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आपकी 10 पीढ़ियों का ब्योरा मिल जाएगा इनके पास, सच होती है इनकी हर बात

Fri, 12 Jan 2018 11:12 AM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 12 Jan 2018 11:12 AM IST
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अगर कोई व्यक्ति आपको अापकी 10 पीढ़ियों के बारे में बता दें तो जरूर आपको हैरानी होगी। क्योंकि खुद आपको भी अपनी 10 पीढ़ियों के बारे में नहीं पता होगा। आज के समय में ये सब जान पाना आसान काम नहीं है।


लेकिन इनके लिए ये रोज का कार्य है। इनके पास कोई न कोई रोजाना आता है और अपनी पीढ़ियों के बारे में जानकारी लेता है। जी हां ये हकीकत है। दरअसल, ये लोगों के यहां आने की तारीख, धार्मिक अनुष्ठान के ब्योरे क्रमबद्ध इनके बही खाते रखते हैं।

अगर आपके पूर्वज बीते जमाने में इनके पास गए होंगे तो उनके नाम इनकी बही में दर्ज मिल जाएंगे। सुनने में भले अजीब लगे लेकिन सत्य है कि गांव या अपना नाम बताते ही संगम तट पर पूजा कराने वाले पंडे जादूगर की तरह यजमान के पीढिय़ों की जानकारी देने लगते हैं।

करीब एक महीने तक चलने वाले माघ मेले में आजकल लाखों श्रद्धालु संगम तट पर हैं। श्रद्धालु पंडों से पूजा पाठ कराते हैं। दिलचस्प बात है कि यहां के पंडे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद समेत कई नामी गिरामी हस्तियों की पूजा-अर्चना कराने का दावा भी करते हैं।
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केवल इतना ही यही नहीं, इन लोगों के यहां आने की तारीख, धार्मिक अनुष्ठान के ब्योरे क्रमबद्ध पंडों के बही खाते में उपलब्ध हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इन पंडों के पास उनके यजमानों के सात पुश्तों के दुर्लभ संकलन के बही-खातों के अतिरिक्त सैकडों साल पुराने ऐतिहासिक और पौराणिक वंशावली भी उपलब्ध है। 

सिर्फ इतना ही नहीं इन पंडों ने यह भी दावा किया कि उनके पास सिसोदिया वंश (महाराणा प्रताप) और डूंगरपुर राज घराने की वंशावली भी है। राजा-महाराजाओं और मुस्लिम शासकों तक की वंशावली होना अपने आप में चौंकाने वाली बात है। 

ये पंडे अपने बही-खाते से किसी आम और खास शख्स के बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं। पंडों की यजमानी दान और स्नान के आधार पर चलती है।

पंडों का अपने यजमानों से भावनात्मक संबंध होता है। इसलिए यजमानों के पास खानदान की वंशावली भले न हो लेकिन उनके परिवारों के पुरोहितों के पास उनके सात पुश्तों की वंशावली उपलब्ध है।
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आपको यकीन नहीं होगा इन पंडों के पास देश भर के अनगिनत लोगों की वंशावलियों के ब्योरे बही में पूरी तरह सुरक्षित हैं। पंडों की बिरादरी के बीच जिले ही नहीं बल्कि देश के प्रांत भी एकदम व्यवस्थित ढंग से बंटे हुए हैं।

अगर किसी जिले का कुछ हिस्सा अलग कर नया जिला बना दिया गया है तो वंशावली मूल जिला वाले पुरोहित के नियंत्रण में ही रहते हैं।

ऐसे में पुरोहित परिवार की संख्या अधिक होने पर भी अपने पूर्वजों से मिले प्रतीक चिन्ह को एक ही बनाए रखते हैं। ताकी आराम से लोग अपने पुरोहित की परचान कर सके। कन्फ्यूजन से बचने के लिए हर पुरोहित का एक निश्चित झंडा या निशान होता है।
 
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आपको वंशावली वाले पुरोहितों के पास कोई झंडा, शंख, डंडा, घंटी, काली मछली,गाय बछडा, हाथी सोने का नारियल आदि निशान जरूर देखने को मिल जाएंगे। पंडों का यह प्रतीक चिन्ह उनके कुल के बारे में बताता है।

जब तीर्थ यात्रा पर आपके पूर्वज इनके पास आए होंगे तो किसी प्रतीक चिन्ह वाले पंडे के जिम्मे उनका धार्मिक अनुष्ठान कराने का काम होगा। ये आपको आपके परिवार का कोई बड़ा व्यक्ति या कुल का व्यक्ति बता सकता है। पुरोहित की पहचान हो तो कोई भी अपने पूर्वजों के बारे में सब कुछ जान सकता है।

दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं को अपने वंश पुरोहित की पहचान कराने वाली इन पताकाओं के निशान भी अपनी पृष्ठभूमि में इतिहास समेटे हुए हैं। इसकी जानकारी भी आपको पुरोहित से मिल जाएगी।
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बता दें तीर्थपुरोहितों की बही लाल रंग की होती है। इसके लाल रंग होने के बारे में कहा जाता है कि लाल रंग पर कीटाणुओं का असर नहीं होता है। इन बहियों को लोहे के बक्से में बड़ा संभालकर रखा जाता है।

सामान्यत: तीर्थ पुरोहित अपने संपर्क में आने वाले किसी भी यजमान का नाम-पता आदि पहले एक रजिस्टर या कापी में दर्ज करते हैं। बाद में इसे मूल बही में उतारते हैं। यजमान से भी उसका हस्ताक्षर उसके द्वारा दिए गए विवरण के साथ ही कराया जाता है। 

पुरोहितों के खाता-बही में यजमानों का वंशवार विवरण वर्णमाला के व्यवस्थित क्रम में आज भी संजो कर रखा हुआ है। पहले के समय में बही लिखना मुश्किल होता था क्योंकि लिखावट मिटने का डर रहता था।  

सबसे पहले बही लिखने का जिक्र मोर पंख से आता है जो आगे चलकर नरकट से लिखी जाने लगी और फिर जी-निब वाले होल्डर और अब अच्छी स्याही वाले पेन से लिखी जाती हैं। बही में सामान्यतया काली स्याही उपयोग में लाई जाती है, क्योंकि यह साफ-साफ दिखाई पड़ती है और टिकाऊ मानी जाती है।
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