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फॉक्सवैगन लगातार दे रही ग्राहकों को धोखा, कारों में लगी है 'डिफीट डिवाइस'

Mon, 03 Sep 2018 02:27 PM IST
ऑटो डेस्क, अमर उजाला
ऑटो डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 03 Sep 2018 02:27 PM IST
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volkswagen is using defeat device in petrol cars also
Volkswagen Affordable Cars

डीजल कारों के उत्सर्जन में धोखाधड़ी के विवादों में फंसी जर्मनी की फॉक्सवैगन पर अब नया आरोप लगा है। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो फॉक्सवैगन ने ऑडी, पोर्शे और फॉक्सवैगन ब्रांड की कुछ पेट्रोल कारों में भी उत्सर्जन के नियमों के साथ छेड़छाड़ की। कंपनी के इंजीनियरों ने डीजल गाड़ियों में धोखाधड़ी की जांच के दौरान यह जानकारी दी। फॉक्सवैगन ने मामले की जांच जारी रहने का हवाला देते हुए इस विषय पर अभी टिप्पणी से इनकार कर दिया। 

बता दें कंपनी ने गियरबॉक्स और सॉफ्टवेयर में ऐसी छेड़छाड़ की जिससे वाहन कार्बन उत्सर्जन और ईंधन खपत का स्तर कम बताने लगता है। अगर आरोप सही साबित हुए तो फॉक्सवैगन की मुसीबतें बढ़ सकती हैं। यूरोप में कार्बन उत्सर्जन के आधार पर ही वाहनों पर टैक्स लगाया जाता है। 

फॉक्सवैगन ने सितंबर 2015 में पहली बार स्वीकार किया था कि उसने 2008 से 2015 के बीच दुनियाभर में बेची गई एक करोड़ 11 लाख गाड़ियों में 'डिफीट डिवाइस' लगाया था। यह डिवाइस इस तरह से डिजाइन किया गया था कि लैब में परीक्षण के दौरान ये कारों को पर्यावरण के मानकों पर खरा साबित कर देते थे । 

जबकि वास्तक में इन कारों से नाइट्रिक ऑक्साइड नामक प्रदूषित गैस का उत्सर्जन होता था। यह उत्सर्जन यूरोपीय मानकों से चार गुणा अधिक था। फॉक्सवैगन को इस घोटाले के कारण अब तक अरबों रुपए का जुर्माना देना पड़ा है। सिर्फ जर्मनी में 8,300 करोड़ रुपए का जुर्माना देने पर कंपनी राजी हुई है। इसके कुछ शीर्ष अधिकारियों को जेल की सजा भी हुई है। 





 
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Volkswagen

फॉक्सवैगन पिछले साल जापान की टोयोटा को पछाड़ कर दुनिया की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी बनी थी। इसी साल उसकी सबसे ज्यादा मिट्टीपलीद भी हो गई।अमेरिका की पर्यावरण रक्षा एजेंसी ‘ईपीए’ का कहना था कि इन कारों में चकमा देने वाला एक ऐसा सॉफ्टवेयर लगा है, जो पल भर में जान जाता है कि मोटर से निकलने वाले धुंए की कब प्रदूषण-जांच हो रही है और कब कार सड़क पर सरपट दौड़ रही है।

प्रदूषण जांच के समय इन कारों से निकलने वाले धुंए में जितनी नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा मिलती है, सड़क पर दौड़ते हुए वह उससे 35 गुना तक अधिक पाई गई है। ऐसा तभी हो सकता है, जब कहीं न कहीं कोई हेराफेरी हो रही हो।

‘ईपीए’ का ध्यान इस धोखाधड़ी की तरफ इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (आईसीसीटी) नाम की एक ग़ैर-सरकारी और ग़ैर-लाभकारी संस्था ने खींचा था। दो दर्जन परिवहन व पर्यावरण विशेषज्ञों वाली इस संस्था के सदस्य़ यूरोपीय संघ, अमेरिका, चीन, जापान और भारत जैसे देशों के इंजीनियर, वैज्ञानिक और अकादमिक शोधकर्ता होते हैं। यही देश परिवहन साधनों के प्रमुख बाज़ार भी हैं।

 
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