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रेप और यौन अपराधों से जुड़ी पांच गलतफहमियां, इन्हें पढ़कर खुल जाएंगी सबकी आंखें
लिंडा गेडेस, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी फ्यूचर के लिए
Updated Thu, 04 Oct 2018 10:09 AM IST
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अखबार उठाएं, टीवी पर खबरें देखें या सोशल मीडिया पर नजर दौड़ाएं, बलात्कार और यौन अपराधों की घटनाएं नियमित रूप से सुर्खियों में रहती हैं। जब से यौन हिंसा की शिकार महिलाएं अपनी शिकायत को बा-आवाजें-बुलंद कहने लगी हैं, तब से यूं लगता है कि ऐसी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। आज समाज में इस पर चर्चा हो रही है। सरकारें, यौन अपराध रोकने के लिए सख़्त कानून बनाने को मजबूर हुई हैं।
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आइए आप को बलात्कार और यौन अपराधों से जुड़ी पांच बड़ी ग़लतफ़हमियों से रूबरू कराते हैं.
1. ज्यादातर यौन अपराध अपरिचित लोग करते हैं-
किसी अंधेरी गली से गुजर रही महिला से यौन हिंसा की खबर अक्सर सुर्खियां बनती है। टीवी पर इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। पर, सच ये है कि बलात्कार और गंभीर यौन हिंसा के ज्यादातर मामले अभी भी घरों के भीतर ही होते हैं। ऐसे जुर्म करने वाले अक्सर पीड़ित की जान-पहचान वाले लोग होते हैं।
इंग्लैंड, वेल्श और ऑस्ट्रेलिया में हर पांचवीं महिला अपनी जिंदगी में कम से कम एक बार यौन हिंसा की शिकार हुई है। अमरीका के नेशनल सेक्सुअल वायोलेंस सर्वे के मुताबिक भी हर पांचवीं अमरीकी महिला बलात्कार की शिकार हुई है, जबकि मर्दों में ये आंकड़ा हर 71 में से एक के पीड़ित होने का है।
ब्रिटेन में एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, यौन हिंसा के केवल 10 प्रतिशत मामलों में ही आरोपी अपरिचित था। सेक्सुअल असॉल्ट के 56 फीसद केस में हमलावर, पीड़ित का साथी था। यौन हिंसा के बाकी यानी 33 प्रतिशत मामलों में आरोपी कोई परिचित या परिवार का ही सदस्य था।
1. ज्यादातर यौन अपराध अपरिचित लोग करते हैं-
किसी अंधेरी गली से गुजर रही महिला से यौन हिंसा की खबर अक्सर सुर्खियां बनती है। टीवी पर इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। पर, सच ये है कि बलात्कार और गंभीर यौन हिंसा के ज्यादातर मामले अभी भी घरों के भीतर ही होते हैं। ऐसे जुर्म करने वाले अक्सर पीड़ित की जान-पहचान वाले लोग होते हैं।
इंग्लैंड, वेल्श और ऑस्ट्रेलिया में हर पांचवीं महिला अपनी जिंदगी में कम से कम एक बार यौन हिंसा की शिकार हुई है। अमरीका के नेशनल सेक्सुअल वायोलेंस सर्वे के मुताबिक भी हर पांचवीं अमरीकी महिला बलात्कार की शिकार हुई है, जबकि मर्दों में ये आंकड़ा हर 71 में से एक के पीड़ित होने का है।
ब्रिटेन में एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, यौन हिंसा के केवल 10 प्रतिशत मामलों में ही आरोपी अपरिचित था। सेक्सुअल असॉल्ट के 56 फीसद केस में हमलावर, पीड़ित का साथी था। यौन हिंसा के बाकी यानी 33 प्रतिशत मामलों में आरोपी कोई परिचित या परिवार का ही सदस्य था।
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2. यौन हिंसा के 'सच्चे' शिकार लोग हमेशा अपने साथ हुई घटना की शिकायत करते हैं-
