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भारत का वो नमक का रेगिस्तान, जो कर देगा आपको हैरान

Wed, 29 Jan 2020 03:16 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नवनीत राठौर Updated Wed, 29 Jan 2020 03:16 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
गुजरात में अरब सागर से 100 किलोमीटर दूर बंजर रेगिस्तान में बर्फ की तरह सफेद नमक का विस्तृत मैदान है, जो उत्तर में पाकिस्तान के साथ लगती सरहद तक फैला हुआ है। इसे कच्छ के रण के नाम से जाना जाता है। कछुए के आकार का यह इलाका दो हिस्सों में बंटा है- महान या बड़ा रण 18,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। दूसरा हिस्सा छोटा रण कहलाता है जो 5,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इन दोनों को मिला दें तो नमक और ऊंची घास का विस्तृत मैदान बनता है जो दुनिया के सबसे बड़े नमक के रेगिस्तानों में से एक है। यहीं से भारत को 75 फीसदी नमक मिलता है। हर साल गर्मियों के महीने में मॉनसून की बारिश होने पर रण में बाढ़ आ जाती है। सफेद नमक के सूखे मैदान बिल्कुल गायब हो जाते हैं और उनकी जगह झिलमिलाता समुद्र बन जाता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
नमक का चक्र
कच्छ के दोनों रण भारत की पश्चिमी सीमा पर कच्छ की खाड़ी और दक्षिणी पाकिस्तान में सिंधु नदी के मुहाने के बीच स्थित हैं। बड़ा रण भुज शहर से करीब 100 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। इसे भारत का अंतहीन 'सफे़द रेगिस्तान' कहा जाता है। इसमें वन्य जीवन न के बराबर है। छोटा रण बड़े रण के दक्षिण-पूर्व में है। यह आप्रवासी पक्षियों और वन्य जीवों के लिए अभयारण्य की तरह है। इसके बावजूद दोनों रण में बहुत समानताएं हैं।

जून के आखिर में यहां मॉनसून की मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। अक्टूबर तक यहां बाढ़ के हालात रहते हैं। फिर धीरे-धीरे पानी भाप बनकर उड़ने लगता है और अपने पीछे नमक के क्रिस्टल छोड़ जाता है। पानी घटने पर प्रवासी किसान चौकोर खेत बनाकर नमक की खेती शुरू करते हैं। सर्दियों से लेकर अगले जून तक वे जितना ज्यादा नमक निकाल सकते हैं, उतना नमक निकालते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

प्राचीन उत्पत्ति
कच्छ के रण की भूगर्भीय उत्पत्ति करीब 20 करोड़ साल पहले पूर्व-जुरासिक और जुरासिक काल में शुरू हुई थी। कई सदी पहले तक यहां समुद्री मार्ग था। कच्छ की खाड़ी और सिंधु नदी में ऊपर की ओर जाने वाले जहाज इस रास्ते का प्रयोग करते थे। दुनिया की पहली सबसे बड़ी सभ्यताओं में से एक सिंधु घाटी सभ्यता के लोग ईसा पूर्व 3300 से लेकर ईसा पूर्व 1300 साल तक यहां फले-फूले थे। करीब 200 साल पहले एक के बाद एक आए कई भीषण भूकंपों ने यहां की भौगोलिक आकृति को बदल दिया। भूकंप के झटकों ने यहां की जमीन को ऊपर उठा दिया। यहां समुद्री पानी से भरी खाइयों की श्रृंखला बन गई जो साथ मिलकर 90 किलोमीटर लंबे और 3 मीटर गहरे रिज का निर्माण करती थी। अरब सागर से इसका संपर्क कट गया।

भूकंपों ने यहां के रेगिस्तान में खारे पानी को फंसा दिया जिससे रण की विशिष्ट भू-स्थलाकृति तैयार हुई। गुजरात के क्रांतिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा कच्छ यूनिवर्सिटी के भूगर्भ-वैज्ञानिक डॉ। एमजी ठक्कर कहते हैं, "रेगिस्तान में हमें एक जहाज का मस्तूल मिला था। वह एक भूकंप के दौरान यहां फंस गया था और समुद्र तक नहीं पहुंच पाया था।"

"वह अद्भुत दृश्य था। बंजर रेगिस्तान के बीच में लकड़ी का मस्तूल।"

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

नमक की खेती
पिछले 200 साल में नमक की खेती रण में एक बड़ा उद्योग बन गई है। अक्टूबर के महीने में पड़ोस के सुरेंद्रनगर जिले से या कोहली और अगरिया जनजातीय समुदाय के कई प्रवासी मजदूर इस जलमग्न रेगिस्तान में आते हैं। नमक की खेती अगले जून तक लगातार चलती रहती है। किसान भीषण गर्मी और कठोर परिस्थितियों में काम करते हैं। अक्टूबर-नवंबर में बारिश रुकने के बाद मजदूर नमक निकालने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। वे बोरिंग करके धरती के नीचे से खारे पानी को निकालते हैं।

आयताकार खेतों में उस भूमिगत जल को फैला दिया जाता है। खेतों का बंटवारा नमक की सांद्रता के आधार पर होता है। खेतों में फैले पानी को भाप बनकर उड़ने में दो महीने लग सकते हैं। नमक के किसान उसमें रोजाना 10-12 बार पाल चलाते हैं जिससे शुद्ध साफ नमक बच जाता है। किसान एक सीजन में ऐसे 18 खेतों से नमक निकाल सकते हैं।

नमक के किसान ऋषिभाई कालूभाई कहते हैं, "हमारी पांचवी पीढ़ी नमक की खेती कर रही है। हर साल 9 महीने के लिए हम पूरे परिवार को नमक के खेतों में लाते हैं और बरसात में अपने घर चले जाते हैं।"

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

अनोखे घर
कच्छ के रण में बनने वाले घर वास्तुकला के अनूठे नमूने होते हैं। उनको बुंगा घर के नाम से जाना जाता है। कई सदियों से यहां रहने वाले खानाबदोश समुदाय और जनजातियां मिट्टी से बने सिलेंडरनुमा घरों में रहते आए हैं। इन घरों की छतें शंकु आकार की होती हैं। इन घरों की खास आकृति यहां उठने वाली तूफानी हवाओं, भूकंप और भयंकर गर्मी व सर्दी से बचाती है। गर्मियों में यहां का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और सर्दियों में यहां बर्फ जम सकती है। बाहर से आने वाले लोग इन घरों के बाहर की गई चित्रकारी देखकर मंत्रमुग्ध रहते हैं।

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