कभी-कभी बड़े मसले छोटी बातों से सुलझ जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ है साउथ ईस्ट एशिया में जहां एक पकवान के झगड़े ने दो धुर विरोधी देशों को एक साथ ला खड़ा किया है। ये सब कैसे हुआ ज़रा ये भी समझ लीजिए।
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एक डिश के कारण साथ आए दो दुश्मन देश, सात घंटे में पकती है एक प्लेट
बीबीसी, हिंदी
Updated Tue, 26 Jun 2018 07:45 PM IST
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चिकन रेनडांग
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chicken rendang
डिश पर लड़ाई
मामला तब और गंभीर हो गया जब शो के दूसरे जज जॉन टोरोडे ने ये कहते हुए ट्वीट किया कि रेनडांग शायद इंडोनेशियन डिश है। इस ट्वीट के जवाब में जकार्ता के एक सोशल मीडिया यूज़र ग्रिफ़िन शॉनरी ने लिखा- क्या रेनडांग के नाम पर मलेशिया और इंडोनेशिया को लड़ाने की कोशिश की जा रही है। हम ऐसा नहीं होने देंगे। बल्कि हम एकजुट हो जाएंगे।
मलेशिया और इंडोनेशिया पड़ोसी देश हैं। लेकिन, ऐसा कम ही देखा गया है कि किसी मुद्दे पर इन दोनों में सहमति बनती हो। दोनों देशों के बीच तल्ख़ी और तनाव का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन रेनडांग के मुद्दे पर दोनों देश एक हो गए हैं।
मूल रूप से ये डिश इंडोनेशिया की ही है लेकिन मलेशिया भी इस पर अपना दावा पेश करता है। कहा जाता है कि ये डिश इंडोनेशिया में पश्चिमी सुमात्रा के आदिवासियों मिनांगकाबुआ लोगों की है। वो इसे चिकन से नहीं बल्कि भैंस के गोश्त से बनाते हैं।
भैंस मिनांगकाबुआ जनजाति की संस्कृति का अहम हिस्सा है। इसे तैयार होने में क़रीब सात घंटे लगते हैं। कहा तो ये भी जाता है कि 'रेनडांग' शब्द भी 'मेरेनडांग' शब्द से आया है, जिसका मतलब है धीमी आंच पर पकाना।
मामला तब और गंभीर हो गया जब शो के दूसरे जज जॉन टोरोडे ने ये कहते हुए ट्वीट किया कि रेनडांग शायद इंडोनेशियन डिश है। इस ट्वीट के जवाब में जकार्ता के एक सोशल मीडिया यूज़र ग्रिफ़िन शॉनरी ने लिखा- क्या रेनडांग के नाम पर मलेशिया और इंडोनेशिया को लड़ाने की कोशिश की जा रही है। हम ऐसा नहीं होने देंगे। बल्कि हम एकजुट हो जाएंगे।
मलेशिया और इंडोनेशिया पड़ोसी देश हैं। लेकिन, ऐसा कम ही देखा गया है कि किसी मुद्दे पर इन दोनों में सहमति बनती हो। दोनों देशों के बीच तल्ख़ी और तनाव का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन रेनडांग के मुद्दे पर दोनों देश एक हो गए हैं।
मूल रूप से ये डिश इंडोनेशिया की ही है लेकिन मलेशिया भी इस पर अपना दावा पेश करता है। कहा जाता है कि ये डिश इंडोनेशिया में पश्चिमी सुमात्रा के आदिवासियों मिनांगकाबुआ लोगों की है। वो इसे चिकन से नहीं बल्कि भैंस के गोश्त से बनाते हैं।
भैंस मिनांगकाबुआ जनजाति की संस्कृति का अहम हिस्सा है। इसे तैयार होने में क़रीब सात घंटे लगते हैं। कहा तो ये भी जाता है कि 'रेनडांग' शब्द भी 'मेरेनडांग' शब्द से आया है, जिसका मतलब है धीमी आंच पर पकाना।
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लोगों के पलायन से पहुंची डिश