ब्रिटेन के गृह विभाग के आंकड़े के मुताबिक, बलात्कार के दर्ज हुए कुल मामलों में से केवल 46 प्रतिशत दर्ज ही घटना वाले दिन दर्ज कराए गए, जबकि 14 प्रतिशत केस में पीड़ित ने शिकायत करने में छह महीने का वक्त लिया। अगर यौन हिंसा का शिकार कोई बच्ची होती है, तो शिकायत करने में और भी देर होती है। 16 साल से कम उम्र के यौन हिंसा पीड़ितों में से केवल 28 फीसद ऐसे होते हैं, जो घटना वाले दिन ही इसकी रिपोर्ट दर्ज कराते हैं।
जबकि एक तिहाई पीडित लोग सही वक्त का इंतजार करते हैं, और याद रखें कि ये वो मामले हैं, जो दर्ज किए गए हैं। बलात्कार और यौन अपराधों की बहुत सी घटनाएं तो रिपोर्ट ही नहीं की जाती हैं। अमरीका में हुए तजुर्बे बताते हैं कि यौन अपराध के तीन में से दो मामलों में कभी भी शिकायत नहीं की जाती।
लोगों के बलात्कार या यौन हिंसा के दूसरे मामलों की शिकायत न करने, या देर से करने की कई वजहें होती हैं। बहुत से पीड़ित इसलिए शिकायत नहीं करते कि वो नहीं चाहते कि आरोपी जेल जाए। इसकी वजह शायद ये होती है कि वो उससे प्यार करते हैं, या फिर, आरोपी परिवार का सदस्य या जीवनसाथी होता है।
कई बार पीड़ित महिलाएं आरोपी पर आर्थिक रूप से निर्भर होने की वजह से शिकायत नहीं कर पाती हैं। बहुत सी बलात्कार पीड़िताएं इसलिए शिकायत नहीं करतीं कि वो आरोपी की पूरी जिंदगी को बर्बाद नहीं करना चाहतीं। वैसे, यौन अपराध की शिकायत करने में देरी से केस की सच्चाई का कोई ताल्लुक नहीं है।
ब्रिटेन के गृह विभाग के आंकड़े के मुताबिक, बलात्कार के दर्ज हुए कुल मामलों में से केवल 46 प्रतिशत दर्ज ही घटना वाले दिन दर्ज कराए गए, जबकि 14 प्रतिशत केस में पीड़ित ने शिकायत करने में छह महीने का वक्त लिया। अगर यौन हिंसा का शिकार कोई बच्ची होती है, तो शिकायत करने में और भी देर होती है। 16 साल से कम उम्र के यौन हिंसा पीड़ितों में से केवल 28 फीसद ऐसे होते हैं, जो घटना वाले दिन ही इसकी रिपोर्ट दर्ज कराते हैं।
जबकि एक तिहाई पीडित लोग सही वक्त का इंतजार करते हैं, और याद रखें कि ये वो मामले हैं, जो दर्ज किए गए हैं। बलात्कार और यौन अपराधों की बहुत सी घटनाएं तो रिपोर्ट ही नहीं की जाती हैं। अमरीका में हुए तजुर्बे बताते हैं कि यौन अपराध के तीन में से दो मामलों में कभी भी शिकायत नहीं की जाती।
लोगों के बलात्कार या यौन हिंसा के दूसरे मामलों की शिकायत न करने, या देर से करने की कई वजहें होती हैं। बहुत से पीड़ित इसलिए शिकायत नहीं करते कि वो नहीं चाहते कि आरोपी जेल जाए। इसकी वजह शायद ये होती है कि वो उससे प्यार करते हैं, या फिर, आरोपी परिवार का सदस्य या जीवनसाथी होता है।
कई बार पीड़ित महिलाएं आरोपी पर आर्थिक रूप से निर्भर होने की वजह से शिकायत नहीं कर पाती हैं। बहुत सी बलात्कार पीड़िताएं इसलिए शिकायत नहीं करतीं कि वो आरोपी की पूरी जिंदगी को बर्बाद नहीं करना चाहतीं। वैसे, यौन अपराध की शिकायत करने में देरी से केस की सच्चाई का कोई ताल्लुक नहीं है।
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3. तुरंत शिकायत करने से यौन अपराधों की पड़ताल और केस करना आसान हो जाता है-
ये सच है कि बलात्कार और दूसरी तरह की यौन हिंसा की शिकार महिलाएं अगर जुर्म की फौरन शिकायत करती हैं, तो उनकी फोरेंसिक जांच तुरंत हो जाती है। उनके सैंपल जल्द लिए जाते हैं, जिससे वीर्य, लार या डीएनए जैसे सबूत जल्द जुटा लिए जाते हैं। मेडिकल जांच करने वाले, हिंसा की वजह से लगी चोट का भी पता लगा लेते हैं।
लेकिन, यौन अपराध की शिकार महिलाओं की फौरी मेडिकल जांच का ये मतलब नहीं है कि आरोपी को तुरंत पकड़ लिया जाता है और उसे सजा हो जाती है। इसका ये भी मतलब नहीं होता कि केस की तुरंत तफ्तीश होने लगती है। तमाम पुलिस थानों में दर्ज बलात्कार के हजारों मामले इस बात की मिसाल हैं।
