छठ पूजा का महापर्व 18 नवंबर से शुरू होकर 21 नवंबर तक चलेगा। छठ पूजा बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख त्योहारों में से एक है। दरअसल छठ माता की पूजा का महापर्व छठ दीपावली के 6 दिन बाद मनाया जाता है। छठ पूजा में सूर्य देवता की पूजा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि छठ माता सूर्य देवता की बहन हैं। सूर्य देव की उपासना करने से छठ माई प्रसन्न होती हैं और मन की सभी इच्छाएं पूरी करती हैं। छठ की शुरुआत नहाय खाय से होती है और 4 दिन तक चलने वाले इस त्योहार का समापन उषा अर्घ्य के साथ होती है। 4 दिनों में छठ पूजा से जुड़े कई प्रकार के व्यंजन, भोग और प्रसाद बनाए जाते हैं। व्रत रहने वालों को विधि-विधान के साथ सूर्य पूजा संपन्न करनी होती है।
Chhath Puja 2020: जानिए छठ पूजा में सूर्य पूजा का वास्तु एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण
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डूबते सूर्य की होती है पूजा
.हिंदू धर्म में यह पहला ऐसा त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य की पूजा की जाती है। छठ के तीसरे दिन शाम यानी सांझ के अर्घ्य वाले दिन शाम के पूजन की तैयारियां की जाती हैं। इस बार शाम का अर्घ्य 20 नवंबर को है। इस दिन नदी, तालाब में खड़े होकर ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। फिर पूजा के बाद अगली सुबह की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
उषा अर्घ्य
चौथे दिन सुबह के सूर्योदय अर्घ्य के साथ छठ का समापन हो जाता है। सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। विधिवत पूजा कर प्रसाद बांटा जाता है और इस तरह छठ पूजा संपन्न होती है।
सूर्य पूजा का वास्तु में महत्व
सृष्टि का आधार ही सूर्य है, सूर्य की ऊर्जा से ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। पूर्व दिशा का स्वामी सूर्य ग्रह होता है,सूर्य धन-संपत्ति, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य और तेजस्व प्रदान करने वाला ग्रह है। वास्तु की पूर्व दिशा यदि स्वस्थ्य और दोषमुक्त रहे तो उस भवन का स्वामी और उसमें रहे वाले सदस्य महत्वकांक्षी, सत्वगुणों से युक्त और उनके चेहरे पर तेज होता है। ऐसे भवन स्वामी को खूब मान-सम्मान मिलता है इसका कारण है सूर्य अपार शक्ति और तेज के देवता हैं।
सुबह के समय पूर्व दिशा से मिलने वाली किरणें अनंत गुणधर्म वाली ऊर्जा से युक्त होती हैं यही कारण है कि वास्तुविज्ञान में पूर्व व उत्तर की दिशाओं को अत्याधिक महत्व दिया जाता है, क्योंकि सूर्य से मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा का मुख्य द्वार पूर्व दिशा ही है। वहीं उत्तर एवं ईशान से ब्रह्मांडीय ऊर्जा भी भवन में प्रवेश करती है। ये दोनों ऊर्जाएं मिलकर भवन के अंदर एक विशेष ऊर्जामंडल बनाती हैं जो भवन के निवासियों को सकारात्मक परिणाम देती हैं।
वैदिक काल से ही हमारे ऋषि-मुनि इस बात से भली-भांति परिचित थे कि सूर्य ही जीवनप्रदायक और जीवनपोषक शक्ति है। सूर्य की किरणें अनेकों प्रकार के हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करती हैं। सुबह की धूप स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम होती है जब यह किरणें हमारे शरीर पर पड़ती हैं तो हमारे लिए जरूरी विटामिन 'डी' का निर्माण करती हैं। इसी कारण वास्तुशास्त्र में पूर्व और उत्तर की ओर अधिक खुला स्थान एवं दरवाज़े, खिड़कियां रखने की सलाह दी जाती है ताकि प्रातःकालीन सूर्य की किरणें घर व आँगन में अधिक से अधिक मात्रा में प्रवेश कर सकें और रोग फैलाने वाले हानिकारक कीटाणु घर में नहीं पनप सकें।