सुमात्रा यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसेर गुस्ती अनन बताते हैं कि मिनांगकाबुआ लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने की वजह से ही ये डिश इंडोनेशिया के पड़ोसी देशों में पहुंची। रिसर्च साबित करती है कि मिनांगकाबुआ लोग शादी करने के इरादे से भी पलायन करते थे।
पलायन, कारोबार के नए मौक़े और तजुर्बे की ग़र्ज़ से भी होता था। ये लोग सिंगापुर और मलेशिया पैदल या समंदर के रास्ते जाते थे। रेनडांग चूंकि लंबे समय तक रखा जा सकता था लिहाज़ा ये लोग अपने साथ केले के पत्तों में लपेट कर रेनडांग ही सफ़र में खाने के लिए साथ लेकर चलते थे।
प्रोफ़ेसर अनन कहते हैं कि ये पकवान तैयार करने की परंपरा कहां शुरू हुई सही तौर पर बता पाना मुश्किल है। लेकिन, एक बात दावे से कही जा सकती है कि मिनांगकाबुआ लोगों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सियासी जीवन पर भारत का गहरा असर है। प्राचीन काल से ही पूर्वी एशिया और दक्षिणी भारत में सांस्कृतिक लेन-देन होता आया है।
सुमात्रा यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसेर गुस्ती अनन बताते हैं कि मिनांगकाबुआ लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने की वजह से ही ये डिश इंडोनेशिया के पड़ोसी देशों में पहुंची। रिसर्च साबित करती है कि मिनांगकाबुआ लोग शादी करने के इरादे से भी पलायन करते थे।
पलायन, कारोबार के नए मौक़े और तजुर्बे की ग़र्ज़ से भी होता था। ये लोग सिंगापुर और मलेशिया पैदल या समंदर के रास्ते जाते थे। रेनडांग चूंकि लंबे समय तक रखा जा सकता था लिहाज़ा ये लोग अपने साथ केले के पत्तों में लपेट कर रेनडांग ही सफ़र में खाने के लिए साथ लेकर चलते थे।
प्रोफ़ेसर अनन कहते हैं कि ये पकवान तैयार करने की परंपरा कहां शुरू हुई सही तौर पर बता पाना मुश्किल है। लेकिन, एक बात दावे से कही जा सकती है कि मिनांगकाबुआ लोगों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सियासी जीवन पर भारत का गहरा असर है। प्राचीन काल से ही पूर्वी एशिया और दक्षिणी भारत में सांस्कृतिक लेन-देन होता आया है।
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spices
भारतीय खान-पान से प्रभावित पकवान
पंद्रहवीं सदी तक इंडोनेशिया मसालों का गढ़ बन चुका था। मसालों का व्यापार करने यहां बड़े पैमाने पर भारत, चीन, अरब, और यूरोप के लोग आते थे। इन सभी देशों की संस्कृति और खान-पान का यहां असर पड़ा। दूसरी शताब्दी में भारतीय व्यापारी सोना और टिन की तलाश में इंडोनेशियन द्वीपों पर आते थे। इसीलिए माना जाता है कि इंडोनेशिया के पकवान भारतीय खान-पान से प्रभावित हैं।
प्रोफ़ेसर अनन कहते हैं कि रेनडेंग पकाते हुए जब नारियल का दूध और मसाले गाढ़े होने लगते हैं तो उसे 'कालियो' कहते हैं। लेकिन, मिलांगकाबुआ लोग इसे 'करी' कहते हैं। ये शब्द भारत के कढ़ी शब्द से आया है।
मलेशिया में अध-पका रेनडांग खाने का चलन है। यहां इसे शाही खाना भी कहा जाता है। इसे आम से ख़ास बनाने के लिए मसालों में थोड़ा फेरबदल किया जाता है। जैसे इसमें ताड़ की चीनी, और कसे हुए नारियल का दूध और तेल मिलाया जाता है, जो कि आम लोगों की पहुंच से बाहर है। इसे अमीर ही ख़रीद कर खा सकते हैं।
