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वैज्ञानिकों ने खोज निकाला कैंसर का तोड़, बिना कीमोथेरिपी कराए मरीज को मिलेगा जीवनदान

Thu, 29 Mar 2018 09:11 AM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 29 Mar 2018 09:11 AM IST
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Scientists found a completely new way to Chemotherapy option
Cancer patient
वैज्ञानिकों को एक बड़ी उपलब्धि हाथ लगी है। उन्होंने कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी और उन दवाओं का विकल्प खोज लिया है, जो कैंसर के इलाज के दौरान कैंसर सेल्स के साथ सामान्य सेल्स को भी नुकसान पहुंचाती हैं। वैज्ञानिकों ने चूहों पर सफल प्रयोग किया है। हालांकि इसे मानव शरीर पर लागू करने में अभी काफी वक्त है लेकिन पहले ही पायदान पर प्रयोग को सफलता मिलने से वैज्ञानिक उत्साहित हैं। 
Scientists found a completely new way to Chemotherapy option
hospital
यह सफल प्रयोग 11 वैज्ञानिकों की टीम ने क्लेवलैंड क्लीनिक, अमेरिका में किया, जो विश्व में दूसरे स्थान पर है। वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व क्लेवलैंड क्लीनिक में कैंसर बायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. यांग ली ने किया, बीते साल वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय आए थे और यहां सात साल से 14 जुलाई तक कैंसर जागरूकता कार्यक्रम के तहत उनके कई लेक्चर भी आयोजित किए गए थे।
Scientists found a completely new way to Chemotherapy option
patient
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जैव रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. मुनीश भी इस टीम का हिस्सा रहे। इस रिसर्च को औंको जीन नामक प्रतिष्ठित जरनल में पब्लिशर नेचर स्प्रिंग की ओर से प्रकाशित किया गया है। डॉ. मुनीश ने बताया कि कैंसर की बीमारी से शरीर में ट्यूमर बन जाते हैं। 
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Scientists found a completely new way to Chemotherapy option
Chemotherapy
कीमोथेरेपी और दवाओं के जरिये इन ट्यूमर्स को खत्म किया जाता है। इलाज की इस प्रक्रिया में कैंसर सेल्स के साथ सामान्य सेल्स को भी नुकसान होता है। शरीर पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मरीज को भी काफी पीड़ा होती है। वैज्ञानिकों की टीम ने रिसर्च में पाया कि माइक्रो आरएनए यानी एमआईआर-21 नार्मल सेल्स को खत्म करता है। इससे कैंसर सेल्स और प्रभावशाली हो जाती हैं।

 
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hospital
टीम ने चूहों पर प्रयोग करते हुए एमआईआर-21 को प्रभावहीन बनाने के लिए उसका एंटी सेंस चूहे में इंजेक्ट कर दिया और पाया कि चूहे के शरीर में बना ट्यूमर धीमे-धीमे छोटा हो गया और कुछ ट्यूमर पूरी तरह से खत्म हो गए। यह प्रयोग साल भर तक अमेरिका के क्लेवलैंड क्नीनिक में चला। हालांकि अभी मानव शरीर पर इसका प्रयोग नहीं हुआ है। इसे व्यवहारिक रूप से लागू करने में तकरीबन दस वर्ष का समय लग सकता है।
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