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भारत नहीं, पर विदेशों में मरीजों को भी मिले हैं स्पेशल अधिकार, आप जानेंगे तो चौंक जाएंगे
किरण मिश्रा
Updated Sat, 31 Mar 2018 09:29 AM IST
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doctor and Patient
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हमारे देश में ‘पेशेंट राइट’ नाम का कोई अलग से कानून नहीं है, जबकि बाहर के देशों में पेशेंट (मरीज) को लेकर कई कानून बने हैं। फिर भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की मदद से हम अपने अधिकारों की सुरक्षा कर सकते हैं।
Patient rights
सूचना का अधिकार
किसी भी मरीज के परिजन के लिए यह सबसे बड़ा हथियार है। इस सबसे पहले हमें डॉक्टर और अस्पताल से यह जानने का अधिकार होता है कि मरीज पर किस तरह का उपचार चल रहा है। अस्पताल की जांच में क्या निकल कर सामने आया है? हर टेस्ट की क्या कीमत है? दवाइयों का का कोई सस्ता विकल्प है, तो वह क्या है?
ये सारी जानकारी आप अस्पताल से मांग सकते हैं। या यूं कहें कि अपनी बीमारी, चिकित्सा और दवाइयों के बारे में जानकारी प्राप्त करना हर मरीज का अधिकार है। वह डॉक्टर से सारी जानकारी अपनी भाषा में प्राप्त कर सकता है। यदि किसी कारणवश मरीज को ये जानकारी नहीं दी जा सकती है, तो मरीज के किसी करीबी रिश्तेदार को सब जानकारी दी जाने चाहिए।
यही नहीं, मरीज की चिकित्सा में लगे सभी लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करना भी आपका हक है। मरीज को यह अधिकार है कि वह अपनी चिकित्सा में लगे सभी लोगों, जैसे डॉक्टर, नर्स, फिजियोथेरेपिस्ट, सर्जन के बारे में जानकारी प्राप्त करें। ये जानकारी आप अस्पताल प्रशासन से मांग सकती हैं।
किसी भी मरीज के परिजन के लिए यह सबसे बड़ा हथियार है। इस सबसे पहले हमें डॉक्टर और अस्पताल से यह जानने का अधिकार होता है कि मरीज पर किस तरह का उपचार चल रहा है। अस्पताल की जांच में क्या निकल कर सामने आया है? हर टेस्ट की क्या कीमत है? दवाइयों का का कोई सस्ता विकल्प है, तो वह क्या है?
ये सारी जानकारी आप अस्पताल से मांग सकते हैं। या यूं कहें कि अपनी बीमारी, चिकित्सा और दवाइयों के बारे में जानकारी प्राप्त करना हर मरीज का अधिकार है। वह डॉक्टर से सारी जानकारी अपनी भाषा में प्राप्त कर सकता है। यदि किसी कारणवश मरीज को ये जानकारी नहीं दी जा सकती है, तो मरीज के किसी करीबी रिश्तेदार को सब जानकारी दी जाने चाहिए।
यही नहीं, मरीज की चिकित्सा में लगे सभी लोगों के बारे में जानकारी प्राप्त करना भी आपका हक है। मरीज को यह अधिकार है कि वह अपनी चिकित्सा में लगे सभी लोगों, जैसे डॉक्टर, नर्स, फिजियोथेरेपिस्ट, सर्जन के बारे में जानकारी प्राप्त करें। ये जानकारी आप अस्पताल प्रशासन से मांग सकती हैं।
Patient rights
प्रिस्क्रिप्शन पर दवाइयों का नाम साफ-साफ लिखा जाना चाहिए, इसके लिए आप डॉक्टर को बोल सकती हैं, ताकि आपको दवा लेते समय असुविधा न हो। इसके अलावा आप डॉक्टर से सस्ती दवाइयां लिखने के लिए भी कह सकती हैं, अगर उसका विकल्प है तो, विशेषकर जेनेरिक दवाइयां।
मरीज को अधिकार है कि वह अस्पताल से अपने मेडिकल रिकॉर्ड की कॉपी प्राप्त करे। अस्पताल को मरीज के रिकॉर्ड की गोपनीयता को ध्यान में रखकर मरीज को कॉपी देनी होगी। अमूमन अस्पताल खुद ये सारी फाइलें नहीं देते हैं, इसलिए बहुत जरूरी है कि मरीज अस्पताल से छुट्टी के समय ऐसा जरूर करे।
राइट टू सेफ्टी के तहत मरीज का अधिकार है कि वह अपने बीमारी के बारे में सेकंड ओपिनियन या दूसरे डॉक्टर की सलाह ले सकता है। इस सलाह के लिए कोई भी डॉक्टर किसी भी मरीज या परिजन को हतोत्साहित नहीं कर सकता है।
मरीज को अधिकार है कि वह अस्पताल से अपने मेडिकल रिकॉर्ड की कॉपी प्राप्त करे। अस्पताल को मरीज के रिकॉर्ड की गोपनीयता को ध्यान में रखकर मरीज को कॉपी देनी होगी। अमूमन अस्पताल खुद ये सारी फाइलें नहीं देते हैं, इसलिए बहुत जरूरी है कि मरीज अस्पताल से छुट्टी के समय ऐसा जरूर करे।
राइट टू सेफ्टी के तहत मरीज का अधिकार है कि वह अपने बीमारी के बारे में सेकंड ओपिनियन या दूसरे डॉक्टर की सलाह ले सकता है। इस सलाह के लिए कोई भी डॉक्टर किसी भी मरीज या परिजन को हतोत्साहित नहीं कर सकता है।
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doctor
दोनों डॉक्टरों के सुझाव अगर अलग-अलग पाए जाते हैं, तो यह मरीज और उनके परिजन पर निर्भर करता है कि वह किन के बताए रास्ते पर चलते हैं। इस सूरत में किसी भी डॉक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
राइट टू प्राइवेसी के तहत मरीज के पास उसकी बीमारी को गोपनीय रखने का अधिकार भी है। इसका मतलब यह कि अगर आप नहीं चाहतीं कि आपके परिवार के दूसरे सदस्य को आपकी बीमारी के बारे में पता चले, तो डॉक्टर किसी भी सूरत में आपके परिवार को आपकी बीमारी के बारे में नहीं बताएंगे। इलाज से संबंधित कोई धोखाधड़ी हुई है, तो हॉस्पिटल के दोषी पाए जाने पर जुर्माने का प्रावधान भी है।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी डॉक्टर्स के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें अगर आपको इमरजेंसी में इलाज की जरूरत है, तो कोई डॉक्टर इसके लिए आपको मना नहीं कर सकता, जब तक फर्स्ट एेड देकर मरीज की स्थिति खतरे से बाहर न कर लें।
राइट टू प्राइवेसी के तहत मरीज के पास उसकी बीमारी को गोपनीय रखने का अधिकार भी है। इसका मतलब यह कि अगर आप नहीं चाहतीं कि आपके परिवार के दूसरे सदस्य को आपकी बीमारी के बारे में पता चले, तो डॉक्टर किसी भी सूरत में आपके परिवार को आपकी बीमारी के बारे में नहीं बताएंगे। इलाज से संबंधित कोई धोखाधड़ी हुई है, तो हॉस्पिटल के दोषी पाए जाने पर जुर्माने का प्रावधान भी है।
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी डॉक्टर्स के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें अगर आपको इमरजेंसी में इलाज की जरूरत है, तो कोई डॉक्टर इसके लिए आपको मना नहीं कर सकता, जब तक फर्स्ट एेड देकर मरीज की स्थिति खतरे से बाहर न कर लें।