बहुत से जानकार इस डिश का संबंध मिनांगकाबुआ लोगों के सब्र, अक़लमंदी और मज़बूत इरादों वाले जीवन दर्शन से जोड़कर भी देखते हैं।
पंद्रहवीं सदी तक इंडोनेशिया मसालों का गढ़ बन चुका था। मसालों का व्यापार करने यहां बड़े पैमाने पर भारत, चीन, अरब, और यूरोप के लोग आते थे। इन सभी देशों की संस्कृति और खान-पान का यहां असर पड़ा। दूसरी शताब्दी में भारतीय व्यापारी सोना और टिन की तलाश में इंडोनेशियन द्वीपों पर आते थे। इसीलिए माना जाता है कि इंडोनेशिया के पकवान भारतीय खान-पान से प्रभावित हैं।
प्रोफ़ेसर अनन कहते हैं कि रेनडेंग पकाते हुए जब नारियल का दूध और मसाले गाढ़े होने लगते हैं तो उसे 'कालियो' कहते हैं। लेकिन, मिलांगकाबुआ लोग इसे 'करी' कहते हैं। ये शब्द भारत के कढ़ी शब्द से आया है।
मलेशिया में अध-पका रेनडांग खाने का चलन है। यहां इसे शाही खाना भी कहा जाता है। इसे आम से ख़ास बनाने के लिए मसालों में थोड़ा फेरबदल किया जाता है। जैसे इसमें ताड़ की चीनी, और कसे हुए नारियल का दूध और तेल मिलाया जाता है, जो कि आम लोगों की पहुंच से बाहर है। इसे अमीर ही ख़रीद कर खा सकते हैं।
बहुत से जानकार इस डिश का संबंध मिनांगकाबुआ लोगों के सब्र, अक़लमंदी और मज़बूत इरादों वाले जीवन दर्शन से जोड़कर भी देखते हैं।
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ख़ास मौकों की डिश
रेनडांग रोज़मर्रा का खाना नहीं है इसे शादी, त्यौहार या किसी नेता के राज तिलक जैसे मौक़े पर ही बनाया जाता है। ये पकवान लोगों के दिल के बहुत क़रीब है। सिंगापुर में मलेशियन रेस्टोरेंट चलाने वाले दो भाई हज़मी और आरिफ़ ज़ीन कहते हैं कि सिंगापुर में लोग इसे पारंपरिक तरीक़े से चावल के साथा खाना पसंद करते हैं।
ज़ीन बंधुओं ने रेनडांग बनाने का तरीक़ा अपनी दादी से सीखा था, जो 1940 में सिंगापुर पहुंची थीं। यहां उन्होंने सड़क किनारे अपने इलाक़े के पारंपरिक खाने बनाकर बेचने शुरू किए थे। बाद में उन्होंने यहां अपना रेस्टोरेंट खोल लिया जिसका नाम उन्होंने 'सब्र मिनानती' रखा। जिसका मतलब है 'सब्र से इंतज़ार कीजिए'।
दरअसल इनकी दुकान पर खाने वालों की भीड़ जमा हो जाती थी और सब को एक वक़्त संभालना मुश्किल होता था, इसीलिए उन्होंने अपने रेस्टोरेंट का नाम 'सब्र मिनानती' रखा।
रेनडांग रोज़मर्रा का खाना नहीं है इसे शादी, त्यौहार या किसी नेता के राज तिलक जैसे मौक़े पर ही बनाया जाता है। ये पकवान लोगों के दिल के बहुत क़रीब है। सिंगापुर में मलेशियन रेस्टोरेंट चलाने वाले दो भाई हज़मी और आरिफ़ ज़ीन कहते हैं कि सिंगापुर में लोग इसे पारंपरिक तरीक़े से चावल के साथा खाना पसंद करते हैं।
ज़ीन बंधुओं ने रेनडांग बनाने का तरीक़ा अपनी दादी से सीखा था, जो 1940 में सिंगापुर पहुंची थीं। यहां उन्होंने सड़क किनारे अपने इलाक़े के पारंपरिक खाने बनाकर बेचने शुरू किए थे। बाद में उन्होंने यहां अपना रेस्टोरेंट खोल लिया जिसका नाम उन्होंने 'सब्र मिनानती' रखा। जिसका मतलब है 'सब्र से इंतज़ार कीजिए'।
दरअसल इनकी दुकान पर खाने वालों की भीड़ जमा हो जाती थी और सब को एक वक़्त संभालना मुश्किल होता था, इसीलिए उन्होंने अपने रेस्टोरेंट का नाम 'सब्र मिनानती' रखा।