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ज्योतिष: राहु-केतु के कारण बनता है कुंडली में ये खतरनाक योग, जानें कैसे बचें

Sat, 29 May 2021 11:14 AM IST
रुस्तम राणा ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Sat, 29 May 2021 11:14 AM IST
सार

जब कुंडली में राहु और केतु के मध्य में सारे ग्रह आ जाते हैं तब कुंडली में कालसर्प योग बनता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को मानसिक कष्ट सहना पड़ता है। इसके साथ ही जातकों को कई अन्य परेशानियां होती हैं। 

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जब कुंडली में राहु और केतु के मध्य में सारे ग्रह आ जाते हैं तब कुंडली में कालसर्प योग बनता है। - फोटो : social media

विस्तार

राहु और केतु दोनों पापी ग्रह हैं। अन्य ग्रहों की तरह इनका कोई वास्तविक स्वरूप नहीं है। इसलिए इन्हें ज्योतिष शास्त्र में छाया ग्रह कहते हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु-केतु से जुड़े दोष होते हैं तो ऐसे जातकों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ये दोनों ग्रह कुंडली में कालसर्प योग बनाते हैं जिसके कारण जातकों को कष्टों का सामना करना पड़ता है।   

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क्या है कालसर्प योग?

जब कुंडली में राहु और केतु के मध्य में सारे ग्रह आ जाते हैं तब कुंडली में कालसर्प योग बनता है। कालसर्प योग दो शब्दों को मिलाकर बना है। इसमें पहला शब्द है काल, यानि मृत्यु और दूसरा शब्द है - सर्प, जिसका तात्पर्य सांप से है। कुंडली में कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति को मानसिक कष्ट सहना पड़ता है। इसके साथ ही जातकों को कई अन्य परेशानियां होती हैं। 

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कालसर्प योग के प्रकार
  1. अनंत कालसर्प योग
  2. कुलिक कालसर्प योग
  3. वासुकी कालसर्प योग
  4. शंखपाल कालसर्प योग
  5. पद्म कालसर्प योग
  6. महापदम कालसर्प योग
  7. तक्षक कालसर्प योग
  8. कर्कोटक कालसर्प योग
  9. शंखनाद कालसर्प योग
  10. पातक कालसर्प योग
  11. विषधर कालसर्प योग
  12. शेषनाग कालसर्प योग
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ऐसे मिलते हैं कालसर्प योग के संकेत

मानसिक एवं शारीरिक कष्ट का होना, पैतृक संपत्ति का नष्ट होना, भाई-बंधुओं से धोखा, संतान से कष्ट, शत्रुओं से निरंतर भय, बुरे स्वप्न एवं अनिद्रा रोग, कोर्ट कचहरी का सामना उपरोक्त सभी परिस्थितियां कालसर्प योग के प्रभावों का संकेत करती हैं। 

कालसर्प योग से मुक्ति के उपाय

कालसर्प योग दूर करने के लिए जातकों को शिव मंदिर में सोना, चांदी, तांबा, पीतल धातु से निर्मित नाग-नागिनों के जोड़े को चढ़ाने चाहिए। मंदिर में भगवान शंकर जी का विशेष अभिषेक करना चाहिए। रूद्राभिषेक कर नौ प्रकार के नागों की प्रतिमा बना उनको नदी में प्रवाहित करना चाहिए। नागों को प्रवाहित करने के बाद स्नान करें। पहने हुए वस्त्रों का त्याग करें। नवीन वस्त्र धारण करें। नाग स्तोत्र का पाठ करें। 

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