अमरीका के बहुत से थानों में तो 'रेप किट' यूं ही पड़ी हैं। उनका इस्तेमाल ही नहीं हुआ। जब आपके किसी निजी मित्र या साथी ने बलात्कार किया हो, तो ऐसी मेडिकल जांच से आरोप साबित करना और भी मुश्किल हो जाता है। जानकार कहते हैं कि आज बलात्कार के ज्यादातर मामलों में सवाल ये नहीं होता कि सेक्स किया गया या नहीं, बल्कि सवाल ये होता है कि सेक्स सहमति से किया गया या जबरदस्ती। ब्रिटेन के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार की जिन घटनाओं को उसी दिन रिपोर्ट किया गया, उनमें से 26 प्रतिशत केस में आरोप तय हो गए।
लेकिन शिकायत में एक भी दिन की देरी से आरोप तय होने का आंकड़ा घटकर 14 प्रतिशत ही रह गया, जिन लोगों ने अपराध वाले दिन ही शिकायत कर दी, उनके मामले जल्दी कोर्ट पहुंचते देखे जाते हैं। हालांकि अगर पीड़ित 16 बरस से कम उम्र की है, तो इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि शिकायत कब की गई। अमरीका की एक रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार के कुल दर्ज मामलों में से केवल 18 प्रतिशत में ही गिरफ्तारी हुई और सजा तो केवल 2 फीसद मामलों में ही हुई।
ये सच है कि बलात्कार और दूसरी तरह की यौन हिंसा की शिकार महिलाएं अगर जुर्म की फौरन शिकायत करती हैं, तो उनकी फोरेंसिक जांच तुरंत हो जाती है। उनके सैंपल जल्द लिए जाते हैं, जिससे वीर्य, लार या डीएनए जैसे सबूत जल्द जुटा लिए जाते हैं। मेडिकल जांच करने वाले, हिंसा की वजह से लगी चोट का भी पता लगा लेते हैं।
लेकिन, यौन अपराध की शिकार महिलाओं की फौरी मेडिकल जांच का ये मतलब नहीं है कि आरोपी को तुरंत पकड़ लिया जाता है और उसे सजा हो जाती है। इसका ये भी मतलब नहीं होता कि केस की तुरंत तफ्तीश होने लगती है। तमाम पुलिस थानों में दर्ज बलात्कार के हजारों मामले इस बात की मिसाल हैं।
अमरीका के बहुत से थानों में तो 'रेप किट' यूं ही पड़ी हैं। उनका इस्तेमाल ही नहीं हुआ। जब आपके किसी निजी मित्र या साथी ने बलात्कार किया हो, तो ऐसी मेडिकल जांच से आरोप साबित करना और भी मुश्किल हो जाता है। जानकार कहते हैं कि आज बलात्कार के ज्यादातर मामलों में सवाल ये नहीं होता कि सेक्स किया गया या नहीं, बल्कि सवाल ये होता है कि सेक्स सहमति से किया गया या जबरदस्ती। ब्रिटेन के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार की जिन घटनाओं को उसी दिन रिपोर्ट किया गया, उनमें से 26 प्रतिशत केस में आरोप तय हो गए।
लेकिन शिकायत में एक भी दिन की देरी से आरोप तय होने का आंकड़ा घटकर 14 प्रतिशत ही रह गया, जिन लोगों ने अपराध वाले दिन ही शिकायत कर दी, उनके मामले जल्दी कोर्ट पहुंचते देखे जाते हैं। हालांकि अगर पीड़ित 16 बरस से कम उम्र की है, तो इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि शिकायत कब की गई। अमरीका की एक रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार के कुल दर्ज मामलों में से केवल 18 प्रतिशत में ही गिरफ्तारी हुई और सजा तो केवल 2 फीसद मामलों में ही हुई।
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4. अगर पीड़ित 'वाकई' संबंध नहीं बनाना चाहते थे, तो उन्होंने डट कर मुकाबला किया होता-
बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओ के दौरान हर पीड़ित का बर्ताव अलग होता है। न्यूजीलैंड की वेलिंगटन यूनिवर्सिटी की जेन जॉर्डन ने इस बारे में किताब लिखी है-सीरियल सर्वाइवर्स (Serial Survivors 2008)। उन्होंने 15 यौन हिंसा पीड़ित महिलाओं की मिसाल दे कर बताया है कि हर केस में महिला की यौन अपराध के प्रति प्रतिक्रिया अलग थी, जबकि आरोपी एक ही शख्स था।
