुब्बी में बैठाकर समुद्र की गहराई में उतारा जाएगा। पनडुब्बी में बैठे हुए ही ये लोग सोनार और लेजर की मदद से टाइटैनिक के मलबे का सही थ्री-डी मॉडल बना सकेंगे। 11 दिन के मिशन का टिकट है 1 लाख पांच हजार 129 डॉलर यानी करीब 78 लाख रुपए। ये रकम उतनी ही है, जितने का टिकट टाइटैनिक पर सवार लोगों ने न्यूयॉर्क पहुंचने के लिए खरीदा था।
यानी घड़ी की सुई टिक-टिक कर रही है। टाइटैनिक को वैज्ञानिक तजुर्बे के लिए देखना हो या फिर यूं ही शानदार मंजर देखने का शौक पूरा करना हो, वक्त बहुत कम बचा है। इस मौके का फायदा उठाने के लिए ओशनगेट नाम की कंपनी ने कदम बढ़ाया है। कंपनी ने एलान किया है कि वो छोटी-छोटी पनडुब्बियों में बैठाकर लोगों को समंदर की तलहटी में ले जाएगी। इस मिशन का मकसद वैज्ञानिक भी होगा और मौज मस्ती भी। लोग ओशनगेट की छोटी पनडुब्बी में सवार होकर टाइटैनिक के मलबे का दीदार कर सकेंगे।
ओशनगेट कंपनी 2009 में बनी थी। अब तक ये समुद्र के भीतर के 13 मिशन को अंजाम दे चुकी है। अब 2019 में ओशनगेट ने कुछ लोगों को टाइटैनिक के मलबे के करीब ले जाने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए दुनिया भर से आवेदन मंगाए गए हैं। चुने गए लोगों को 11 दिन के इस खतरनाक मगर बेहद रोमांचक मिशन पर ले जाया जाएगा। एक बार में 9 लोग ओशनगेट की पनडुब्बी में सवार होकर समुद्र के भीतर जा सकेंगे।
इन लोगों को न्यूफाउंडलैंड के सेंट जॉन्स तट से हेलीकॉप्टर से समंदर में एक जहाज पर ले जाया जाएगा। फिर पनडुब्बी में बैठाकर समुद्र की गहराई में उतारा जाएगा। पनडुब्बी में बैठे हुए ही ये लोग सोनार और लेजर की मदद से टाइटैनिक के मलबे का सही थ्री-डी मॉडल बना सकेंगे। 11 दिन के मिशन का टिकट है 1 लाख पांच हजार 129 डॉलर यानी करीब 78 लाख रुपए। ये रकम उतनी ही है, जितने का टिकट टाइटैनिक पर सवार लोगों ने न्यूयॉर्क पहुंचने के लिए खरीदा था।
विज्ञापन
Titanic
टाइटैनिक तक पहुंचना बेहद मुश्किल
समुद्र की गहराई में तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी गहराई में किसी आम इंसान का जाना और वापस आना अचरज से कम नहीं होगा। लेकिन, ओशनगेट के अध्यक्ष जोएल पेरी कहते हैं कि यात्रियों की सुरक्षा तो कोई मसला ही नहीं है। खतरा उतना है नहीं, जितना लोग दावा करते हैं। फिर, जिन लोगों को चुना जाएगा उन्हें सख्त पैमानों पर कसने के बाद ही समंदर में गोता लगाने का टिकट मिलेगा।
अर्जी लगाने वालों का दिमागी तौर पर दुरुस्त होना उतना ही जरूरी है, जितना सेहतमंद होना। इन लोगों को हेलीकॉप्टर के क्रैश होने पर बचाव की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। जिनको तैराकी का तजुर्बा होगा उन्हें तरजीह दी जाएगी। जैसे रेनाटा रोहास। उन्हें जोएल पेरी माइटी माउस यानी ताकतवर चुहिया कह कर बुलाते हैं। रेनाटा इस मिशन के लिए चुनी गई पहली शख्स हैं।
इसकी बड़ी वजह उनका गोताखोरी का लंबा अनुभव है। रेनाटा बताती हैं कि, 'जब मैंने अपने पिता के बगैर पहली बार गोता लगाया था, तो एक हादसा पेश आया। मैं गहराई में एक छेद में घुस गई। मेरे ऑक्सीजन सिलेंडर का एक वॉल्व खुल गया।' रेनाटा जब 60 मीटर की गहराई में थीं, तब ये दुर्घटना हुई थी। वो अपने निर्देशक के पास गईं और उनसे ऑक्सीजन लेकर अपने टैंक में डाली। ऐसे मामलों में अक्सर लोग बेहोश हो जाते हैं। मगर, रेनाटा ने बड़ी सूझ-बूझ से खुद को सुरक्षित निकाल लिया।
समुद्र की गहराई में तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी गहराई में किसी आम इंसान का जाना और वापस आना अचरज से कम नहीं होगा। लेकिन, ओशनगेट के अध्यक्ष जोएल पेरी कहते हैं कि यात्रियों की सुरक्षा तो कोई मसला ही नहीं है। खतरा उतना है नहीं, जितना लोग दावा करते हैं। फिर, जिन लोगों को चुना जाएगा उन्हें सख्त पैमानों पर कसने के बाद ही समंदर में गोता लगाने का टिकट मिलेगा।
अर्जी लगाने वालों का दिमागी तौर पर दुरुस्त होना उतना ही जरूरी है, जितना सेहतमंद होना। इन लोगों को हेलीकॉप्टर के क्रैश होने पर बचाव की ट्रेनिंग भी दी जाएगी। जिनको तैराकी का तजुर्बा होगा उन्हें तरजीह दी जाएगी। जैसे रेनाटा रोहास। उन्हें जोएल पेरी माइटी माउस यानी ताकतवर चुहिया कह कर बुलाते हैं। रेनाटा इस मिशन के लिए चुनी गई पहली शख्स हैं।
इसकी बड़ी वजह उनका गोताखोरी का लंबा अनुभव है। रेनाटा बताती हैं कि, 'जब मैंने अपने पिता के बगैर पहली बार गोता लगाया था, तो एक हादसा पेश आया। मैं गहराई में एक छेद में घुस गई। मेरे ऑक्सीजन सिलेंडर का एक वॉल्व खुल गया।' रेनाटा जब 60 मीटर की गहराई में थीं, तब ये दुर्घटना हुई थी। वो अपने निर्देशक के पास गईं और उनसे ऑक्सीजन लेकर अपने टैंक में डाली। ऐसे मामलों में अक्सर लोग बेहोश हो जाते हैं। मगर, रेनाटा ने बड़ी सूझ-बूझ से खुद को सुरक्षित निकाल लिया।