किसी ने उससे बात कर के बचने की कोशिश की। कुछ ने उसका मुकाबला किया। वहीं कुछ महिलाओ ने खुद को दिमागी तौर पर हालात से दूर कर लिया। यानी जबरदस्ती बनाए गए यौन संबंध से वो जहनी तौर पर अलग रहीं। अमरीका में बलात्कार के 274 मामलों की रिपोर्ट देखने से पता चला कि केवल 22 फीसद मामलों में महिलाओं ने शोर मचाकर या लड़कर बलात्कार से बचने की कोशिश की।
56 प्रतिशत पीड़ितों ने आरोपी से गुहार लगाकर या विनती कर के बचने की कोशिश की। वहीं, कई तो डर के मारे जम सी गईं। अलग-अलग हालात में अलग-अलग नुस्खे काम आते हैं, जिन महिलाओं ने लड़कर मुकाबला किया, उनमें से ज्यादातर बच जाने में कामयाबी हासिल की। लेकिन, ऐसे हालात में उनके किसी हथियार से चोटिल होने का खतरा बढ़ गया। वहीं, रहम की भीख मांगने, रोने या बात चीत कर के समझाने के मामलों में पीड़िता के चोटिल होने का डर और भी बढ़ गया।
आरोपी अगर बाहर से आया हमलावर होता है, तो महिलाओं के साथ जुल्म होने का डर और भी बढ़ जाता है। यहां ये समझने की भी जरूरत है कि ऐसे हालात में लोग अपने बर्ताव को कंट्रोल नहीं कर सकते। कई लोग तो ऐसे मौके पर सुन्न हो जाते हैं।स्वीडन में 298 महिलाओं पर हुए तजुर्बे से पता चला कि 70 प्रतिशत महिलाएं यौन हिंसा के वक़्त सुन्न हो गई थीं। वहीं 48 फीसद तो होश ही गंवा बैठी थीं। ऐसी महिलाएं अपने साथ हुए हादसे के बाद तनाव की शिकार हो गईं। डिप्रेशन में चली गईं।
बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओ के दौरान हर पीड़ित का बर्ताव अलग होता है। न्यूजीलैंड की वेलिंगटन यूनिवर्सिटी की जेन जॉर्डन ने इस बारे में किताब लिखी है-सीरियल सर्वाइवर्स (Serial Survivors 2008)। उन्होंने 15 यौन हिंसा पीड़ित महिलाओं की मिसाल दे कर बताया है कि हर केस में महिला की यौन अपराध के प्रति प्रतिक्रिया अलग थी, जबकि आरोपी एक ही शख्स था।
किसी ने उससे बात कर के बचने की कोशिश की। कुछ ने उसका मुकाबला किया। वहीं कुछ महिलाओ ने खुद को दिमागी तौर पर हालात से दूर कर लिया। यानी जबरदस्ती बनाए गए यौन संबंध से वो जहनी तौर पर अलग रहीं। अमरीका में बलात्कार के 274 मामलों की रिपोर्ट देखने से पता चला कि केवल 22 फीसद मामलों में महिलाओं ने शोर मचाकर या लड़कर बलात्कार से बचने की कोशिश की।
56 प्रतिशत पीड़ितों ने आरोपी से गुहार लगाकर या विनती कर के बचने की कोशिश की। वहीं, कई तो डर के मारे जम सी गईं। अलग-अलग हालात में अलग-अलग नुस्खे काम आते हैं, जिन महिलाओं ने लड़कर मुकाबला किया, उनमें से ज्यादातर बच जाने में कामयाबी हासिल की। लेकिन, ऐसे हालात में उनके किसी हथियार से चोटिल होने का खतरा बढ़ गया। वहीं, रहम की भीख मांगने, रोने या बात चीत कर के समझाने के मामलों में पीड़िता के चोटिल होने का डर और भी बढ़ गया।
आरोपी अगर बाहर से आया हमलावर होता है, तो महिलाओं के साथ जुल्म होने का डर और भी बढ़ जाता है। यहां ये समझने की भी जरूरत है कि ऐसे हालात में लोग अपने बर्ताव को कंट्रोल नहीं कर सकते। कई लोग तो ऐसे मौके पर सुन्न हो जाते हैं।स्वीडन में 298 महिलाओं पर हुए तजुर्बे से पता चला कि 70 प्रतिशत महिलाएं यौन हिंसा के वक़्त सुन्न हो गई थीं। वहीं 48 फीसद तो होश ही गंवा बैठी थीं। ऐसी महिलाएं अपने साथ हुए हादसे के बाद तनाव की शिकार हो गईं। डिप्रेशन में चली गईं।